जनवरी 2026 में पाकिस्तान स्थित तक्षशिला में हुई खुदाई में मिले दूसरी सदी के ये कांस्य सिक्के न केवल कुषाण साम्राज्य के अंतिम महान शासकों में से एक सम्राट वासुदेव की शक्ति और प्रतिष्ठा को दर्शाते हैं, बल्कि उस समय की आर्थिक और सांस्कृतिक समृद्धि का भी प्रमाण देते हैं, जो कुषाण काल में अपने शिखर पर थी।
नए वर्ष की शुरुआत, जनवरी 2026 में पाकिस्तान स्थित तक्षशिला में हुई खुदाई ने एक बार फिर इस प्राचीन नगर और विश्वविद्यालय को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल भीर टीले से कुषाण काल के सम्राट वासुदेव की छवि वाले दुर्लभ सिक्के और छठी शताब्दी ईसा पूर्व के मूल्यवान सजावटी पत्थर, विशेष रूप से लैपिस लाजुली, प्राप्त हुए हैं। इन खोजों ने प्राचीन तक्षशिला के इतिहास को नए सिरे से देखने का अवसर दिया है।
पुरातात्विक विशेषज्ञों के अनुसार, तक्षशिला से प्राप्त ये अवशेष गांधार सभ्यता के शहरी जीवन, व्यापारिक गतिविधियों और कुषाण शासन के दौरान हुए सांस्कृतिक उत्कर्ष को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। इन खोजों से यह भी संकेत मिलता है कि इस क्षेत्र में बौद्ध स्तूपों और मठों का निर्माण बड़े पैमाने पर हुआ था। खुदाई में मिले दूसरी सदी के ये कांस्य सिक्के न केवल कुषाण साम्राज्य के अंतिम महान शासकों में से एक सम्राट वासुदेव की शक्ति और प्रतिष्ठा को दर्शाते हैं, बल्कि उस समय की आर्थिक और सांस्कृतिक समृद्धि का भी प्रमाण देते हैं, जो कुषाण काल में अपने शिखर पर थी।
छठी शताब्दी ईसा पूर्व के चमकदार नीले पत्थर, लैपिस लाजुली, यह सिद्ध करते हैं कि प्राचीन काल में तक्षशिला के दूर-दराज के क्षेत्रों से व्यापारिक संबंध थे। यह पत्थर उस समय अत्यंत मूल्यवान माना जाता था और आभूषणों तथा सजावटी वस्तुओं में प्रयोग होता था। यह खोज भीर टीले में स्थित तक्षशिला की प्रारंभिक शहरी बसावट और उसके समृद्ध अतीत पर प्रकाश डालती है। इसे पिछले एक दशक की सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक खोजों में से एक माना जा रहा है। इससे यह भी पुष्ट होता है कि कुषाण काल में तक्षशिला एक प्रमुख प्रशासनिक, वाणिज्यिक और बौद्धिक केंद्र के रूप में विकसित हो चुका था। इन सिक्कों और पत्थरों से उस समय के बहुलवादी समाज और गांधार कला के विकास की भी पुष्टि होती है। कुषाण शासकों, विशेष रूप से कनिष्क, के संरक्षण में बड़े स्तूपों, मठों और धार्मिक परिसरों के निर्माण की स्पष्ट झलक इन खोजों से मिलती है। कुल मिलाकर, तक्षशिला से प्राप्त ये अवशेष गांधार क्षेत्र के प्राचीन इतिहास, व्यापारिक संबंधों और कुषाण साम्राज्य के सांस्कृतिक तथा धार्मिक जीवन को समझने में नई दृष्टि प्रदान करते हैं।
उल्लेखनीय है कि आज पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के रावलपिंडी जिले की एक तहसील के रूप में स्थित तक्षशिला, प्राचीन भारत में ज्ञान, शिक्षा, राजनीति और संस्कृति का एक प्रतिष्ठित केंद्र हुआ करता था। इसका उल्लेख रामायण, महाभारत, पुराणों, बौद्ध ग्रंथों और ऐतिहासिक यात्रा वृत्तांतों में मिलता है। रामायण और महाभारत में तक्षशिला को गांधार जनपद की राजधानी और एक महान विद्या केंद्र के रूप में वर्णित किया गया है। वाल्मीकि रामायण, वायु पुराण और महाभारत के विवरणों के अनुसार, अयोध्या के राजा श्रीराम के अनुज भरत ने अपने नाना केकयराज अश्वपति की सहायता से गांधार देश पर विजय प्राप्त की और अपने पुत्रों को वहां का शासक नियुक्त किया।
गांधार देश सिंधु नदी के दोनों किनारों पर स्थित था। भरत के दो पुत्रों, तक्ष और पुष्कल, ने क्रमशः तक्षशिला और पुष्करावती नामक राजधानियों की स्थापना की। तक्षशिला सिंधु नदी के पूर्वी तट पर बसी थी। इन रघुवंशी क्षत्रियों के वंशजों ने लंबे समय तक यहां शासन किया। महाभारत के अनुसार, महाभारत युद्ध के बाद परीक्षित के वंशजों ने भी कई पीढ़ियों तक इस क्षेत्र पर अधिकार बनाए रखा। जनमेजय ने अपना नागयज्ञ यहीं किया था और इसी स्थान पर महर्षि वेदव्यास के निर्देश पर वैशंपायन ने महाभारत का प्रथम पाठ किया था।
