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यूरोप के साथ व्यापार संधि

इस साल गणतंत्र दिवस के मौके पर यूरोपीय संघ के दो शीर्ष नेता या पदाधिकारी मुख्य अतिथि है। यूरोपीय काउंसिल के अध्यक्ष एंटोनियो लुईस सैंटोस दा कोस्टा और यूरोपीय कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लियेन मुख्य अतिथि हैं। 26 जनवरी को कर्तव्य पथ पर गणतंत्र दिवस की परेड के अगले दिन 27 जनवरी को बताया जा रहा है कि दोनों के बीच व्यापार संधि हो सकती है। यह भारत की स्वतंत्र व व्यापार नीति के लिए बड़ी उपलब्धि होगी। ध्यान रहे भारत पहले ही ब्रिटेन के साथ व्यापार संधि कर चुका है और ब्रिटेन व यूरोपीय संघ से इतर ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ भी व्यापार संधि की है। लेकिन सवाल है कि इससे भारत को क्या बड़ा बाजार मिल रहा है और भारत किन उत्पादों का निर्यात करके इन संधियों का अधिकतम लाभ उठा सकता है?

ध्यान रहे इससे पहले जब भी किसी व्यापार संधि की खबर आती है तो बाहर से आने वाली चीजों के भारत में सस्ता होने की खबर उसमें होती है। जैसे न्यूजीलैंड के साथ व्यापार संधि होने की खबर आई तो बताया गया कि वहां के सेब, कीवी आदि फल, कुछ खास शराब और कुछ डेयरी उत्पाद भारत में सस्ते हो सकते हैं। भारत की ओर से न्यूजीलैंड को क्या बेचा जाएगा और उससे भारत को कितनी विदेशी मुद्रा प्राप्त होगी, यह बड़ा सवाल है। यह सब जानते हैं कि भारत के लोग उपभोक्ता हैं। भारत 140 करोड़ लोगों का बाजार है। उस बाजार में दुनिया भर के देश अपना माल खपाना चाहते हैं। लेकिन भारत के पास क्या माल है, जिसे वह विश्व बाजार में खपा सकता है? क्या भारत इन संधियों का पूरा फायदा उठाने के लिए तैयार भी है या फिर ये संधियां सिर्फ दिखावा है?

यह सवाल इसलिए भी है क्योंकि ब्रिटेन से लेकर ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड तक भारत व्यापार संधि तो कर रहा है लेकिन इन देशों में भारतीयों के प्रति नफरत बढ़ती दिख रही है। भारतीयों के खिलाफ घृणा अपराधों में बेहिसाब बढ़ोतरी हो रही है। भारतीय मूल के लोगों के साथ साथ छात्र भी निशाने पर हैं। एक तरफ जर्मनी या दूसरे देशों के साथ भारतीयों के लिए वीजा के नियम आसान करने की बात हो रही है तो दूसरी ओर उन देशों में भारतीयों पर हमले तेज हो रहे हैं। व्यापार संधि करते हुए हमेशा इस पहलू का ध्यान रखना चाहिए।

बहरहाल, अगर भारत तैयारी करे तो यूरोपीय संघ के साथ व्यापार संधि का बड़ा लाभ उसे मिल सकता है। लेकिन अभी तक मेक इन इंडिया अभियान कुल मिला कर असेंबल इन इंडिया बन कर रह गया है। भारत में स्टार्ट अप योजना के 10 साल पूरे होने का जश्न मनाया जा रहा है और मेक इन इंडिया के भी लगभग एक दशक हो गए हैं लेकिन इनसे ऐसा कुछ नहीं बना है कि भारत दुनिया के बाजार में अपना परचम लहरा सके। चीन अब भी दुनिया की फैक्टरी बना हुआ है।

दुनिया के देशों के साथ उसका ट्रेड सरप्लस 1.2 ट्रिलियन डॉलर है यानी भारत की जीडीपी के लगभग एक तिहाई के बराबर इसका विदेशी व्यापार का सरप्लस है। सो, इस बात का ध्यान रखना होगा कि हर देश के साथ मुक्त व्यापार की संधि भारत के लिए व्यापार घाटा बढ़ाने वाली नहीं हो। कहीं ऐसा न हो कि देश के 140 करोड़ लोगों को सस्ती चीजें तो मिलें लेकिन भारत पूरी तरह से उपभोग आधारित अर्थव्यवस्था बन जाए। मुक्त व्यापार संधियों का लाभ लेने के लिए भारत में विनिर्माण सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा खड़ा करना होगा।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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