पूरी दुनिया भारत को हिंदू देश जानती है। अगर वही अपने ही पड़ोस, अपने ही घर में, हिंदू विनाश पर चुप रहे — तो क्रिश्चियन देशों को क्या पड़ी है कि बंगलादेश के हिंदुंओं के लिए हाथ-पैर चलाएं? यह हिंदू भारत की ऐसी डफरता है, जिस का विश्व में अन्य उदाहरण नहीं।… नाजी होलोकॉस्ट ने 60 लाख यहूदियों का खात्मा किया था, जबकि बंगलादेश में लगभग 5 करोड़ हिंदू खत्म हो चुके हैं – संहार और जबरन धर्मांतरण से।. तसलीमा के बाद अमेरिकी लेखक रिचर्ड बेंकिन ने अपनी पुस्तक “ए क्वाइट केस ऑफ एथनिक क्लीन्सिन्ग: द मर्डर ऑफ बंगलादेश’ज हिन्दूज” (2012) में उस का एक आकलन दिया।
हिंदुस्तान में हिंदू संहार-3
पर चूँकि बंगलादेश में हिंदू विनाश पर भारत मौन रहा है, इसलिए बाहरी दुनिया इस से प्रायः अनजान है। यह तिब्बत वाला दुहराव है। पचहत्तर वर्ष पहले तिब्बत पर चीनी कब्जा और अत्याचार होते समय चूँकि भारत मौन रहा, इसलिए दुनिया उस पर हाथ बाँधे रह गई। जबकि चीन तब दुर्बल, अस्थिर देश था। उसी तरह, अभी बंगलादेश अनेक तरह से दुर्बल, पश्चिम पर निर्भर है। इसलिए उस की अनुचित नीतियों को बदलवना, तथा हिंदुंओं को समान नागरिक अधिकार और सुरक्षा दिलाना आसान है। बशर्ते भारत आवाज उठाता!
आखिर, पूरी दुनिया भारत को हिंदू देश जानती है। अगर वही अपने ही पड़ोस, अपने ही घर में, हिंदू विनाश पर चुप रहे — तो क्रिश्चियन देशों को क्या पड़ी है कि बंगलादेश के हिंदुंओं के लिए हाथ-पैर चलाएं? यह हिंदू भारत की ऐसी डफरता है, जिस का विश्व में अन्य उदाहरण नहीं।
बंगलादेश में हिंदुंओं का सफाया 1947 से ही हो रहा है, जब वह पाकिस्तान का हिस्सा था। पर पाकिस्तान से मुक्त होकर, भारतीय मदद से ही, बंगलादेश बनने (1971) के बाद भी वहाँ हिंदुंओं की दुर्गति जारी रही। वहाँ 1974 में ‘भेस्टेड प्रॉपर्टी एक्ट’ बना। इस के अनुसार, जो हिंदू बंगलादेश छोड़ गए, या जिन्हें सरकार ने ‘शत्रु’ कह दिया, उन की संपत्ति सरकार लेकर जिसे चाहे दे देगी। इस का प्रयोग यह हुआ कि किसी हिंदू को मार-धमका कर भगा दिया गया, या उसे देश का शत्रु कहकर, उस के परिवार की संपत्ति छीन कर किसी मुसलमान को दे दी गई। चाहे परिवार का कोई एक ही व्यक्ति बाहर गया हो, या केवल उसे ही शत्रु कहा गया हो। इसी तरह, किसी मार डाले गये, या गुम हिंदू की संपत्ति भी ले ली जाती है, जिस की लाश न मिली हो। उसे ‘भाग गया’ कह कर संपत्ति हड़पी जाती है। सो, समझ सकते हैं कि उस कानून द्वारा क्या होता रहा है।
विशेषकर, जब 1988 में इस्लाम को बंगलादेश का ‘राजकीय मजहब’ बना दिया गया। इस के बाद हिंदुंओं की स्थिति कानूनन भी नीची हो गई। उन के विरुद्ध हिंसा, संपत्ति छीनने, अपहरण, बलात्कार, जबरन धर्मांतरण, आदि घटनाएं बढ़ गईं। हिंदू लड़कियों, स्त्रियों को निशाना बना कर, आतंकित कर हिंदुंओं की संपत्ति पर कब्जा नियमित टेकनीक जैसा रहा है। इन्हीं बातों का वर्णन तसलीमा नसरीन ने अपनी पुस्तक ‘लज्जा’ (1993) में किया था, जिस के बाद उन पर मौत के फतवा आया। तब से उन्हें निर्वासन में रहना पड़ा रहा है।
इस तरह, हिंदुंओं के लिए आवाज उठा कर तसलीमा ने कष्ट और खतरा झेला — पर भारत के लाखों हिंदू नेता, सैकड़ों संगठन क्या करते रहे हैं?
