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अनगिनत विद्रोह और वो बुनियादी सवाल!

शुरुआत के तीन दिन के अंदर ‘सत्याग्रह’ वेबसाइट पर संघर्ष (या समस्याओं) की 30 हजार से अधिक कहानियां दर्ज कराई गईं। उनमें सबसे ज्यादा संख्या शिक्षा, भ्रष्टाचार, जातीय भेदभाव, स्वास्थ्य सेवाओं, श्रम अधिकारों, और किसान से जुड़े मुद्दों की रहीं। इनसे संबंधित प्रवृष्टियां हजारों की संख्या में आईं।… वोट चोरी बड़ा मुद्दा है, जिसने भारत के राजनीतिक रूप से जागरूक तबकों को उद्वेलित किया है। इनके साथ जमीनी संघर्षों  को भी जोड़ कर देखें, तो बेशक इस समय देश में मौजूद बेचैनी के आलम का अंदाजा लगता है।

सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने हाल में अपने एक सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा- “जून में हुए CJP प्रदर्शनों ने देश में असंख्य छोटे‑बड़े विद्रोहों को जन्म दिया है। (मुख्य निर्वाचन आयुक्त) ज्ञानेश कुमार द्वारा की गई ‘वोट चोरी’ अब स्वतंत्रता के बाद भारत का सबसे बड़ा मुद्दा बन गई है। यह हमारे लोकतंत्र की जड़ पर चोट करती है। सरकार की अपने ‘तोते’ ज्ञानेश को बचाने के लिए प्रदर्शनों को दबाने की कोशिशें उलटी पड़ रही हैं। इससे जनता का गुस्सा और बढ़ रहा है, जो अब उबाल पर है।”

दरअसल, भूषण ने अंग्रेजी में लिखे इस पोस्ट में ‘million mutinies in the country’ लिखा, जिसका अनुवाद हमने ‘असंख्य छोटे-बड़े विद्रोहों’ के रूप में किया है। यह उपमा संभवतः उन्होंने मशहूर लेखक वी.एस. नॉयपॉल की पुस्तक A Million Mutinies Now से ली है। यह किताब नॉयपॉल की भारत संबंधी त्रि-कथा (Trilogy) की आखिरी रचना है, जो 1990 में प्रकाशित हुई थी।

नॉयपॉल की A Million Mutinies Now का सार है कि भारत की सतह पर दिखने वाली हलचल और उथल-पुथल किसी आने वाले विनाश का संकेत नहीं, बल्कि एक “बौद्धिक और सामाजिक जागरण” का परिणाम है। यह छोटे-छोटे विद्रोहों का ऐसा महा-समुद्र है, जो अंततः भारत को अपनी वास्तविक पहचान और स्वतंत्रता की ओर ले जा रहा है।

नायपॉल ने यह किताब 1980 के दशक में भारत यात्रा पर आने के बाद लिखी थी। यहां घूमते हुए उन्हें अहसास हुआ कि स्वतंत्रता के बाद का भारत अब ऐसे दौर में पहुंच गया है, जहां समाज के हर हिस्से में छोटे‑छोटे विद्रोह और असंतोष दिखाई देते हैं। लेकिन ये विद्रोह किसी बड़े क्रांतिकारी आंदोलन की तरह नहीं हैं, बल्कि जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, राजनीति और व्यक्तिगत आकांक्षाओं से जुड़े संघर्ष हैं। नायपॉल ने इसे भारत के बदलते समाज का प्रतीक माना- जहां लोग अब चुप नहीं रहते, बल्कि अपनी पहचान और अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते हैं।

संदर्भ के लिए यह उल्लेख कर लेना उचित होगा कि नॉयपॉल दरअसल संप्रदाय, जाति, क्षेत्र एवं भाषा की पहचान जता रही गतिविधियों से प्रभावित थे, जिन्हें भारतीय नवजागरण के दौर में संकीर्ण एवं भारत की राष्ट्रीय एकता के लिए चुनौती समझा जाता था। नेहरूवादी नीतियों एवं भारतीय धर्मनिरपेक्षता के वे कड़े आलोचक थे। उनका मानना था कि भारत में धर्मनिरपेक्षता का उपयोग अक्सर ऐतिहासिक सच्चाइयों और मध्यकालीन (यानी मुस्लिम) आक्रमणों के घावों को छिपाने के राजनीतिक हथकंडे के रूप में किया गया। अपनी इसी सोच के आधार पर नॉयपॉल ने बाबरी मस्जिद को तोड़ने के लिए हुए राम जन्मभूमि आंदोलन को भारत में एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक जागरण के रूप में देखा।

