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नीरद सी. चौधरी का लिखा सही साबित हुआ

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भारतीय साहित्य तथा बौद्धिकता का घोर पतन स्वतंत्र भारत में हुआ। ब्रिटिश राज में हमारी भाषाओं में श्रेष्ठ साहित्य रचे जाते रहे। नई साहित्य विधाएं पनपीं। देश-विदेश की सर्वोत्तम रचनाओं का अध्ययन-अध्यापन होता था। स्कूल से विश्वविद्यालयों तक सुयोग्य शिक्षक, प्रशासक ही नियुक्त, प्रोन्नत, सम्मानित होते रहे। यह सब स्वतंत्र भारत में तेजी से गिरा।..जिस यूरोपीय शिक्षा से ही यहाँ असंख्य विद्वान, चिंतक, वैज्ञानिक, साहित्यकार बने, उसी की अंधनिन्दा करके गत सौ साल से हमारे नेताओं ने सस्ती तालियाँ बटोरी हैं। वे अनजान जनता व खुद को भी बेवकूफ बनाते हैं।

ब्रिटिश राज और देसी राज-1: अनूठे इतिहासकार नीरद सी. चौधरी (1897-1999) ने अपनी पहली पुस्तक ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ एन अननोन इंडियन’ के समर्पण में लिखा था, ” भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्मृति को जिस ने हमें प्रजा तो बनाया पर नागरिकता देना रोक रखा; जिस पर हम में सब ने चुनौती दी: ‘मैं (भी) ब्रिटिश नागरिक हूँ ‘।  क्योंकि हम में जो कुछ भी अच्छा और जीवन्त था उसे बनाने, आकार और गति देने का काम भी उसी ब्रिटिश राज ने किया।”

उस अनूठी पुस्तक में 19वीं सदी के अंतिम और 20वीं सदी के आरंभिक दो दशकों के भारत का जीवंत इतिहास मिलता है। उस पुस्तक पर हमारे बौद्धिकों ने नाक-भौं सिकोड़ा। सत्ताधारियों ने नीरद बाबू को दंडित किया! पर उन की बातों का, जो बाद की पुस्तकों, लेखों में विस्तार से आती रहीं, खंडन कोई न कर सका।

तब से लगभग तीन चौथाई सदी बीत चुकी। नीरद बाबू की मूलभूत प्रस्थापना कि बीसवीं सदी में राष्ट्रवादी आंदोलन के उभार के साथ ही हमारा बौद्धिक-सांस्कृतिक क्षय (‘डिके’) फिर शुरू हो गया। जबकि 19वीं सदी के अंत तक भारतीयों में यूरोप से सीखने और विवेकशील विचार की प्रवृत्ति रही थी। अधिकांश अग्रणी भारतीय यहाँ ब्रिटिश राज को वरदान मानते थे। बंकिम चन्द्र का ‘आनन्द मठ’ कुछ इसी संदेश के साथ समाप्त होता है।

परन्तु बीसवीं सदी के आरंभ से राष्ट्रवादी आंदोलन की मानसिकता ने उसे पलट दिया। देशभक्ति के नाम पर लोगों में थोक भाव से नकारात्मकता, द्वेष, और आडंबर भर डाला। तब से हमारी बौद्धिकता और चरित्र निरंतर गिरता गया है। केवल बाद में वही द्वेष-घृणा यहाँ आपस में एक दूसरे दल, गुट, क्षेत्र के लिए स्थानांतरित हो गई।

अतः कालगति ने नीरद बाबू की प्रस्थापना को गलत नहीं साबित किया है। हमारे कृषि, उद्योग व व्यापार में हुई उन्नति समृद्ध प्राकृतिक संपदा और नई तकनीकों से जुड़ी है। पर तकनीकी पश्चिमी देन है जिस के परिणामों का संपूर्ण श्रेय हम नहीं ले सकते। गत सात दशकों में सभी आविष्कार यूरोपियनों, अमरीकियों ने ही किए हैं। यहाँ राय, साहनी, रमण, साहा, बसु, भटनागर, भाभा, साराभाई, जैसे बड़े वैज्ञानिक ब्रिटिश राज में ही हुए। राममोहन, विवेकानन्द, टैगोर, जैसे महान विचारक भी। बंकिम, प्रेमचंद, पंत, निराला, महादेवी, दिनकर, अज्ञेय, निर्मल, जैसे श्रेष्ठ कवि-लेखक और जदुनाथ सरकार, शि. वा. आप्टे, भंडारकर, जैसे उदभट् विद्वान भी। सब के सब अंग्रेजों की शिक्षा लेकर बने थे।

