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ऐसी व्यवस्था, जो अच्छी शिक्षा नहीं देती, युवाओं से ही डरने लगती है!

सभ्यता अगली पीढ़ी में अपनी आशा निवेश करती है। नौकरशाही अगली पीढ़ी को फाइलों, नियमों और कट-ऑफ के बीच छांटती है। जब शिक्षा जैसी सृजनात्मक प्रक्रिया को केवल परीक्षा एजेंसियों की यांत्रिक व्यवस्था में बदल दिया जाता है, तब यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं होती। यह उस गणराज्य के नैतिक उद्देश्य का क्षरण बन जाती है। जिस व्यवस्था का मूल काम ही करोड़ों युवाओं को बाहर रखना हो, वहा शिक्षा की व्यवस्था नहीं हो सकती।

किसी भी लोकतंत्र की पहचान इस बात से नहीं होती कि वह कितनी कठिन परीक्षाएं लेता है। उसकी पहचान इससे होती है कि वह अपने युवाओं के लिए कितने अवसर बनाता है। जो राज्य अपने अधिकांश युवाओं को सफल बनाने के बजाय उन्हें असफल घोषित करने की मशीन बन जाए, वह शिक्षा नहीं चला रहा होता; बल्कि बेकारी, बहिष्कार का प्रशासन चला रहा होता है।

यहीं एक सभ्यता और एक नौकरशाही के बीच सबसे बड़ा अंतर दिखाई देता है। सभ्यता अगली पीढ़ी में अपनी आशा निवेश करती है। नौकरशाही अगली पीढ़ी को फाइलों, नियमों और कट-ऑफ के बीच छांटती है। जब शिक्षा जैसी सृजनात्मक प्रक्रिया को केवल परीक्षा एजेंसियों की यांत्रिक व्यवस्था में बदल दिया जाता है, तब यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं होती। यह उस गणराज्य के नैतिक उद्देश्य का क्षरण बन जाती है।

जिस व्यवस्था का मूल काम ही करोड़ों युवाओं को बाहर रखना हो, वहा शिक्षा की व्यवस्था नहीं हो सकती। उसका पूरा ढांचा मानकीकृत चिंता, प्रतियोगी भय और बड़े पैमाने पर असफल घोषित करने पर टिका होता है। वहां मनुष्य कोई संभावना नहीं होता, बल्कि एक संख्या होता है; प्रतिभा कोई दीप नहीं, बल्कि डेटा होती है; और नागरिक कोई भविष्य नहीं, बल्कि एक आवेदन-पत्र बनकर रह जाता है।

ऐसी परीक्षा, जिसका सबसे बड़ा उद्देश्य ज्ञान के संसार में प्रवेश कराना नहीं बल्कि प्रवेश रोकना हो, वह स्वतंत्र समाज की मूल भावना के विरुद्ध खड़ी होती है। संविधान ने ऐसे भारत की कल्पना नहीं की थी, जहां करोड़ों युवा जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय एक प्रवेश-पत्र की प्रतीक्षा में बिताएं। उसने ऐसे नागरिक की कल्पना की थी जो विवेकवान हो, स्वाभिमानी हो और अपने भाग्य का स्वयं निर्माता हो।

जब शिक्षा अपनी आत्मा खो देती है, तब राज्य विकास का माध्यम नहीं रह जाता। वह अवसरों का निर्माता भी नहीं रहता। वह केवल दरवाजे पर बैठा चौकीदार बन जाता है, जिसका पहला काम भीतर आने वालों से अधिक बाहर रह जाने वालों की गिनती करना होता है।

इसलिए सड़कों पर फूटने वाला गुस्सा शायद ही कभी केवल प्रश्नपत्र लीक होने, सर्वर बैठ जाने या किसी अधिकारी की अक्षमता का परिणाम होता है। वे तो केवल चिनगारियां होती हैं। आग कहीं अधिक गहरी होती है। वह उस व्यवस्था के खिलाफ जमा होती है, जो युवा नागरिक को अधिकार-संपन्न व्यक्ति नहीं, बल्कि अंतहीन प्रतियोगिता में फंसा अभ्यर्थी मानने लगती है।