इस रूप में समझा जाएगा कि नरेंद्र मोदी का शासन उस कथित “ऐतिहासिक सांस्कृतिक जागरण” का ठोस परिणाम है। यानी आज देश जहां है, वह 1980-90 के दशकों की ‘Million Mutinies’ का परिणाम है। मगर अब बात जिन ‘Million Mutinies’ की हो रही है, वो दरअसल, उन परिणामों से बनी जकड़न से निकलने की जद्दोजहद की मिसाल हैं।

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने हाल में इन ‘छोटे-मोटे विद्रोहों’ को साझा मंच प्रदान करने की एक सराहनीय पहल की। सत्याग्रह (http://rahulgandhi।in/satyagraha वेबसाइट की शुरुआत करते हुए उन्होंने लिखाः “देशभर में लोग अपने हक़ के लिए लड़ रहे हैं- और अक्सर अकेले लड़ रहे हैं। Gen Z, छात्र, किसान, आदिवासी, दलित, महिलाएं- हर संघर्ष की अपनी कहानी है। पर जो आवाज़ अकेली उठती है, वो अक्सर दब जाती है। ‘सत्याग्रह’ इन्हीं आवाज़ों को एक नक्शे पर साथ लाने की पहल है। बापू ने यही सिखाया था- सच सबसे बड़ा हथियार है। पर उससे भी बड़ा हथियार है, एकता में सच के साथ खड़े होना। अगर आप भी किसी अन्याय से लड़ रहे हैं- अपनी कहानी भेजिए। दो मिनट लगेंगे। आपकी कहानी नक्शे पर आएगी। आप देखेंगे कि आपकी तरह और कौन-कौन लड़ रहा है। और मैं जो कर सकता हूं, करुंगा- संसद में, सड़क पर, खत लिखकर, जहां भी मेरी ज़रूरत हो वहां आपके साथ खड़े होकर- नेता विपक्ष के रूप में ये मेरी ज़िम्मेदारी है। अपने सत्याग्रह की कहानी मुझे यहां बताएं।”

इस पहल की शुरुआत के तीन के अंदर ‘सत्याग्रह’ वेबसाइट पर संघर्ष (या समस्याओं) की 30 हजार से अधिक कहानियां दर्ज कराई गईं। उनमें सबसे ज्यादा संख्या शिक्षा, भ्रष्टाचार, जातीय भेदभाव, स्वास्थ्य सेवाओं, श्रम अधिकारों, और किसान से जुड़े मुद्दों की रहीं। इनसे संबंधित प्रवृष्टियां हजारों की संख्या में आईं। जबकि “वोट चोरी” से संबंधित जिस संघर्ष को प्रशांत भूषण ने “स्वतंत्रता के बाद भारत का सबसे बड़ा मुद्दा” बताया है, उससे संबंधित सिर्फ 559 (सात अक्टूबर को दिन में एक बजे तक) शिकायतें दर्ज हुईं।

फिर भी यह निर्विवाद है कि वोट चोरी बड़ा मुद्दा है, जिसने भारत के राजनीतिक रूप से जागरूक तबकों को उद्वेलित किया है। कॉकरोच जनता पार्टी के इस आंदोलन में उतरने और उसे मिले भारी समर्थन से जाहिर है कि अभिजात्य वर्ग के एक बड़े हिस्से में भी “चुनावों को नियंत्रित” कर लिए जाने के आरोप को गंभीरता से लिया गया है। इस कारण मीडिया, सोशल मीडिया, और आम चर्चाओं में यह सवाल सर्वोपरि बना हुआ है।

इनके साथ जमीनी संघर्षों (जिनमें से कई ने राहुल गांधी की वेबसाइट पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है) को भी जोड़ कर देखें, तो बेशक इस समय देश में मौजूद बेचैनी के आलम का अंदाजा लगता है। इनके परिणामस्वरूप कई क्षेत्रों में सामाजिक अस्थिरता की स्थिति है। आर्थिक दबाव और उस कारण जन्में संघर्षों की कहानी तो लगभग पूरे देश में साकार होती दिखती है। लेकिन उनका कोई सकल एवं राष्ट्र-व्यापी प्रभाव उभरता अभी तक नजर नहीं आया है।

इस सिलसिले में व्लादीमीर इलिच लेनिन का वो कथन अक्सर याद आता है, जिसमें उन्होंने कहा था- There are no people– yet there is a mass of people। इस पूरे कथन का सार था- “जनता बहुत है, असंतोष भी बहुत है, लेकिन नेतृत्व नहीं है। कामगार वर्ग और समाज के अलग‑अलग हिस्सों से हर साल असंतुष्ट लोग सामने आते हैं, जो विरोध करना चाहते हैं और निरंकुश शासन के खिलाफ संघर्ष में मदद देने को तैयार हैं। पर समस्या यह है कि उन्हें दिशा देने वाले नेता और संगठनकर्ता नहीं हैं, जो सबकी ताकत को एकजुट करके संगठित और सामंजस्यपूर्ण आंदोलन बना सकें।” (On Organization)

