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लोकतंत्र का रण-क्षेत्र

यह सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी है कि सभी हित-धारकों से संवाद कर वह अधिकतम सहमति बनाने का प्रयास करे, ताकि लोकतंत्र वोट के अलावा किसी अन्य तरह के शक्ति-प्रदर्शन का रण क्षेत्र ना बन जाए।

कॉकरोच प्रतिरोध को रोकने के लिए राष्ट्रीय राजधानी की किलेबंदी और आंदोलनकारियों पर सख्त कार्रवाई से ऐसा गतिरोध खड़ा हो रहा है, जिसके परिणाम के बारे में अभी अनुमान लगाना कठिन है। चूंकि इस जन आंदोलन के समानांतर विपक्षी दल भी मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को रद्द करने, और हाल में हुए चुनावों को रद्द करने की मांग को लेकर आंदोलन चला रहे हैं, अतः राजनीतिक संकट अधिक गंभीर हो गया है। स्पष्टतः जनमत के एक बड़े हिस्से का चुनावों की पवित्रता पर यकीन नहीं रहा, नतीजतन उसके मन में निर्वाचित सरकारों की वैधता पर प्रश्न खड़े लगे हैं।

इसके खिलाफ हो रहे प्रतिरोध के दमन की कोशिशें इन सवालों को और गंभीर रूप देंगी। लोकतांत्रिक देशों में अक्सर ऐसी स्थितियां दीर्घकालिक अस्थिरता का कारण बनती हैं। दुर्भाग्यपूर्ण है कि नरेंद्र मोदी सरकार ऐसी आशंकाओं के प्रति लापरवाह बनी हुई है। इस सूरत में सुप्रीम कोर्ट सार्थक हस्तक्षेप कर सकता था, लेकिन एसआईआर के सवाल पर बार-बार गुजारिश लेकर वहां जाने वाले वरिष्ठ वकील अब यह कहने लगे हैं कि वहां से राहत की कोई उम्मीद नहीं बची। कुछ अधिवक्ताओं ने तो यह सवाल उठा दिया है कि क्या नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के नजरिए से न्यायपालिका प्रासंगिक रह गई है? इन संदेहों और सवालों के जल्द जवाब नहीं ढूंढे गए, तो संवैधानिक व्यवस्था के अवरोध-ग्रस्त हो जाने की स्थिति बन सकती है।

अतः उचित होगा कि सत्ता पक्ष अपने संसदीय बहुमत और चुनाव/ उप-चुनावों में मिल रही जीत के आधार पर अत्यधिक आश्वस्त ना रहे। उसे भारत में खड़े हो रहे संकट को वैश्विक स्तर पर जन आंदोलनों से स्थापित सत्ता ढांचों को मिल रही चुनौतियों के व्यापक संदर्भ में देखना चाहिए। सत्ता में होने के नाते यह उसकी जिम्मेदारी है कि सभी हित-धारकों से संवाद कर वह अधिकतम सहमति बनाने का प्रयास करे, ताकि लोकतंत्र वोट के अलावा किसी अन्य शक्ति-प्रदर्शन का रण क्षेत्र ना बन जाए। उसे याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र में ना सिर्फ राजनीतिक दल, बल्कि नागरिक समाज एवं जन संगठन भी समान महत्त्व के हितधारक होते हैं।

By NI Editorial

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