राज्य-शहर ई पेपर व्यूज़- विचार

विद्रूपता सबको मंजूर?

भारत भर में व्यापक रूप से फैले वंशवाद को लेकर आज कहीं विरोध भाव नजर नहीं आता। तो क्या राजनीति के कुछ परिवारों में सिमटने और लोकतंत्र के कुलीनतंत्र में तब्दील होने की विद्रूपता को सबने स्वीकार कर लिया है

अब तक राजनीति से दूर और कुछ समय पहले तक गुमनाम-सी जिंदगी जीने वाले निशांत कुमार जनता दल (यू) में शामिल हुए, तो पार्टी नेताओं एवं कार्यकर्ताओं ने करतल ध्वनि की। खबर है कि नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद बनने वाली नई सरकार में निशांत उप-मुख्यमंत्री बनेंगे। वैसे, उनकी पार्टी के नेता तो उन्हें सीधे मुख्यमंत्री बनाने की मांग कर रहे हैं। निशांत ने कहा- ‘पार्टी में शामिल होना मेरे पिता का निजी फैसला था, जिसे मैंने स्वीकार किया है। मैं अपने पिता के निर्देशन में काम करूंगा।’ यानी यह पूरी तरह पारिवारिक घटनाक्रम है।

अभी चार महीने पहले विधानसभा चुनाव में अपने गठबंधन की भारी जीत के बाद जब निशांत के पिता नीतीश कुमार फिर मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने एनडीए के घटक दल राष्ट्रीय लोक मोर्चा के नेता उपेंद्र कुशवाहा के तब तक अराजनीतिक बेटे दीपक प्रकाश को सीधे कैबिनेट मंत्री बना दिया। उस पर भी किसी को एतराज नहीं हुआ! देश में ऐसी घटनाएं आज इतनी आम हो गई हैं कि इनको लेकर बुद्धिजीवियों से लेकर मीडिया, और सियासी हलकों से लेकर आम जन तक में कोई नाराजगी नहीं देखी जाती। बल्कि इसे “लोकतंत्र” की सामान्य प्रक्रिया मान लिया गया है।

बात इतनी आम और सर्व-स्वीकार्य हो गई है कि नीतीश कुमार की कथित खराब सेहत की चर्चा करते हुए एक बार आरजेडी नेता राबड़ी देवी ने मुख्यमंत्री से अपना पद निशांत को सौंप देने की मांग कर डाली थी! चूंकि राबड़ी देवी का परिवार खुद लोकतंत्र को ऐसी विद्रूपता देने में बढ़-चढ़ कर शामिल है, इसलिए उनके ऐसा करने पर कोई हैरत नहीं हुई। लेकिन ये रुझान भारतीय लोकतंत्र में लगातार गिरावट का सूचक है। नेहरू- गांधी परिवार का नेतृत्व जब कांग्रेस में सहज स्वीकार्य होता गया, तब कम-से-कम सियासत के बाकी हिस्सों से उसके खिलाफ आवाज उठती थी। वंशवाद बताकर उसकी आलोचना की जाती थी। लेकिन भारत भर में व्यापक रूप से फैले ऐसे वंशवाद को लेकर आज कहीं विरोध भाव नजर नहीं आता। तो क्या राजनीति के कुछ परिवारों में सिमटने और लोकतंत्र के कुलीनतंत्र में तब्दील होने की विद्रूपता को सबने स्वीकार कर लिया है?

By NI Editorial

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