तसलीमा के बाद अमेरिकी लेखक रिचर्ड बेंकिन ने अपनी पुस्तक “ए क्वाइट केस ऑफ एथनिक क्लीन्सिन्ग: द मर्डर ऑफ बंगलादेश’ज हिन्दूज” (2012) में उस का एक आकलन दिया। उस से दिखता है कि सतत संहार एवं उत्पीड़न से बंगला देश की हिंदू जनसंख्या तेजी से गिरी। वर्ष 1951 में वहाँ 33 प्रतिशत हिंदू थे, जो 1971 तक गिर कर 20 प्रतिशत रह गए। आज वे 8 प्रतिशत से भी कम बचे हैं।
समकालीन दुनिया में इतनी बड़ी आबादी का कहीं और विनाश नहीं हुआ! नाजी होलोकॉस्ट ने 60 लाख यहूदियों का खात्मा किया था, जबकि बंगलादेश में लगभग 5 करोड़ हिंदू खत्म हो चुके हैं – संहार और जबरन धर्मांतरण से। इस लुप्त आबादी का एकाध प्रतिशत ही बाहर गया। शेष मारे गए, या जबरन, या विवश मुसलमान बना लिए गए। यह इस्लामी संगठनों, पड़ोसियों, बदमाशों, राजनीतिक दलों और सरकारी नीतियों के समवेत कारनामों से हुआ है। ढाका विश्वविद्यालय के प्रो। अब्दुल बरकत की पुस्तक ‘इन्क्वायरी इन्टू कॉजेज एंड कन्सीक्वेन्सेज ऑफ डिप्राइवेशन ऑफ हिंदू माइनॉरिटीज इन बंगलादेश थ्रू द भेस्टेड प्रॉपर्टी एक्ट’ (2001) में इस के काफी विवरण हैं।
कल्पना कीजिए कि भारत में ऐसा कानून बने जो गैर-हिंदुंओं की संपत्ति लेकर हिंदुंओं को दे सकता हो। तब दुनिया में निन्दा, आक्रोश का कैसा ज्वार उठेगा! वैसे कानून को फासिस्ट, मुस्लिम-विरोधी कह कर भारत की थू-थू की जाएगी। संयुक्त राष्ट्र में भर्त्सना प्रस्ताव और प्रतिबंध लाए जाएंगे। जबकि ठीक वैसा ही कानून बंगलादेश में ठसक से चल रहा है क्यों?
क्योंकि भारत के हिंदू नेताओं को परवाह नहीं है — जिन्हें इस पर विरोध, भर्त्सना, और प्रतिबंध की अगुवाई करनी चाहिए थी! केवल नैतिक और धार्मिक कारणों से ही नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से भी। क्योंकि बंगलादेश और बंगाल की सामाजिक, रणनीतिक स्थिति अभिन्न है। अभी पश्चिम बंगाल में आगामी चुनाव ‘घुसपैठियों’ के नाम पर लड़ा जाने वाला है।
पर कोई हिंदू नेता या दल इस पूरे मामले में गंभीर नहीं। यह बंगलादेश में जिहादी और राजकीय लोग जानते हैं। इसीलिए हिंदुंओं का उत्पीड़न करते हैं कि कोई हाथ पकड़ने वाला नहीं। वरना इक्के-दुक्के बाहरी हस्तक्षेप पर भी वे तुरत रक्षात्मक होते हैं। यानी बाहरी दुनिया द्वारा चिन्ता से वहाँ हालत सुधर सकती थी। क्योंकि बंगलादेश बाहरी सहायता पर काफी निर्भर है। अतः किसी उचित मुद्दे पर वैश्विक दबाव नहीं झेल सकता। फिर, वहाँ ऐसे लोग भी हैं जो हाल सुधारना चाहते हैं। यह सब देखते हुए बंगलादेश के हिंदुंओं का क्रमिक विनाश और दुःखद लगता है।
