जहां भी जारी दिशानिर्देशों का उल्लंघन कर बुल्डोजर चलता है, वहां सुप्रीम कोर्ट अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का अधिकार रखता है। मगर अब तक ऐसा एक भी मामला सामने नहीं आया है। नतीजतन, अधिकारी बेखौफ बने हुए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रयागराज में छह व्यक्तियों के मकान बुल्डोजर से गिराने के मामले को ‘अमानवीय और अवैध’ माना। कोर्ट ने आवास के अधिकार का भी हवाला दिया। कहा कि प्रशासन मनमाने ढंग से किसी के निवास को जमींदोज नहीं कर सकता। तो सर्वोच्च न्यायालय ने पीड़ित परिवारों को दस-दस लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है।
जजों ने कहा कि इस घटना से न्यायालय की संवेदना आहत हुई है। इस रूप में सर्वोच्च अदालत ने भारत के जागरूक नागरिकों के एक बड़े तबके की भावनाओं को आवाज दी है। इसके बावजूद “बुल्डोजर न्याय” की बढ़ी प्रवृत्ति पर रोक लगने या ऐसे मामलों में पूरा न्याय होने की मामूली आस ही जगी है। गौरतलब है- ये घटना 2021 की है।
इसे रेखांकित करने की जरूरत है कि अमानवीयता या आवास के अधिकार के हनन से कहीं ज्यादा ऐसे मामले कानून की सत्ता के सिद्धांत का खुलेआम उल्लंघन हैं। खुद सुप्रीम कोर्ट “बुल्डोजर न्याय” पर रोक लगा चुका है। उसने इस संबंध में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसके बावजूद ऐसी घटनाएं ना सिर्फ जारी हैं, बल्कि उनका इलाकाई दायरा भी फैलता चला गया है।
हाल में महाराष्ट्र भी कानून की सत्ता और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों को ठेंगा दिखाने वाले राज्यों में शामिल हो गया है। मुद्दा यह है कि न्यायपालिका ऐसे मामलों में अपनी तौहीन रोकने के लिए सक्रिय क्यों नहीं है? जहां भी जारी दिशानिर्देशों का उल्लंघन कर बुल्डोजर चलता है, वहां सुप्रीम कोर्ट अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का अधिकार रखता है।
मगर अब तक ऐसा एक भी मामला सामने नहीं आया है। नतीजतन, एक खास राजनीतिक परियोजना के तहत बुल्डोजर चलवाने वाली सरकारें और उनके मातहत अधिकारी बेखौफ बने हुए हैं। मानवीयता जैसे उच्च आदर्शों के उल्लेख से उन्हें रोका जा सकेगा, इसकी उम्मीद कम ही है।
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Pic Credit: ANI
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