संवेदनहीन सत्ता कभी एक ही छलांग में नागरिक की स्वतंत्रता नहीं छीनती। वह छोटे-छोटे अतिक्रमणों से आगे बढ़ती है। उसे पता होता है कि रोजमर्रा की जद्दोजहद में उलझा समाज हर अन्याय का प्रतिरोध नहीं कर पाएगा। इसलिए वह धीरे-धीरे नागरिक के आत्मसम्मान की सीमाएं पीछे धकेलती जाती है। उसका सबसे भरोसेमंद साथी पुलिस नहीं, समय होता है; अदालत नहीं, नागरिक की थकान होती है।

संस्थागत संवेदनशीलता से मुक्त सत्ता हमेशा अपनी सीमाएं परखती है। वह बड़े आक्रमणों से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे अतिक्रमणों से आगे बढ़ती है। उसे मालूम रहता है कि रोजमर्रा की जद्दोजहद में उलझा समाज शायद ही कभी इतना संगठित हो पाए कि हर अन्याय का प्रतिकार कर सके। इसलिए राज्य अनेक बार नागरिकों के आत्मसम्मान पर गहरी चोट पहुंचाकर भी बच निकलता है। उसे भरोसा रहता है कि समय, थकान और बिखराव उसके सबसे विश्वसनीय सहयोगी हैं।

फिर भी इतिहास में ऐसे क्षण आते हैं, जब कोई अदृश्य सीमा पार हो जाती है। बिखरे हुए कारण अचानक एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। किसी व्यंग्यपूर्ण मीम की वायरल लहर, न्यायपालिका की कोई असंवेदनशील टिप्पणी, या अनशन पर बैठे किसी छात्र का शांत नैतिक साहस—ये सब मिलकर ऐसा वातावरण बना देते हैं, जिसमें सत्ता पहली बार स्वयं को असुरक्षित पाती है। उसे पीछे हटना पड़ता है, भले ही अस्थायी रूप से।

ऐसे क्षणों को स्थायी विजय समझ लेना आसान है। लेकिन वे स्थायी मोड़ नहीं होते। वे बिजली की चमक की तरह होते हैं—क्षणिक, चकित कर देने वाले और सत्ता के लिए भयावह, किंतु स्वभावतः अप्रत्याशित। फुटपाथों और सड़कों पर जो घटित होता है, वह कोई तैयार रणनीति या बार-बार दोहराया जा सकने वाला मॉडल नहीं होता। वह जनाक्रोश का स्वाभाविक संगम होता है।

यदि उसके बाद संस्थागत परिवर्तन नहीं होते, तो वही राज्य, जो आज पीछे हटता दिखाई देता है, कल चुपचाप अपनी घेराबंदी फिर खड़ी कर लेता है। सत्ता अक्सर प्रत्यक्ष टकराव से नहीं, बल्कि धीमे और लगभग अदृश्य तरीकों से अपनी खोई हुई जमीन वापस हासिल करती है।

नागरिक और राज्य के बीच का संतुलन केवल आंदोलनों के उफान से स्थायी रूप से बहाल नहीं किया जा सकता। इस संतुलन को फिर वहीं स्थापित करना होगा, जहां सत्ता सेवा का माध्यम बने और नागरिक वास्तविक स्वामी। इसके लिए केवल सड़कों पर साहस दिखाना पर्याप्त नहीं है। आवश्यकता ऐसे दूरदर्शी नेतृत्व की है, जो जनाक्रोश की असंगठित ऊर्जा को संवैधानिक अनुशासन और स्थायी संस्थागत परिवर्तन में बदल सके।