इस कथन का आशय यह भी था कि संगठित करने वाले सक्षम नेतृत्व और रणनीतिकारों के अभाव के कारण क्रांतिकारी आंदोलन की ऊर्जा बिखर जाती है और उसका प्रभाव सीमित हो जाता है। इस बात की पुष्टि वैसे तो आधुनिक इतिहास के हर दौर में हुई है, लेकिन खासकर 21वीं सदी में इसके उदाहरण भरे-पड़े हैं। 2010 का दशक दुनिया भर में विशाल जन आंदोलनों के उभार का रहा। 2011 तो ऐसा वर्ष था, जब अमेरिकी पत्रिका टाइम ने अपनी सालाना रवायत के तहत “The Protester” को Person of the Year घोषित किया। उसका संदर्भ अरब स्प्रिंग (ट्यूनिशिया, मिस्र, लीबिया, सीरिया, बहरीन आदि में जन विद्रोह, अमेरिका में Occupy Wall Street आंदोलन, यूरोप (खास कर ग्रीस और स्पेन) में आर्थिक संकट के खिलाफ प्रदर्शनों, भारत में अन्ना आंदोलन, और मेक्सिको तथा अन्य कई देशों में अलग-अलग मुद्दों पर जन आंदोलनों से बना था।

मशहूर लेखक और पत्रकार विन्सेंट बोविन ने उन आंदोलन का लगभग एक दशक तक अध्ययन करने के बाद “If We Burn: The Mass Protest Decade and the Missing Revolution” नाम की किताब लिखी, जिसका प्रकाशन 2023 में हुआ। उसमें उन्होंने यही समझने की कोशिश की है कि 2010–20 के वैश्विक जन आंदोलन संरचनात्मक बदलाव में क्यों नहीं बदल पाए? उन्होंने लिखा कि ऐसे संघर्षों से अधिक से अधिक संबंधित देश में राजनीतिक शून्यता पैदा होती है, लेकिन यह क्षणिक या अस्थायी घटना बन कर रह जाती है। बेविन्स ने लिखा है:

“जन आंदोलन के दशक में, सड़कों पर (जन आक्रोश के) हुए अचानक विस्फोटों ने कई बार क्रांतिकारी हालात पैदा किए। लेकिन साधारण विरोध प्रदर्शन ऐसे हालात का लाभ उठाने के लिए बहुत कमजोर साबित होते हैं, और इस तरह के विरोध प्रदर्शन इस मोर्चे पर नाकाम रह जाते हैं। अगर आप मानते हैं कि आप एक बेहतर समाज बना सकते हैं… तो आपको खुद उस राजनीतिक खालीपन में प्रवेश करना चाहिए। लेकिन अलग‑अलग कारणों से सड़क पर उतरे बिखरे हुए व्यक्तियों के समूह सीधे सत्ता अपने हाथ में नहीं ले सकते, कम-से-कम पूरे समूह के रूप में तो नहीं ही। अगर कोई व्यक्ति समूह उस राजनीतिक खालीपन में जाकर जनता के नाम पर सत्ता लेता है, तो वह एक प्रकार के अग्रिम दस्ते (vanguard) की भूमिका निभाता है, जो एक विशेष वैचारिक परियोजना से प्रेरित होता है। कुछ आदर्शवादी, सत्ता‑विरोधी विचारधाराओं में मान लिया गया कि उथल-पुथल से ही नया समाज बन जाएगा, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हो पाया है।”

अर्थ यह कि सिर्फ सड़क पर हुआ विरोध क्रांति को दिशा नहीं दे सकता। सत्ता हाथ में लेने के लिए संगठित नेतृत्व और वैचारिक परियोजना की ज़रूरत होती है। मार्क्सवादी क्रांति के संदर्भ में ऐसी एक चर्चित टिप्पणी लेनिन की भी है। उन्होंने कहा था- “अक्सर कहा जाता है कि श्रमिक वर्ग स्वाभाविक रूप से समाजवाद की ओर आकर्षित होता है। यह बिल्कुल सही है, क्योंकि समाजवादी सिद्धांत श्रमिक वर्ग की दुर्दशा के कारणों को अन्य किसी भी अन्य सिद्धांत से अधिक गहराई से और सही ढंग से उजागर करता है। इसी वजह से मजदूर इसे आसानी से अपना लेते हैं- बशर्ते कि यह सिद्धांत खुद ‘स्वतःस्फूर्तता’ के आगे न झुक जाए और उस ‘स्वतःस्फूर्त’ बनी स्थिति को अपने अधीन कर ले। कामगार वर्ग स्वाभाविक रूप से समाजवाद की ओर बढ़ता है; फिर भी, सबसे व्यापक और लगातार नए रूपों में उभरती हुई पूंजीवादी विचारधारा भी स्वाभाविक रूप से कामगार वर्ग पर हावी रहती है।”

