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श्वेतों के भूरे-वंशजों का लोकोपकारी स्वांग

मैं भी दिल्ली और देश भर में पसरे इन क्लबों के अंतःपुर का पिछले चार दशक से चश्मदीद ग़वाह हूं और ताल ठोक कर कह सकता हूं कि इन के सदस्यों और अतिथियों में महज़ 15 फ़ीसदी ही भलेमानुस होंगे। मैं अपने एक स्वर्गीय मित्रवत-परिचित की आत्मा से क्षमा मांगते हुए यह उपमा दिए बिना नहीं रह पा रहा हूं कि इन क्लबों के बाक़ी 85 फ़ीसदी सदस्य और अतिथि अपने-अपने संसार के अमर सिंहहैं।… जिमखाना का मतलब होता है – खेलकूद व्यायामशाला। क्या आप को सचमुच लगता है कि दिल्ली का, या कहीं का भी, जिमखाना क्लब अपने इसी पावन उद्देश्य को पूरा करने का राजधर्म निभा रहा है?

जिमखाना क्लब के बहाने – 1

पंकज शर्मा

बड़ी-से-बड़ी बातों पर जिन की आंखें झूठे को भी भीगती किसी ने कभी नहीं देखीं, उन के नयनों से हम ने इस सप्ताह आंसुओं के झरने बहते देखे। वे देश की राजधानी दिल्ली की छाती पर एक सदी से मूंग दल रहे एक कुलीन-क्लब की नज़दीक आती दिखाई दे रही मौत पर छाती पीट रहे थे। हुआ यह कि केंद्र सरकार के भूमि और विकास कार्यालय ने दिल्ली जिमखाना का मर्सियानामा ज़ारी कर दिया था। इसी 5 जून को परिसर खाली करने का निर्देश पढ़ने के बाद से क्लबाधीशों की हिचकियां थीं कि थमने का नाम ही नहीं ले रही थीं।

आख़िकार जब दिल्ली के हाइकोर्ट में सरकार ने वादा किया कि वह क्लब को जबरन अपने कब्जे में नहीं लेगी, तब जा कर हायातौबा थोड़ी शांत हुई। इस पुचकार से सीना-ज़नी थम गई। मगर पेच यह है कि सरकार ने यह नहीं कहा है कि अब वह दिल्ली जिमखाना क्लब को कभी खाली नहीं कराएगी। उस ने सिर्फ़ इतना कहा है कि वह भूमि वापस लेने के लिए नियमानुसार सारी प्रक्रियाएं पूरी करेगी। इसलिए मनाएगी भी तो बकरे की मां कब तक ख़ैर मना पाएगी?

जिमखाना का कथा-सार यह है कि जब अंग्रेज़ों का राज था तो 115 साल पहले हमारे साहब-बहादुर यानी भारत के वायसराय थे लार्ड हार्डिंग। उन्होंने 1911 के शुरुआती महीनों में भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की योजना बनाई। प्रस्ताव इंग्लैंड के राजा को भेजा गया। किंग जार्ज पंचम भारत आए तो उन के ख़ैरमकदम के लिए ‘दिल्ली दरबार’ लगा। उस में 12 दिसंबर 1911 को उन्होंने दिल्ली को राजधानी बनाने का आधिकारिक ऐलान किया।

अब जब राजधानी कलकत्ता के बजाय दिल्ली हो गई तो ब्रिटिश अफ़सरों की थकान दूर करने के लिए, उन के विश्राम के लिए, उन के मनोरंजन के लिए, उन की तनाव-मुक्ति के लिए दिल्ली में एक क्लब बनाने की ज़रूरत महसूस हुई। सो, 1913 में जुलाई महीने की 3 तारीख़ को ‘इंपेरियल दिल्ली जिमखाना क्लब’ की स्थापना की गई। यह शाही क्लब उत्तरी दिल्ली के सिविल लाइन्स इलाके में कोरोनेशन ग्राउंड्स के पास से संचालित होने लगा।