आज बंगलादेश मे बचे सभी डेढ़ करोड़ हिन्दू, एक-एक व्यक्ति, धीमे संहार के निशाने पर हैं। यद्यपि उन की स्थिति नाजी कब्जे में यहूदियों जैसी फौरन खात्मे वाली नहीं। किन्तु नियमित अपमान, हत्या, लूट, आगजनी, अपहरण, बलात्कार, संपत्ति छीनना, घर पर कब्जा, राजकीय भेद-भाव, जबरन धर्मांतरण, आदि नियमित हैं। जिस का अंतिम परिणाम वही है।
बंगलादेश से भागकर आए हिंदू ज्यादातर पश्चिम बंगाल में ही रहते हैं। पर यहाँ भी उन पर जिहादी तत्वों का दबाव है। एक बार डॉ बेंकिन ने उन की बस्तियों में जाकर यह प्रत्यक्ष देखा था। स्थानीय सत्ताधारी दलों के कार्यकर्ताओं और जिहादियों की साँठ-गाँठ से कई बार हिंदू शरणार्थियों की पुरानी जगह कब्जा कर, उन्हें फिर भगा दिया जाता था। कुछ छीनने के लिए उन की लड़कियों, बच्चों के अपहरण की तकनीक यहाँ भी उसी तरह काम में लाई जाती है। पश्चिम बंगाल में सम्मिलित आबादी वाले कई गाँव धीरे-धीरे पूरी तरह से मुस्लिम हो जाते हैं। उन गाँवों के लावारिस मंदिर यह दिखाते हैं, जहाँ देवता पर फूल चढ़ाने वाला कोई न रहा!
सो, बंगलादेश और बंगाल की गाथा अविच्छिन्न है। चाहे, मूढ़ और कायर हिंदू प्रचारक उसे ‘विदेशी मामला’ कहकर अपने नेताओं का बचाव करते रहें। पर बंगलादेश का हिन्दू-विनाश भारत में हिंदू विनाश का ही क्रम है। इस पर भारत के प्रभावशाली नेता उदासीन हैं। जबकि सारी बातों से अवगत है।
फलत: बंगलादेश-बंगाल के हिंदू क्रमशः अपमानित, मरते, घटते जा रहे हैं। यह बहुमुखी जिहाद से हो रहा है। जोर-जबरदस्ती और शान्तिपूर्वक, दोनों तरीकों से। इस पर दुनिया मौन है। क्योंकि भारत मौन है।
बंगलादेश में हिन्दू-विनाश रोकना मुख्यतः भारत की जिम्मेदारी थी। नैतिक और रणनैतिक, दोनों रूप में। भारतीय हस्तक्षेप निस्संदेह कारगर होता, अगर निष्ठा रहती। उस में पश्चिमी सहयोग भी मिल सकता था। किन्तु भारतीय नेताओं ने मामले से नजर ही फेर ली। भारत की उदासीनता से ही पश्चिमी सरकारें, अंतरर्राष्ट्रीय एजेंसियाँ भी इस पर निष्क्रिय हैं। उलटे बंगलादेश को गरीब देश मानकर उसे तरह-तरह की सहायता दी जाती रही। सहायता देने वालों में भारत भी है।
यह हमारे कर्म हैं – राष्ट्रीय कर्म। दुर्बलता, अज्ञान और दलीय स्वार्थ में पड़े रहने का कर्म – जिस का फल हमें कश्मीरी पंडितों के सफाए में मिला। साथ ही, सैकड़ों दंगों मे लाखों निरीह लोगों के मरने, अपमानित होने, मोपला से कैराना तक विस्थापित होने में, और इन सब के बीच नियमित रूप से इन सब का दोष अपने ही माथे पर झेलते रहने का कलंक भी – जो हर तरह के लोग देते हैं। कथित हिन्दूवादी संगठन भी हिंदू जनता को दोष देते हैं! जिन के हिंदू नेता एक सच्चा बयान देने से भी बचते हैं, वे कहते हैं कि आम हिंदू लड़ते क्यों नहीं?
