हथियार व्यापारियों का धंधा चमक उठा है। स्वीडन में स्टॉकहोम स्थित संस्था सिपरी ने अपनी एक ताजा रिपोर्ट में कहा है कि इस वक्त हथियारों, गोला-बारूद और दूसरे सैन्य साज-ओ-सामान पर विभिन्न देश जितना धन खर्च कर रहे हैं, उतना इससे पहले कभी नहीं हुआ।
दुनिया पर युद्ध का साया गहराता जा रहा है। यूक्रेन के बाद पश्चिम एशिया युद्ध की आग में झुलस रहा है। उधर दक्षिण चीन सागर और ताइवान जलडमरूमध्य में भी तनाव लगातार बढ़ा है। भारत-चीन सीमा पर की हालात भी कोई कम चिंताजनक नहीं हैं। इन स्थितियों से विभिन्न देशों की प्राथमिकताएं बदली हैं। नतीजतन, हथियार व्यापारियों का धंधा चमक उठा है। स्वीडन में स्टॉकहोम स्थित संस्था इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) ने अपनी एक ताजा रिपोर्ट में कहा है कि इस वक्त हथियारों, गोला-बारूद और दूसरे सैन्य साज-ओ-सामान पर विभिन्न देश जितना धन खर्च कर रहे हैं, उतना इससे पहले कभी नहीं हुआ।
इसी हफ्ते जारी अपनी इस रिपोर्ट में सिपरी ने बताया कि 2023 में वैश्विक सैन्य खर्च एक नए रिकॉर्ड पर पहुंच गया। 2022 के मुकाबले 2023 में सैन्य खर्च 6.8 फीसदी बढ़कर 24.4 ट्रिलियन डॉलर पर जा पहुंचा। 2009 के बाद यह एक साल में सबसे बड़ी वृद्धि है। वैसे यह लगातार नौवां साल है, जब रक्षा खर्च बढ़ा है।
इस वृद्धि में खासकर दस देशों का योगदान सबसे ज्यादा है, जिनके सैन्य खर्च में बेतहाशा वृद्धि हुई है। इनमें भारत भी शामिल है। रक्षा खर्च के लिहाज से वह दुनिया में चौथे नंबर पर है। अमेरिका अब भी सबसे ऊपर बना हुआ है। 2023 में अमेरिका ने 960 बिलियन डॉलर इस मद में खर्च किए, जो दुनियाभर के कुल खर्च का 37 फीसदी है। दूसरे नंबर पर चीन है, जिसका खर्च अमेरिका से लगभग एक तिहाई है। उसने 296 अरब डॉलर खर्च किए। तीसरे नंबर पर रूस है।
उसके बाद भारत और सऊदी अरब का नंबर है। 2023 में रूस का खर्च 2022के मुकाबले 24 फीसदी बढ़कर 109 अरब डॉलर पर पहुंच गया। सैन्य खर्च के मामले में चौथा सबसे बड़ा देश भारत है, जिसने 2023 में 83.6 बिलियन डॉलर खर्च किए। यह 2022 के मुकाबले 4.2 फीसदी ज्यादा था। यह रुझान बताता है कि दुनिया में कूटनीति बेअसर हो गई है। नतीजतन, दुनिया के सक्षम देश अब अपने संसाधन सैन्य तैयारियों में लगा रहे हैं। इसका दुष्प्रभाव विकास और प्रगति के बजट पर पड़ रहा है।
Leave a comment
You must be logged in to post a comment.