मगर सत्ता-केंद्र तो रायसीना पहाड़ी और उस के आसपास निर्मित हो रहा था। कोरोनेशन ग्राउंड तो ज़रा दूर था। सो, 15 साल बाद, फरवरी 1928 में, इस क्लब को लुटियन्स-अंचल में सफदरजंग रोड पर क़रीब सवा 27 एकड़ ज़मीन पट्टे पर आवंटित दी गई। उस के बाद क्लब के भवन का निर्माण शुरू हुआ। देश आज़ाद हो गया तो क्लब के नाम से ‘इंपेरियल’ हटा दिया गया। उस का नाम ‘दिल्ली जिमखाना क्लब’ हो गया। आज़ादी के बाद साहब-बहादुरों के भूरे वंशजों ने क्लब के नाम में तरमीम की, मगर बाकी दस्तूर जस-का-तस बना रहा।

मौजूदा प्रधानमंत्री-निवास की चौहद्दी से सटे जिमखाना क्लब को सुरक्षा कारणों से खाली कराने की कोशिश तो तक़रीबन 45 साल पहले राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व-काल में भी हुई थी। इसलिए अब अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी के दौर में उस की ज़मीन सरकार वापस ले रही है तो कम-से-कम मुझे तो इस में कुछ भी ग़लत नज़र नहीं आता है। फिर आज तो सरकार यह भी नहीं कह रही है कि क्लब इसलिए दूसरी जगह भेजा जाएगा कि उस की यहां मौजूदगी से प्रधानमंत्री की सुरक्षा को खतरा है। प्रधानमंत्री-निवास तो ख़ुद ही यहां से स्थानांतरित होने वाला है। अब तो सरकार जिमखाना की ज़मीन को सैन्य-ज़रूरतों के लिए इस्तेमाल करना चाहती है। इस में किसी को कोई आपत्ति क्यों होनी चाहिए?

देश की राजधानी में अपनी मस्ती में मस्त ऐसे अभिजात्य क्लबों की भरमार है, जो सरकार द्वारा कौड़ियों के सालाना भाड़े पर दी गई लंबी-चौड़ी ज़मीनों पर चुनिंदा भूरे लाटसाहबों की आरामगाह बने हुए हैं। उन्हें ‘मेलजोल’, ‘संपर्कशीलता’ और ‘परस्परता’ जीवंत बनाए रखने के लिए ऐसे एकांतिक प्रांगणों की ज़रूरत है, जहां सिर्फ़ लाखों रुपए का शुल्क चुका सकने वाले सदस्यों और उन के अतिथियों के अलावा बाकी सब का प्रवेश वर्जित हो। ऐसा भी न हो कि शुल्क चुका सकने की क्षमता रखने वाला कोई भी व्यक्ति सदस्य बन जाए, सदस्य संख्या सीमित रहे और पूरी तरह विशिष्ट हस्तियों के लिए आरक्षित रहे।

भूरे वर्ग के वर्तमान एवं पूर्व प्रशासनिक-सैन्य नौकरशाह और अकादमिक-साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक-पत्रकारीय क्षेत्र के अखाड़ेबाज़ जिस कुलीन क्लब प्रणाली को ‘आपसी संप्रेषण’ का मुजस्सम मंच कहते हैं, मुझे यह कहने के लिए माफ़ कीजिए कि, आम अंग्रेज़ी में उसे ‘नेटवर्किंग’ और आम हिंदी में ‘दलाली’, कहा जाता है। मैं भी दिल्ली और देश भर में पसरे इन क्लबों के अंतःपुर का पिछले चार दशक से चश्मदीद ग़वाह हूं और ताल ठोक कर कह सकता हूं कि इन के सदस्यों और अतिथियों में महज़ 15 फ़ीसदी ही भलेमानुस होंगे। मैं अपने एक स्वर्गीय मित्रवत-परिचित की आत्मा से क्षमा मांगते हुए यह उपमा दिए बिना नहीं रह पा रहा हूं कि इन क्लबों के बाक़ी 85 फ़ीसदी सदस्य और अतिथि अपने-अपने संसार के ‘अमर सिंह’ हैं। मेरे मित्रवत-परिचित ने कम-से-कम कोई ऋषि-मुखौटा तो नहीं पहन रखा था। मगर आज के कालनेमियों के लोकोपकारी स्वांग का तो कहना ही क्या!