यहूदियों ने अपने मारे गए पूर्वजों की स्मृति में अनेक स्मारक बनाए। पर आज तक, हिंदू नेताओं ने एक स्मारक तक नहीं बनवाया, उन 8 करोड़ हिंदुंओं के नाम पर, जो गत तेरह सदियों में जिहाद के शिकार हुए हैं। हिंदू नेता केवल अपने दलीय नेताओं और अपनी ही मूर्तियाँ, स्मारक, शिलापट्ट, बनाते रहते हैं।
उलटे, जिद पूर्वक पूरा इतिहास छिपा कर अपने समाज को और भी अज्ञानी, दयनीय, भीरू बनाते रहे हैं। इस से जिहाद का हौसला स्वाभाविक बढ़ता है। क्योंकि बाकी लोग तो इतिहास जानते हैं। केवल हिंदू नहीं जानते। क्योंकि स्वतंत्र भारत की तीन-चार पीढियों से यह इतिहास, बल्कि वर्तमान भी छिपाया जाता रहा है। आज ग्रेजुएट होने वाले कितने युवा कश्मीर के हाल से परिचित हैं? या तबलीगी जमात जैसे वैश्विक संगठन की गतिविधियों से? यह तो वर्तमान से बेखबरी है। तब इतिहास से सिफर रहना तय ही है।
स्वयं देखें — ड्यूराँ, ब्राऊडल, टॉयनबी, कूनराड, से बेन्किन तक विदेशी विद्वानों ने ही हिंदू संहारों का नोटिस लिया! उस पर शोध, आकलन किया, उन के लिए आवाज भी उठाई। किन्तु भारतीय शासक – जो देश की संपूर्ण शिक्षा, विश्वविद्यालय, अकादमियाँ, नियुक्तियाँ, अनुदान, पाठ्य-निर्देश, शोध-निर्देश, आदि पर लगभग एकाधिकार रखते हैं — गत आठ दशक से क्या कर रहे हैं?
क्या यह हिंदू नेताओं की ‘डेथ विश’ है? जिहाद के हाथों अंततः खत्म हो जाना। चाहे ‘विकसित’ भारत बनाकर। आखिर, विकसित तो ढाका और लाहौर भी हैं ही। जैसे, पटना या अहमदाबाद विकसित हैं। जिहाद के बढ़ते जाने और अर्थव्यवस्था के बड़े होने में कोई अंतर्विरोध नहीं है। क्या इस्ताम्बुल विकसित नहीं है?
कहीं पर जिहाद सदियों चलता रहता है। कौंस्टेंटिनोपल पर 10वीं सदी से इस्लामी हमले होते रहे, और 1453 ई। में जाकर कब्जा हुआ, और वह बदल कर इस्ताम्बुल बन गया। पर अब वहाँ केवल 2 प्रतिशत क्रिश्चियन बचे, जो हजार साल पहले 100 प्रतिशत थे। लेबनान में 1910 ई। में 20 प्रतिशत मुस्लिम थे, आज 75 प्रतिशत हैं। कोसोवो में 1900 ई। में 40 प्रतिशत मुस्लिम थे, अब 95 प्रतिशत हैं।
उसी रास्ते पर भारतभूमि सौ सालों से है। यानी, तब से जब हिंदू नेताओं ने ‘राष्ट्रवाद’ के मूढ़ अहंकार में बिना किसी तैयारी, अंग्रेजों को हटा कर केवल गद्दी पर बैठ जाने की ठानी। उस मंसूबे में, रूसी कहावत अनुसार, कुत्तों को भगाने के लिए भेड़ियों को बुला लिया। यही खलीफत आंदोलन (1919-21) द्वारा ‘एक वर्ष में स्वराज लेने की’ नई राष्ट्रवादी राजनीति की शुरुआत थी! क्या वह मानसिकता आज भी बदली है?
तब, या फिर कभी, हिंदू नेताओं ने शासन की बागडोर लेने के विकट काम के लिए अपनी योग्यता, प्रशिक्षण, निष्ठा, आदि का विचार नहीं किया। फलत: वे आज भी राजकाज में वैसे ही अयाने, अजूबा हैं, जैसे सौ साल पहले थे। जिहाद का शांतिपूर्वक बढ़ता जाना और हिंदुंओं का नि:शब्द घटता जाना उस का केवल एक लक्षण है।(समाप्त)


