ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस ने न तो लोकसभा चुनाव में ‘इंडिया’ ब्लॉक की सफलता से कुछ सीखा है और न हरियाणा व जम्मू कश्मीर की अपनी हार से कोई सबक लिया है। राहुल गांधी के कहने के बावजूद कांग्रेस नेता सिर्फ अपने हित को आगे रख कर राजनीति कर रहे हैं। महाराष्ट्र और झारखंड दोनों जगह यह देखने को मिल रहा है कि पार्टी के प्रदेश नेताओं ने प्रभारियों के साथ मिल कर अलग अलग सीटों पर अपनी पसंद के उम्मीदवार तय कर दिए। कहने की जरुरत नहीं है कि कांग्रेस के प्रदेश नेता और प्रभारी किस आधार पर उम्मीदवार तय करते हैं। सो, उन्होंने उम्मीदवार तय कर लिए और प्रादेशिक सहयोगियों से उन सीटों पर लड़ाई शुरू कर दी।
सीट बंटवारे में समस्या का असली कारण यही है। महाराष्ट्र में कई सीटों के बारे में कांग्रेस नेताओं को पता है कि उस सीट पर उद्धव ठाकरे या शरद पवार की दावेदारी है और उनके पास अच्छे उम्मीदवार हैं। परंतु कांग्रेस के किसी नेता ने उस सीट पर किसी उम्मीदवार को वादा कर दिया। इसके बाद वह सीट हासिल करने के लिए पूरी जान लगाता है। इसी तरह झारखंड में कई सीटों पर ऐसा हुआ है। अच्छा उम्मीदवार नहीं होने के बावजूद कांग्रेस ने उस सीट के लिए दबाव बनाया तो उसके पीछे कोई न कोई दूसरा गैर राजनीतिक कारण था। इसके बाद कांग्रेस की गुटबाजी आती है। एक ही सीट पर कांग्रेस को अलग अलग गुटों ने अलग अलग दावेदार को वादा कर दिया। यह भी देखने को मिला कि कांग्रेस के मौजूदा विधायक की सीट छीनने के लिए एक खेमे ने बाहर से किसी दूसरे नेता को पार्टी में शामिल करा दिया।
यहां कांग्रेस और भाजपा का फर्क साफ दिखता है। भाजपा का कोई भी प्रदेश का नेता इस तरह से केंद्रीय नेतृत्व को उल्लू नहीं बना सकता है। वहां केंद्रीय नेतृत्व की अपनी सर्वे की टीम है और जमीनी स्तर से फीडबैक लेने का सिस्टम है। हो सकता है कि कांग्रेस में भी ऐसा सिस्टम हो लेकिन ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि प्रदेश से जो सूची आती है उसके मुकाबले राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे अपनी सूची लेकर मीटिंग में बैठते हैं। भाजपा में ऐसा होता है। अमित शाह के पास अपनी सूची होती है और संगठन महामंत्री के पास अपनी सूची होती है। उसका मिलान प्रदेश से आई सूची से किया जाता है। इससे प्रदेश के नेताओं को मनमानी करने का मौका नहीं मिलता है। इससे सहयोगियों से तालमेल करने में भी आसानी होती है क्योंकि केंद्रीय नेतृत्व को पता होता है कि किस सीट पर उसके पास मजबूत उम्मीदवार नहीं है। कांग्रेस में सब अपने छोटे छोटे स्वार्थ में कमजोर उम्मीदवार का बायोडाटा लेकर घूम रहे होते हैं। प्रदेश नेताओं के ऐसे ही स्वार्थों के चलते हर बार सीट बंटवारे में समस्या आती है। प्रभारी महासचिव भी केंद्रीय नेतृत्व के प्रति निष्ठा की बजाय प्रदेश के क्षत्रपों के हिसाब से काम करते हैं।
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Image Source: UNI