अपनी इस लेख-श्रंखला में मैं आप को देश भर में हज़ारों एकड़ सरकारी भूमि पर पसरे इन क्लबों के कामकाज की थोड़ी तफ़सील में जा कर उन के भटकाव की एक झलकी परोसूंगा। इन में से बहुत-से क्लबों की सौजन्य-सैर मैं ने कई-कई बार की है। दिल्ली जिमखाना भी उन में एक है। जिमखाना का मतलब होता है – ‘खेलकूद व्यायामशाला’। क्या आप को सचमुच लगता है कि दिल्ली का, या कहीं का भी, जिमखाना क्लब अपने इसी पावन उद्देश्य को पूरा करने का राजधर्म निभा रहा है? अगर कोई मेरी कनपटी पर बंदूक लगा दे तो भी इस प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर करने से मेरी उंगलियां तो इनकार कर देंगी।

जिस मूल उद्देश्य के लिए ज़मीन सरकार ने दी है, अगर वह उद्देश्य पूरा करने के बजाय संस्थानों का इस्तेमाल इतर गतिविधियों में ज़्यादा हो रहा है तो किसी भी सरकार को, फिर चाहे वह नरेंद्र भाई मोदी की ही क्यों न हो, उस का स्थायी पट्टा रद्द कर के भूमि वापस लेने का अधिकार क्यों नहीं है? मगर इस का मतलब यह भी नहीं है कि सरकारी भूमि पर बने क्लबों द्वारा तहरीरी हुक़्म की ज़रा-सी अनदेखी करने के मामलों में उन की ज़मीनें छीन लेने पर तो हम सरकार की दुंदुभि बजाने लगें और ग़रीब किसानों-आदिवासियों के खेत-जंगल उजाड़ कर उन की ज़मीनें धनपशुओं के हवाले करने की करतूतों के ख़िलाफ़ शंखनाद करने से कतरा जाएं। हिसाब अगर हो तो बराबर हो और सब का हो। अपने गधे को पहलवान बनाने के दौर का कभी तो अंत हो!

देश भर में सरकारी ज़मीनों पर 100 से ज़्यादा कुलीन क्लब बने हुए हैं। दिल्ली के इस पाताल-लोक से फ़ुरसत पाने के बाद मैं आप को देश के अलग-अलग शहरों में भी ले चलूंगा। भारत की आठों दिशाओं में परहित-धर्म निभा रहे इन क्लबों में से ज़्यादातर का मैं यायावर, मगर गहन, सैलानी रहा हूं। लेकिन फ़िलवक़्त कल मैं आप को राष्ट्रीय राजधानी में सरकारी ज़मीन पर पैर फैला कर रसरंजन में गोता लगा रहे दिल्ली गोल्फ क्लब, चेम्सफोर्ड क्लब, रोशनआरा क्लब, सीएसओआई क्लब, पीएसओआई क्लब, रेलवे क्लब, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर और इंडिया हैबिटेट सेंटर की बानगी आप को दिखाऊंगा। (जारी)

By पंकज शर्मा

स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स में संवाददाता, विशेष संवाददाता का सन् 1980 से 2006 का लंबा अनुभव। पांच वर्ष सीबीएफसी-सदस्य। प्रिंट और ब्रॉडकास्ट में विविध अनुभव और फिलहाल संपादक, न्यूज व्यूज इंडिया और स्वतंत्र पत्रकारिता। नया इंडिया के नियमित लेखक।

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