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लोकतंत्र में राजदंड नहीं होता, ब्रिटेन की राजशाही में होता है

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भोपाल। सेंगोल नामक एक “दंड” जो कभी चोला और चालुक्य राजवंशों में सत्ता हस्तांतरण का प्रतीक होता था, उसे 21 वीं सदी में लोकतन्त्र की जन संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाथा में लेकर परोछ रूप से सत्ता के दैवी सिद्धान्त को मान्यता दी हैं ! वह भी उस संसद के सामने जिसके सदस्य जनता से निर्वाचित हो कर आते हैं ! जिसमें गद्दी विरासत से नहीं मिलती वरन राजशाही में तो वंशानुगत ही सत्ता का हस्तांतरण होता है।

ब्रिटेन में हाल ही में हुए सम्राट चार्ल्स थर्ड की ताजपोशी में प्रोटेस्टेंट धरम के द्वितीय प्रमुख लॉर्ड कैनटनबरी ने उन्हें राजदंड सौपा था। प्रथा है कि दिवंगत महारानी की अंतिम यात्रा में उनका मुकुट – राजदंड और सामराज्य का प्रतीक ‘ग्लोब ‘ उनके शव पर रखा रहता हैं। ताबूत को कब्र में उतारने के समय तीनों राज चिन्ह उतार लिए जाते हैं। बाद में नए राजा को धरम गुरु उन्हंे ये सौंपते हैं।

रविवार को वैभवपूर्ण समारोह में जिस प्रकार सेंट्रल विस्टा जिसे नया संसद भवन कहा जाएगा उसके उद्घाटन के अवसर पर तामिलनाडु के धरमपुरम अधिनम के 25 सन्यासियों की ओर से यह सेंगोल एक आयोजन में प्रधानमंत्री आवास पर उन्हें दिया गया। जिसे नयी संसद में प्रधानमंत्री स्थापित करेंगे।

लोकतंत्र में इस प्रकार के राजसी और वैभव पूर्ण आयोजन की तुलना लंदन मे सम्राट चार्ल्स की ताजपोशी के मुक़ाबले इसलिए बदरंग है कि इस समारोह में आम जनता की कोई भागीदारी नहीं दिखाई दे रही। एक ओर राजशाही में जनता के उत्साह को सारी दुनिया ने देखा था और सेंट्रल विस्टा में नयी संसद के उद्घाटन को लेकर भारत में भी वैसा उत्साह नहीं हैं। यही इस आयोजन की सबसे बड़ी विफलता हैं ! क्यूंकि उन्होंने अपनी परंपरा का पालन किया और हमारे प्रधानमंत्री रोज–ब रोज नयी परंपरा स्थापित करने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं। शायद यही इनकी विफलता हैं।

2. आयोजन तो बहाना है –मकसद दक्षिण के राज्यो में पैर जमाने की कोशिश है। अगर हम विगत दिनों की घटनाओं पर गौर करें तो पाएंगे की मोदी – शाह की जोड़ी को विधानसभा चुनावों में यह लगातार तीसरी पराजय है। बंगाल, हिमांचल और कर्नाटक में इन नेताओं के बड़बोलेपन की पोल चुनाव परिणामों में मतदाता ने खोल दी ! केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक में बीजेपी की मूल संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की चालीस से पचास सालों की कोशिश के बाद भी बीजेपी को वहां के समाज ने दुतकारा है। क्यूंकि बताने के लिए आरएसएस एक सामाजिक संगठन है, जो वास्तव में बीजेपी नामक दल के लिए जमीन बनाने का काम करता हैं।