फिलहाल, भारत में बात मजदूर तबकों की लड़ाई की नहीं हो रही है। अभी संदर्भ पूंजीवादी ढांचे के तहत मिली सीमित आजादियों और अधिकारों की रक्षा का है। यह गौरतलब है कि इन आजादियों और अधिकारों को अधिक बड़े जन समूहों के साथ साझा करने पर एक दौर में राजी हुए शासक वर्ग इस युग में आकर ऐसी “रियायत” को माकूल और मुनासिब नहीं मान रहे हैं। यह एक वैश्विक परिघटना है। दुनिया भर में आम जन से ऐसी “रियायतों” को छीन लेने की परियोजना इस दौर की हकीकत है। इसके लिए लगभग हर जगह (जहां चुनावी लोकतंत्र है) धुर दक्षिणपंथी ताकतों को शासक समूहों ने अपना औजार बनाया है, जिन्होंने नफरत और विभेद की रणनीति से आम जन को भटकाने की अपनी क्षमता साबित की है।

लाजिम है कि ऐसी कोशिशों के खिलाफ प्रभावित जन समूहों ने प्रतिरोध का रास्ता अख्तियार किया है। जिस समय भारत में ‘Million Mutinies’ की बात हो रही है, उसी समय फ्रांस, स्पेन, जर्मनी और यहां तक कि पाकिस्तान में भी हो रहे बड़े जन प्रदर्शनों ने दुनिया का ध्यान खींच रखा है। कहा जा सकता है कि एक बार फिर “The Protester” अग्रिम कतार में आ खड़ा हुआ है। इससे संभव है कि कुछ जगह राजनीतिक शून्य पैदा हो। लेकिन उससे वो पृष्ठभूमि कितनी बदलेगी, जिसकी वजह से आवाम के हासिल अधिकारों पर तलवारें चली हैं और जिनसे आहत होकर लोग प्रतिरोध जताने के लिए प्रेरित हुए हैं?

जैसाकि ऊपर चर्चा हुई, भारत में ‘वोट चोरी’ एक बड़ा मसला है, लेकिन मुद्दे और भी हैं, जैसी झलक राहुल गांधी की पहल ‘सत्याग्रह’ पर देखने को मिली है। बल्कि एक तर्क यह हो सकता है कि उन समस्याओं (शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, रोजगार, रोजमर्रा की जिंदगी से संबंधित अन्य मसलों) से परेशान लोग अपनी वोट की ताकत से मौजूदा शासन तंत्र में कोई अस्थिरता पैदा ना करें, इसलिए उनके वोट के प्रभाव को कमजोर करना शासक वर्गों की फिलहाल सर्वोच्च प्राथमिकता बन गई है। इसलिए- एक व्यक्ति एक वोट, समान मूल्य- के सिद्धांत को व्यवहार में बचाना इस समय की भले सबसे बड़ी जरूरत हो, लेकिन इस सवाल को सिर्फ इससे ही बांध कर नहीं रखा जा सकता। यह कहना और बार-बार दोहराना जरूरी है कि वोट का अधिकार अपने-आप में अंतिम लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह आम जिंदगी को बेहतर बनाने का एक माध्यम भर है और इसीलिए महत्त्वपूर्ण है।

इस लिहाज से अधिक दूरगामी महत्त्व का प्रश्न यह है कि दशकों तक वोट का अधिकार मिले रहने के बावजूद बहुसंख्यक जनता की जिंदगी में उसका असर सीमित क्यों बना रहा और क्या गारंटी है कि आगे ऐसा नहीं होगा? इस नजरिए से वह बदलाव जरूरी हो जाता है, जैसा 2010-20 के दशक में ना हो पाने का जिक्र और उसके कारणों की पड़ताल विन्सेंट बोविन ने अपनी पुस्तक If We Burn में की है। इसलिए मौजूदा ‘Million Mutinies’ को mass of people के बीच no people की हकीकत से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। बोविन ने दशक भर पुराने आंदोलनों से टिकाऊ बदलाव ना होने के लिए जिस vanguard की कमी को जिम्मेदार माना, आज असल सवाल वही है कि भारत में उस शर्त को पूरा करने बारे में क्या चर्चा हो रही है? इसकी जरूरत पर कितना जोर दिया जा रहा है, और इस विकल्प की तैयारी के लिए क्या प्रयास हो रहे हैं?

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By सत्येन्द्र रंजन

वरिष्ठ पत्रकार। जनसत्ता में संपादकीय जिम्मेवारी सहित टीवी चैनल आदि का कोई साढ़े तीन दशक का अनुभव। विभिन्न विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता के शिक्षण और नया इंडिया में नियमित लेखन।

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