कांग्रेस पार्टी में पश्चिम बंगाल की चुनाव रणनीति पर विचार हो रहा है। जानकार सूत्रों का कहना है कि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के साथ कांग्रेस का तालमेल हो सकता है। ममता बनर्जी ने इसका मन बना लिया है तभी अभिषेक बनर्जी ने अलायंस के लिए दरवाजा खुला होने की बात कही। लेकिन यह भी तय बताया जा रहा है कि ममता बनर्जी लेफ्ट पार्टियों के साथ तालमेल नहीं करेंगी। गौरतलब है कि कांग्रेस इससे पहले पश्चिम बंगाल में वामपंथी मोर्चे के साथ तालमेल करके चुनाव लड़ी थी। लेकिन उसका कोई फायदा नहीं हुआ। दोनों पार्टियों का अस्तित्व समाप्त हो गया। कांग्रेस एक सीट जीती तो लेफ्ट मोर्चा एक भी सीट नहीं जीत पाया। लेकिन उससे पहले यानी 2016 में जब कांग्रेस अकेले लड़ी थी तब उसने 40 से ज्यादा सीटें जीती थीं। हालांकि तब के हालात अलग थे। तब कांग्रेस दो लोकसभा और तीन विधानसभा सीट वाली पार्टी थी।
बहरहाल, कांग्रेस पश्चिम बंगाल को लेकर जिस रणनीति पर चर्चा कर रही है उसमें बाकी राज्यों का मामला भी शामिल है। कांग्रेस नेताओं का एक वर्ग ऐसा है, जो मान रहा है कि पश्चिम बंगाल में लेफ्ट के साथ तालमेल करने का नकारात्मक असर केरल में होता है। गौरतलब है कि केरल में पांच साल पर सत्ता बदलने का इतिहास रहा है लेकिन 2021 के चुनाव में कांग्रेस को हरा कर लेफ्ट मोर्चा लगातार दूसरी बार चुनाव जीत गया। कांग्रेस का मानना है कि पिछली बार अगर वह पश्चिम बंगाल में लेफ्ट के साथ नहीं लड़ी होती तो केरल में ऐसी स्थिति नहीं आती। बंगाल में साथ लड़ने से केरल के मतदाताओं में यह मैसेज गया कि दोनों पार्टियां एक हैं इसलिए उन्होंने यथास्थित बनाए रखी। उनको यह भी लगा कि कांग्रेस को दिल्ली व देश की राजनीति करनी है इसलिए लोकसभा में कांग्रेस को 20 में से 19 सीटें जीता दी हैं तो राज्य में लेफ्ट मोर्चे को जिताते हैं।
तभी इस बार कांग्रेस किसी हाल में पश्चिम बंगाल में लेफ्ट मोर्चा के साथ नहीं जाना चाहती है। अगर ममता बनर्जी की पार्टी के साथ तालमेल होता है तो वह कांग्रेस के लिए आदर्श स्थिति होगी। इससे उसको राज्य में फिर से पैर जमाने का मौका मिलेगा और साथ ही असम में भी ममता बनर्जी का साथ मिलने से वह अच्छे तरीके से लड़ने में सक्षम होगी। हालांकि तमिलनाडु में भी डीएमके के नेतृत्व वाले सेकुलर प्रोग्रेसिव अलायंस में कांग्रेस के साथ साथ लेफ्ट पार्टियां भी हैं। लेकिन केरल पर उसका असर इसलिए ज्यादा नहीं होता है क्योंकि वह गठबंधन डीएमके का का है, जिसमें लेफ्ट और कांग्रेस दोनों बहुत छोटे सहयोगी हैं। लेकिन पश्चिम बंगाल में दोनों तीसरा मोर्चा बना कर लड़े थे, जिसमें ज्यादा सीटें सीपीएम के नेतृत्व वाले लेफ्ट मोर्चे को मिली थीं। सीपीएम के नेतृत्व वाला जैसा मोर्चा बंगाल में लड़ता है ठीक वैसा ही मोर्चा केरल में भी लड़ता है। तभी कांग्रेस यह तय करती दिख रही है कि अगर ममता बनर्जी के साथ कम सीटों पर भी तालमेल हो जाए तो अच्छी बात है नहीं तो वह अकेले लड़ेगी। उसको पता है कि पश्चिम बंगाल में गंवाने के लिए कुछ नहीं है, जबकि उधऱ केरल में सत्ता हासिल करनी है।
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