बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल यू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार की पार्टी पिछले 20 साल से बिहार में शासन कर रही है। इसमें लगभग 19 साल नीतीश मुख्यमंत्री रहे हैं। जॉर्ज फर्नांडीज के कमजोर होने के बाद शरद यादव जरूर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे लेकिन पार्टी पर पूरी तरह से कब्जा नीतीश का ही रहा। अब उनकी सेहत ठीक नहीं है और पार्टी को नए नेता के हाथ में सौंपने का समय आ गया है। लेकिन उन्होंने किसी को अपने उत्तराधिकारी के तौर पर तैयार ही नहीं किया है। कर्पूरी ठाकुर की प्रेरणा से उन्होंने अपने बेटे या परिवार के किसी दूसरे सदस्य को राजनीतिक उत्तराधिकारी नहीं बनाया। अब उनके बेटे निशांत के सक्रिय राजनीति में आने की चर्चा है लेकिन वे राजनीति करने में बहुत सक्षम नहीं हैं। नीतीश ने अपनी पार्टी में किसी को इसके लिए तैयार नहीं किया है।
नीतीश की पार्टी वही संभाल सकता है, जो उनके सामाजिक समीकरण का प्रतिनिधित्व करता हो। यानी कोईरी, कुर्मी जाति से आता हो या अति पिछड़े समुदाय का हो। लेकिन नीतीश के सबसे करीबी चार लोगों में ललन सिंह और विजय चौधरी भूमिहार हैं, संजय झा ब्राह्मण और अशोक चौधरी दलित हैं। एक समय नीतीश के उत्तराधिकारी बताए जा रहे आरसीपी सिंह पार्टी से बाहर हो गए हैं। उन्हीं की तरह आईएएस रहे और नीतीश कुमार के नालंदा जिले से आने वाले उनकी जाति के मनीष वर्मा को बाद में नीतीश का उत्तराधिकारी बताया जा रहा था। उनको राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया था और पूरे बिहार में यात्रा करने को कहा गया था। लेकिन पार्टी पावरफुल लॉबी ने उनकी यात्रा रूकवा दी और नीतीश के चाहने के बावजूद उनको एमएलसी नहीं बनने दिया। वे पूरी तरह से हाशिए में डाल दिए गए हैं। तभी ऐसा लग रहा है कि नीतीश का उत्तराधिकारी उनकी पार्टी से कोई नहीं निकल पाएगा। चाहे जिसको उनकी जगह नेता बनाया जाए वह पार्टी नहीं संभाल पाएगा। इसलिए ज्यादा संभावना यह है कि उनकी जगह एनडीए का नेता भाजपा से आए और वही नीतीश की पार्टी भी संभाले। यानी उसकी पसंद से नीतीश की पार्टी का नेता चुना जाए।
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