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ओह, बंगाल! सभी टूट पड़े

TMC Candidate List

स्वतंत्र भारत में ऐसा कभी नहीं हुआ। एक प्रदेश, एक मुख्यमंत्री और पूरी भारत सरकार, केंद्र की सभी संस्थाएं, राष्ट्रीय मीडिया सभी एक सुर में बंगाल, बंगाल का वह भौकाल बनाते हुए मानो विधानसभा चुनाव न हो, पानीपत की लड़ाई हो! भारत का प्रधानमंत्री, गृह मंत्री बंगाल पर टूट पड़ा, तो चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट मतदाताओं के दिल-दिमाग को झिंझोड़ते हुए। देश की संसद भी तड़का मारते हुए। राष्ट्रपति की भी कथा थी कि देखो, उनके साथ बंगाल में क्या होता है! सरकारी प्रोपेगेंडा, राष्ट्रीय मीडिया रत्ती भर पीछे नहीं! निशाने में कौन? एक बेचारी ममता बनर्जी और बेचारा भद्र बांग्ला मानस! वह मानस जो अपने विवेक में भड़भड़िए गुजराती नेताओं के झूठ-जगत सेठों की ठगी के विकास को नहीं, बल्कि अपनी दीदी की फकीरी से सुकून पाता है! पर सोचें, इन्हें उखाड़ने, हराने के लिए 2026 के विधानसभा चुनाव में भारत राष्ट्र, राष्ट्रीय संस्थाओं ने क्या-क्या नहीं किया। मेरा मानना है कि नतीजे बुरे होने हैं। जीते-हारे कोई भी, वक्त फिर 1905 के लार्ड कर्जन के बंग-भंग समय में लौट आया है!

मोहन भागवत छाप हिंदुओं ने भारत के विभाजन की इस ऐतिहासिक बारीकी को नहीं पढ़ा है कि 1857 के बाद ब्रितानी सरकार ने यह सोचते हुए कितना दिमाग खपाया कि भला ऐसा कैसे हुआ कि उस समय की कलकत्ता की छावनी बेरहामपुर में मंगल पांडे की कारतूस पर बगावत में मुसलमान साथ में खड़ा था। तुरंत कैसे कलकत्ता से मेरठ तक विद्रोह की गूंज!

तब वृहद बंगाल आठ करोड़ आबादी का था। आज पश्चिम बंगाल में कोई ग्यारह करोड़ आबादी होगी। 70 प्रतिशत हिंदू और 30 प्रतिशत मुसलमान!

सो, 1899 में लॉर्ड कर्जन जब गवर्नर-जनरल बनकर आया, तो उसके दिमाग में फिक्सेशन, जिद (जैसे मोदी, शाह, संघ की आज है) थी कि हिंदू और मुसलमान को बांटो। पूर्व में मुसलमान अधिक हैं, तो वह पूर्व बंगाल और पश्चिमी बंगाल में हिंदू अधिक, तो वह पश्चिम बंगाल सूबा!

सन् 1904–1905 के गोपनीय नोट्स में बाकायदा यह वाक्य है कि “Calcutta must be weakened if the Congress is to be checked.” क्योंकि बंगाल राष्ट्रवाद, स्वदेशी आंदोलन का बौद्धिक इंजन था, तो जन जागरूकता में भी नंबर एक। मतलब बंगाल पर नियंत्रण नहीं हुआ, तो शासन लंबा नहीं चलेगा। इसलिए ब्रिटिश औपनिवेशिक अभिलेखों में लब्बोलुआब है कि बंग-भंग स्वशासन, स्वदेशी के दिल की राजनीतिक सर्जरी का फैसला था। कैसे भी हो, हिंदू बनाम मुस्लिम बनाओ और हिंदुस्तान पर अपनी हुकूमत पक्की करो! पर तब, उस समय का वास्तविक कमाल था कि हिंदू-मुस्लिम भद्रजनों ने मिलकर अंग्रेज सरकार को विभाजन के फैसले से पलटने को मजबूर किया!

अब 120 साल बाद मोदी सरकार और दिल्ली की सत्ता, संसद, चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट, मीडिया आदि पर सोचें? सभी कैसे फिक्सेशन, कैसी जिद में हैं! एक ही बात- केंद्र सरकार ठीक कर रही है! मोदी सरकार की नियत में यदि खोट भी है, तो इसलिए बरदाश्त हो क्योंकि सवाल केंद्र की सत्ता का है! भले वह सत्ता लॉर्ड कर्जन की इस राजनीति की फॉलोअर हो कि हिंदू और मुसलमान को बांट कर, उनके वोटों को आपसी दुश्मनी में बदलकर विभाजित करो ताकि चुनाव जीते! ये उस भविष्य की कोई चिंता करते हुए नहीं है, जो 1946–47 में घटा था। किसी के दिमाग में नहीं है कि बांग्लादेश से सटी मुस्लिम बहुल आबादी ने यदि ठान लिया, डायरेक्ट एक्शन दोहरा दिया, अपने अलग टापू की जिद की, तो तब क्या उसके आगे वैसा ही समर्पण नहीं होगा, जो 1946 में गुजरात के ही मोहनदास करमचंद गांधी ने अपने महात्माई-फकीरी फलसफे में दो भाइयों के घर के बंटवारे में किया था!

पता है यह ऐतिहासिक सत्य कि ईस्ट इंडिया कंपनी का बंगाल में धंधा बनवाने, फिर जितवाने वाला कौन था? नवाब की सेना में गद्दार पैदा करने वाला कौन था? मुर्शिदाबाद का वह जगत सेठ, जिसके वंशज सेठ खुशालचंद ने सम्मेद शिखरजी (जैन तीर्थ) में मंदिर और तालाब बनवाए थे। जो ओडिशा, बिहार, बंगाल, असम के व्यापार, बैंकिंग, साहूकारी का बेताज बादशाह था। वह भी दरबार को अपनी उंगलियों पर वैसे ही नचाता था, जैसे आज अडानी-अंबानी नचाते हैं।

सवाल है, तब क्यों जगत सेठ ने ईस्ट इंडिया कंपनी को बेहतर माना? इसलिए ताकि देश में स्थिरता, स्थायी सत्ता कायम हो, और वह फायदा उठाकर अरबपति-खरबपति होता जाए! फिर भले राज हुगली के किनारे लगे अंग्रेज बेड़े के हाथ में जाए या चीनी या फ्रांसीसी व्यापारी बेड़े को!

क्या आज के जगत सेठ, केंद्र की वर्चस्ववादी सत्ता ऐसा ही नहीं सोचती? मानसिकता क्या है? कोलकाता में भी हमारा राज हो। हमारे एक फोन से वहां धड़ाधड़ फैसले हों। असम, ओडिशा, बिहार जीत लिया और बंगाल भी जीतेंगे, तो ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह राज हमारा स्थायी। तभी सोचें, मोदी-शाह ने क्या-क्या नहीं किया! संसद की विशेष बैठक करके बंगाल की महिलाओं के आगे एमएलए-एमपी बनाने की गाजर लटकाई, तो गृह मंत्री अमित शाह ने कोलकाता में डेरा डालकर दीदी और मुसलमानों को हराकर दिल्ली लौटने का संकल्प लिया।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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