3. यह एक संयोग ही है कि इन तीनों दक्षिणी प्रदेशों में उतार भारत की तुलना में कहीं अधिक मंदिर है और यंहां की सनातनी आबादी भी अधिक धरम भीरु और मंदिर जाने वाली हैं। मंजूनाथ, तिरुपति और त्रिवेन्द्रम के पद्यनाभ का मंदिर विश्व के सर्वाधिक अमीर उपासना स्थलों के रूप में जाने जाते है। केरल के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश को लेकर जब मंदिर प्रबंधन और स्त्री मुक्ति मोर्चा में टकराव हुआ तब भी आरएसएस ने कट्टरवादी मंदिर प्रबंधन के समर्थन में आंदोलन किया। इस आशा के साथ की कट्टर हिंदुवादी लोग उनके पालित –पोषित राजनीतिक दल बीजेपी को राजनीतिक समर्थन देंगे। शायद कुछ हुआ भी, परंतु उसके बाद हुए सभी लोकसभा और विधानसभा चुनावों में उन्हें निराशा ही हाथ लगी। जब –जब आरएसएस और वहां के वामपंथी पार्टी अथवा काँग्रेस पार्टी समर्थकों में हिंसक भिड़ंत हुई तब तब दिल्ली के गृह मंत्री का फोन त्रिवेन्द्रम में मुख्यमंत्री विजयन और राज्यपाल को पहुँच जाता था चाहे वह राजनाथ सिंह रहे हो अथवा अमित शाह। यंहां तक कि राज्यपाल से संबन्धित घटना की रिपोर्ट भी दिल्ली तलब कर ली जाती थी। ऐसी तत्परता मोदी सरकार मणिपुर में हो रही जातीय हिंशा के मामले नहीं दिखा रही है, जिसमें फौज – केंद्रीय बल और तथा प्रदेश की पुलिस भी लगी हुई हैं।
यह घटनाएं साबित करती है कि केन्द्रीय सरकार का ध्यान राजनीतिक लाभ के लिए होता हैं ना कि जमीन की समस्या की गंभीरता को देखते हुए।

4. आरएसएस और बीजेपी नेत्रत्व तमिलनाडू में आज़ादी के समय से ही पैर जमाने के लिए प्रयासरत रहे हंै। उसका कारण था कि 1933 और उसके बाद की प्रांतीय सभाओं में तथा मद्रास प्रांत (जैसा ब्रिटिश काल में जाना जाता था) में ब्राह्मण और चेट्टियार का वर्चस्व रहा करता था। संघ की समझ यह थी कि जिस प्रांत की जनता अपने समाज के ब्राह्मण वर्ग को नेत्रत्व मानती है –और जहां के महिला और पुरुष सुबह –सुबह मंदिरों में दर्शन के लिए लाइन लगा कर अपना दिन शुरू करते हैं उस राज्य की ज़मीन संघ की कट्टरवादी हिन्दुत्व जिसका प्रतिपादन गांधी हत्याकांड के आरोपी रहे सावरकर ने किया (गौर तलब है कि नयी संसद का उदघाटन भी सावरकर की जन्म जयंती को ही हुआ है, संयोग तो नहीं प्रयोग ही है) उसका इस क्षेत्र में फलना –फूलना तो पक्का है।

परंतु वे भूल गए कि रामास्वामी नायकर का द्रविड़ कडगम आंदोलन भी चालीस साल पूरे कर रहा था। उनके सिधान्त भी केवल राजनीतिक ही नहीं थे वरन वे सनातन धरम के अवसरवाद और वर्ण व्यवस्था पर गहरी चोट करते थे। कडगम आंदोलन सनातन धरम की आस्थाओं के बिलकुल विपरीत था। यही कारण है कि कमराज की 1962 में सरकार काँग्रेस की अंतिम सरकार थी। उसके बाद डीएम के अन्नादूरई के नेत्रत्व में सरकार बनी। वे पेरियार के निकटतम थे परंतु उनके द्वरा एक ब्राह्मण कन्या से विवाह को लेकर उन्होंने संगठन तोड़ दिया। द्रविड़ आंदोलन में सवर्ण और ब्राह्मण का कट्टर विरोध था। तब से लेकर आज तक वहां करुणानिधि के डीएमके और जयललिता वाले एआईडीएमके की ही सरकरें बनी हंै। इस दौरान बीजेपी को कोई राजनीतिक उपलब्धि नहीं हुई।

केरल, आंध्र, तमिलनाडू में हमेशा असफल होने के बाद संघ और मोदी के पास, पुनः धरम को परंपरा और पुरातन गौरव के लिफाफे में लपेट कर देश के सामने रखने की मजबूरी है। अगर नयी संसद के उदघाटन पर मोदी जी का भाषण सुने तो पाएंगे पुरातन गौरव – इतिहास का वैभवशाली समय अमरतकाल और आत्म निर्भर भारत – जैसे शब्द पाएंगे। जो उनके दल की सोच को दर्शाते है जिसमें वर्तमान इतिहास को बदलने की तड़प है। अब वे 1 अगस्त 1947 के पंडित नेहरू के ऐतिहासिक भाषण जैसा तो बोल ही नहीं सकते तो अवसर इवैंट बनाकर देश के सामने पेश कर सकते हैं।

परंतु दक्षिण के लोग कितने भी धरम प्रवण हो परंतु वे धार्मिक कट्टरता के जहर को पूरी तरह अस्वीकार करते हैं। यह केरल की अनेक घटनाओं से सिद्ध हैं।

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