गौतम बुद्ध के समय गांधार के राजा पुक्कुसाति ने मगध के राजा बिंबिसार के दरबार में अपना दूतमंडल भेजा था। छठी शताब्दी ईसा पूर्व में फारस के शासक कुरुष ने सिंधु क्षेत्र पर आक्रमण किया और उसके उत्तराधिकारियों ने भी इस क्षेत्र पर अपना प्रभाव बनाए रखा। लगभग दो सौ वर्षों तक तक्षशिला फारसी अधिपत्य में रही। इसके बाद सिकंदर के आक्रमण के समय, तक्षशिला के शासक टैक्सिलिज ने उपहार देकर उससे मित्रता कर ली। सिकंदर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र आंभी भी यूनानी सत्ता से जुड़ा रहा, किंतु शीघ्र ही चंद्रगुप्त मौर्य ने उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों से यूनानी सेनापतियों को हटाकर तक्षशिला को अपने अधीन कर लिया। उसने इसे उत्तरापथ प्रांत की राजधानी बनाया और मौर्य राजकुमारों को वहां का शासक नियुक्त किया।
राजधानी और शिक्षा के केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित तक्षशिला, कई महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों के संगम पर स्थित होने के कारण व्यापार और संस्कृति का भी प्रमुख केंद्र बन गई थी। यहां स्थित तक्षशिला विश्वविद्यालय को विश्व के प्राचीनतम विश्वविद्यालयों में गिना जाता है। यह हिंदू और बौद्ध दोनों परंपराओं के लिए महत्वपूर्ण था। इस विश्वविद्यालय में वेद, दर्शन, आयुर्वेद, अर्थशास्त्र, व्याकरण, गणित, ज्योतिष, चिकित्सा, युद्ध विद्या, संगीत, नृत्य और कला सहित 64 विषयों की शिक्षा दी जाती थी। चाणक्य, चरक और पाणिनि जैसे महान विद्वानों ने इसकी प्रतिष्ठा को विश्व स्तर पर स्थापित किया।
यहां शिक्षा ग्रहण करने वालों में अजातशत्रु, बिंबिसार और वसुबंधु जैसे शासक और विद्वान शामिल थे। शिक्षा गुरुकुल पद्धति पर आधारित थी और दूर-दूर से विद्यार्थी यहां आते थे। शिक्षा सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध थी। जाति, वर्ग या आर्थिक स्थिति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं था। शिक्षा को धन से ऊपर माना जाता था और इसके लिए शुल्क लेना अनुचित समझा जाता था। शैक्षिक संस्थानों का संचालन समाज के सहयोग और दान से होता था। व्यवहारिक शिक्षा, चरित्र निर्माण, व्यावसायिक कौशल और अध्यात्म—ये सभी शिक्षा के अभिन्न अंग थे।
यही कारण था कि भारत पहुंचे यूनानी इतिहासकारों ने तक्षशिला को एक समृद्ध और सुव्यवस्थित राज्य के रूप में देखा। उन्होंने अपने विवरणों में लिखा कि तक्षशिला जैसा विश्वविद्यालय उन्होंने ग्रीस में भी नहीं देखा। बाद के वर्षों में फारसियों, यूनानियों, शक, पार्थियन और कुषाणों के आक्रमण होते रहे, किंतु सबसे विनाशकारी आक्रमण पांचवीं शताब्दी में हूणों द्वारा किया गया। सन 450 के आसपास हूणों ने न केवल तक्षशिला राज्य को, बल्कि उसके विश्वविद्यालय को भी नष्ट कर दिया।
गुप्त काल में तक्षशिला पुनः समृद्ध हुई और व्यापार, साहित्य, कला तथा संस्कृति का प्रमुख केंद्र बनी। लेकिन आंतरिक विश्वासघात और हूणों के आक्रमणों ने इसके वैभव को समाप्त कर दिया। सातवीं शताब्दी में चीनी यात्री युवानच्वांग ने तक्षशिला को उजड़ा हुआ पाया। इसके बाद लगभग बारह सौ वर्षों तक इसका इतिहास विस्मृति में चला गया। 1947 के विभाजन के बाद तक्षशिला पाकिस्तान का हिस्सा बनी, किंतु अपने गौरवशाली अतीत के कारण इसे 1980 में यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया।
आज तक्षशिला में हो रही खुदाइयों से उसके प्राचीन वैभव को फिर से समझने और संरक्षित करने के प्रयास जारी हैं। इन नवीन खोजों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तक्षशिला केवल एक नगर या विश्वविद्यालय नहीं थी, बल्कि वह प्राचीन भारत की सांस्कृतिक, बौद्धिक और सभ्यतागत चेतना का एक उज्ज्वल केंद्र थी।