लेकिन तत्कालीन राजनीति से भी बड़ा एक प्रश्न हमारे सामने खड़ा है। प्रश्न केवल यह नहीं कि हमारा राज्य कैसा है; असली प्रश्न यह है कि हम स्वयं किस प्रकार का समाज बनते जा रहे हैं। हर समाज के भीतर अपनी सर्वोच्च संभावना भी छिपी होती है और अपना सबसे पतित रूप भी। पिछले कई दशकों में सार्वजनिक शिक्षा के लगातार क्षरण, औसत दर्जे की वैचारिकता को प्रतिष्ठा मिलने और राजनीतिक अस्तित्व बचाने की संस्कृति ने युवाओं की ऊर्जा को क्रमशः कुंद किया है। एक ऐसा देश, जिसकी सबसे बड़ी पूंजी उसकी युवा शक्ति होनी चाहिए थी, वहां करोड़ों युवाओं की सृजनात्मक क्षमता सिकुड़कर घटते अवसरों की एक हताश दौड़ में बदलती जा रही है।

हमारे सामने बार-बार हमारे ही सबसे कमजोर और सबसे निराशाजनक रूप को आदर्श बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। और दुर्भाग्य यह है कि हम अक्सर उसी को स्वीकार भी कर लेते हैं।

किसी राष्ट्र को इस दलदल से बाहर निकालने वाली बातचीत आंसू गैस के धुएं के बीच या किसी प्रशासनिक वार्ता की मेज पर शुरू नहीं होती। उसका जन्म उन विरल नेताओं की नैतिक कल्पना में होता है, जो केवल जनाक्रोश की लहर पर सवार नहीं होते, बल्कि पूरी सभ्यता के सोए हुए विवेक को जगाने का साहस रखते हैं।

जब नेहा बोरा जैसी युवा आवाज़ें आगे बढ़कर इस रिक्तता को भरने का प्रयास करती हैं, जब वे ठंडी रातों, प्रशासनिक उदासीनता और सत्ता की बेरुखी के बीच शांत दृढ़ता के साथ डटी रहती हैं, तब वे हमें उस नैतिक स्पष्टता की झलक दिखाती हैं, जिसकी कमी हम लंबे समय से महसूस कर रहे हैं। उनका साहस खरीदा नहीं जा सकता, डराकर दबाया नहीं जा सकता और न ही निराशा का पाठ पढ़ाकर उसे कुंद किया जा सकता।

वे हमें यह भी याद दिलाती हैं कि युवा केवल एक विफल व्यवस्था के शिकार नहीं हैं। वे उस भविष्य के न्यासी हैं, जिसे हमने अभी तक ठीक से पहचाना ही नहीं।

सौ वर्ष बाद आज के प्रशासनिक संक्षिप्त नाम, संस्थागत व्यवस्थाएं और परीक्षा एजेंसियां इतिहास की धूल भरी पुस्तकों के फुटनोट बनकर रह जाएंगी। लेकिन एक प्रश्न तब भी हमारे सामने खड़ा रहेगा—क्या हमने ऐसा राज्य बनाया था, जो अपनी युवा पीढ़ी को नियंत्रण में रखने योग्य समस्या समझता था, या ऐसा गणराज्य, जिसने अपने युवाओं को अपनी सबसे बड़ी नैतिक जिम्मेदारी माना?

यदि कोई राष्ट्र अपने युवाओं को नौकरशाही के एल्गोरिद्मों से छांटकर बाहर कर देने योग्य असुविधा समझने लगे, तो अंततः उसे विभाजित, आक्रोश से भरा और विश्वास खो चुका समाज ही मिलेगा। ऐसी व्यवस्था अपने ही भविष्य को क्षीण करती है।

लेकिन यदि वह यह स्मरण रखे कि शिक्षा केवल पाठ्यक्रम या परीक्षा नहीं, बल्कि एक पीढ़ी द्वारा अगली पीढ़ी के प्रति व्यक्त किया गया विश्वास है; एक ऐसा वचन है, जो भविष्य को सौंपा जाता है—तब वह समझ सकेगा कि कोई भी सत्ता, चाहे वह कितनी ही शक्तिशाली और जड़ क्यों न दिखाई दे, उस पीढ़ी से अधिक समय तक टिक नहीं सकती, जिसने अपने विवेक, अपनी चेतना और अपने मन पर स्वयं अधिकार करने का निर्णय कर लिया हो।

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