वैसे मनीषियों, विचारकों, वैज्ञानिकों, विद्वानों का स्वतंत्र भारत में अकाल पड़ गया! क्योंकि राष्ट्रीय आंदोलन ने अंग्रेजों से द्वेष के साथ यूरोपीय ज्ञान-विज्ञान, संस्कृति, मूल्यों, विद्वानों, आदि से भी दुराव प्रेरित किया। सत्यनिष्ठ अन्वेषण के बदले लफ्फाजी शुरू हुई, जो आसान थी और हमारी आदत बन गई। वही स्वतंत्र भारत में शिक्षा के राजनीतिकरण, इतिहास के मिथ्याकरण, दलीय स्वार्थ, नित बढ़ते आरक्षण, आदि में फली-फूली। हम ने अपनी प्रतिभाओं को कुंठित करने और देश से बाहर भगाने का चलन बनाया।

भारतीय साहित्य तथा बौद्धिकता का घोर पतन स्वतंत्र भारत में हुआ। ब्रिटिश राज में हमारी भाषाओं में श्रेष्ठ साहित्य रचे जाते रहे। नई साहित्य विधाएं पनपीं। देश-विदेश की सर्वोत्तम रचनाओं का अध्ययन-अध्यापन होता था। स्कूल से विश्वविद्यालयों तक सुयोग्य शिक्षक, प्रशासक ही नियुक्त, प्रोन्नत, सम्मानित होते रहे। यह सब स्वतंत्र भारत में तेजी से गिरा।

पर जिस यूरोपीय शिक्षा से ही यहाँ असंख्य विद्वान, चिंतक, वैज्ञानिक, साहित्यकार बने, उसी की अंधनिन्दा करके गत सौ साल से हमारे नेताओं ने सस्ती तालियाँ बटोरी हैं। वे अनजान जनता व खुद को भी बेवकूफ बनाते हैं। जबकि अंग्रेजियत की ही मतिहीन दासता करते, अपने हाथों से भारतीय भाषाओं एवं साहित्य का गला घोंटते रहे हैं – जो अंग्रेजों ने कभी नहीं किया था! यह ब्रिटिश राज में स्कूल-कॉलेजों की पाठ्य-सामग्री, पत्र-पत्रिकाओं, प्रकाशनों और अपने राज में पाठ्य-सामग्री, पत्र-पत्रिकाओं, प्रकाशनों की तुलना कर देख लें।

वही हाल भारत की महान धरोहरों के प्रति हुआ। अंग्रेज पुरातत्ववेत्ताओं, विद्वानों, अफसरों ने जितना हमारी महान धरोहरों को खोज-खोजकर संकलित, संरक्षित, गौरवान्वित तथा विश्व-प्रदर्शित किया, उस का दसांश भी स्वतंत्र भारत में न हुआ! उलटे, देसी शासक सच्ची धरोहरें उपेक्षित कर मुस्लिम महिमा-मंडन में लग पड़े। विदेशी अतिथियों को भी मुगलिया कब्रें दिखाई जाती हैं। उन्हीं पर चादर चढ़ाने, ‘विश्व-धरोहर’ बनाने की धुन हमारे नेताओं को रही है। ब्रिटिश राज में ‘ताजमहल’ कोई जानता भी न था!

प्रशासन में विश्वास भी स्वतंत्र भारत में बेतरह गिरा। ढिलाई, मनमानी, परजीविता, भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार, और कई बातों में अराजकता का बोलबाला होता गया। ब्रिटिश राज में साधारण सिपाही की भी हनक थी। आज एस.पी. को भी पहले अपनी चिन्ता रहती है। भौतिक व कैरियर, दोनों दृष्टि से। सत्यनिष्ठ अधिकारियों को राजनीतिक हस्तक्षेप शायद ही काम करने देता है। यह ब्रिटिश राज में कदापि न था।

आज अधिकांश उच्च नियुक्तियाँ योग्यता को दरकिनार कर होती हैं। जबकि अंग्रेज योग्यता को ही कसौटी रखते थे, चाहे उम्मीदवार अंग्रेज हो या भारतीय। अब गड़बड़ियों की शिकायतें मानो अंधे कुएं में जाती हैं। ब्रिटिश राज में साधारण किसान द्वारा भी पोस्टकार्ड लिख देने पर जाँच-कार्रवाई होती थी। आज राजकीय अफसर भी कहीं अनुचित चोट झेलें तो कोई देखनहार नहीं। महाप्रभुओं का अधिकांश समय ताउम्र प्रभु बने रहने की तिकड़मों, जिम्मेदारी से कटने की तरकीबों, तथा उपदेशने में जाता है। यह सब अंग्रेजों में कभी नहीं पाया गया। हमारे नेता मुख्यतः अपनी सेवा तथा प्रतिद्वंद्वी को नीचा दिखाने में लगे रहते हैं। राजकाज की उपेक्षा और सार्वजनिक संसाधनों का घोर दुरुपयोग करते हुए।

ध्यान दें: ब्रिटिश राज में किसी शासक, प्रशासक द्वारा अपने ही नियम-कानून तोड़ने-मरोड़ने, अपनी ही संस्थाएं चौपट करने, अपने पिछले शासक, या शासन के अन्य भागीदार को गिराने, कीचड़ उछालने में लगे रहना अकल्पनीय था! फलत: संपूर्ण शासन एकरूप, एकदिश, और दक्ष था। आज यहाँ विभिन्न दलों और एक दल में भी आपसी मार-पेंच नेताओं का अधिकांश समय खाती है। प्रशासन रामभरोसे और बाबू-भरोसे चलता है।

स्वतंत्र भारत में सार्वजनिक विभाग, निर्माण, ‘सौंदर्यीकरण’ अबाध बढ़ते गये हैं। प्रायः बिना खास सोच-विचार, गुणवत्ता सुनिश्चित किए, या परिणामों का आकलन किए। क्योंकि प्रायः निर्माणों का उद्देश्य ही कुछ और होता है, या हो जाता है। घोषित उद्देश्य गुम हो जाते हैं। अनावश्यक रूप से मकान दीवार रेलिंग किवाड़ खिड़की आदि सतत बनाना-तोड़ना-बनाना; अनाप-शनाप खरीद; नियमित फर्नीचर बदलाव; आदि राजकीय क्षेत्र में स्थाई काम हो गया है। पर बनते-बनते ही पुल, बिल्डिंग गिर जाने, रेलिंग झड़ जाने, सड़क बार-बार टूट जाने पर भी कुछ कार्रवाई नहीं होती। कारण सब जानते हैं।

ऐसा लज्जास्पद दृश्य ब्रिटिश राज के दो सौ साल में शायद एक भी न मिले। उन के बनाए भवन, ठिकाने, इलाके, टेबल, खूँटी, आदि सब सदैव उपयोगी, टिकाऊ, सुंदर, सुरुचिपूर्ण थे। तब के मामूली पुलिए, चौक, दुकानें, खुले आसमान के नीचे रखे बेंच, पाइप तक डेढ़-डेढ़ सौ सालों से मजबूती से टिके मिलते हैं! सब साधारण मजदूरों और साधारण टेक्नोलॉजी से बने हुए। जब बिजली तक नहीं आई थी।(जारी)

By शंकर शरण

हिन्दी लेखक और स्तंभकार। राजनीति शास्त्र प्रोफेसर। कई पुस्तकें प्रकाशित, जिन में कुछ महत्वपूर्ण हैं: 'भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहासलेखन', 'गाँधी अहिंसा और राजनीति', 'इस्लाम और कम्युनिज्म: तीन चेतावनियाँ', और 'संघ परिवार की राजनीति: एक हिन्दू आलोचना'।

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