सब के ऊपर बड़े प्रधान हैं। इसलिए छोटे प्रधानों को दोष देना व्यर्थ है। औपचारिक और वास्तविक अधिकारों, तथा अधिकारियों में इतना भेद पहले कभी नहीं था। यह चालू दौर की विशेषता है। दोहरी व्यवस्था, दोहरी बातें, दोहरे पैमाने, दोहरे काम, दोहरे चेहरे … सब कुछ दोहरा। एक दिखावटी, एक असली। एक प्रदर्शनीय, एक छिपावनीय। कुछ-कुछ डॉ. जैकिल व मिस्टर हाइड जैसा पकड़ से बाहर।… जब राष्ट्रीय हित के ऊपर दलीय स्वार्थ हावी हो जाए, तो पतन दर पतन की सीढ़ी गिरते जाना ही परिणति है।
शैक्षिक संस्थानों और परीक्षाओं में गड़बड़ी, भ्रष्टाचार, आदि के लिए छोटे प्रधान को बकरा बनाना भटकने और भटकाने वाली बात है। क्या सभी निर्णय वही लेते रहे हैं? अकादमिक संस्थानों से वास्ता रखने वाले बेहतर जानते हैं। अन्यथा मानना वही होगा जैसे नित नवीन छ: महीनों से अपने सहायक भी नहीं तय कर पाए! पर उन का क्या दोष, वे तो दिखाने के दाँत हैं। निर्णय किन्हीं और को करना है, वे जब जैसा करेंगे नवीन बता देंगे। शिक्षा की स्थिति उस से कुछ ही भिन्न है। सब के ऊपर बड़े प्रधान हैं। इसलिए छोटे प्रधानों को दोष देना व्यर्थ है।
हालिया वर्षों में जो वैचारिक, शैक्षिक, बौद्धिक निर्णय हो रहे, या नहीं हो रहे, जिस में आयोग, अकादमियाँ, विश्वविद्यालय, एजेंसियाँ, आदि शामिल हैं। यहाँ तक कि सत्ताधारी दल से जुड़े बड़े संगठन तक — क्या उन के निर्णय लेने में संबंधित औपचारिक प्रधान स्वतंत्र हैं?
औपचारिक और वास्तविक अधिकारों, तथा अधिकारियों में इतना भेद पहले कभी नहीं था। यह चालू दौर की विशेषता है। दोहरी व्यवस्था, दोहरी बातें, दोहरे पैमाने, दोहरे काम, दोहरे चेहरे … सब कुछ दोहरा। एक दिखावटी, एक असली। एक प्रदर्शनीय, एक छिपावनीय। कुछ-कुछ डॉ. जैकिल व मिस्टर हाइड जैसा पकड़ से बाहर। गत वर्षों में जो भी नीति-निर्धारण हो रहे, उस में प्रधान सूत्र है : दलीय लाभ व नेता प्रचार। समर्थक और आलोचक, दोनों इस से अवगत हैं। यही शिक्षा क्षेत्र में भी झलकता है। योग्यता, गुणवत्ता, पवित्रता, औचित्य, आदि गौण हो गए हैं। दलीय हित अघोषित रूप से सर्वोपरि बन गया है। यह शिक्षा का घोर राजनीतिकरण है, जो बुनियादी हानि है।
इस मूल बिन्दु को भुलाकर संकीर्ण दोषारोपण केवल दलीय खींचतान रह जाती है। शिक्षा को विद्वानों से छीन कर दलीय रणनीतिकारों, उन के नुमाइंदों के हवाले कर देना मूल गड़बड़ी है। यह कुछ तो पहले से था। अब इस में भयंकर वृद्धि हुई है। स्वतंत्र भारत के आरंभिक दशकों तक विद्वानों की सलाह से नीति तय होती थी। फिर संस्थानों के प्रमुख स्वतंत्रता पूर्वक काम करते थे।
अब विद्वानों का स्थान लुप्त हो गया है। संस्थानों के प्रधान प्रायः रुटीन प्रशासक हैं। उन में भी अनेक दिखावे के। उन के गले में एक अदृश्य बोझ भी लटका दिया गया है। वह है: सब कुछ में किसी दल-संगठन के छुटभइयों का हस्तक्षेप। औपचारिक प्रधान के पीछे किन्हीं का अनौपचारिक दबाव। यह सब शिक्षा की दुर्गति करके भी दलीय स्वार्थ साधने की जिद है। यह देश की नींव ही खोखली करने जैसी भूल है, जिस का बहुत कम लोगों को आभास है। यह चालू दौर की नवीनता है। पिछली अवधि में ऐसी नहीं देखी गई थी। अब सभी छोटे प्रधान मानो नित नवीन हैं: बस नाम के। अघोषित होने से यह परिदृश्य और हताशाजनक है। इसलिए भी छोटे प्रधानों को दोष देना व्यर्थ है। असली गड़बड़ी अनुत्तरदायी और अतिकेंद्रित व्यवस्था में है। जिस पर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि यही अधिकांश खामियों का — या आप चाहें तो खूबियों का — कारण है। मंत्री, सचिव, चेयरमैन, डायरेक्टर, वाइस चांसलर, कोई इस से बाहर नहीं। यदि यह व्यवस्था बेहतर है तो खुश रहिए। हानिकर लगे तो सिर ठोकिए। पर यह विशेषता सत्ता-परिवार की सिग्नेचर शैली है: अधिकार का केंद्रीकरण, केवल दोष का विकेंद्रीकरण।
क्या वही शैली शिक्षण-प्रवेश-मूल्यांकन आदि के केंद्रीकरण में दिख रही है? देश भर के विशिष्ट प्रकार के अकादमिक संस्थानों के लिए भी प्रवेश, परीक्षा, मूल्यांकन, आदि एक केंद्रीय एजेंसी करे — ऐसा कदम शायद ही किसी सच्चे शिक्षक को उचित लगे। हर तरह के शैक्षिक संस्थान के लिए पर्चे, प्रवेश, परीक्षा, मूल्यांकन आदि एक एजेंसी से कराना फैक्ट्री उत्पादन की मानसिकता है। इस में व्यक्तित्व, ज्ञान, मौलिकता, उत्कृष्टता, चिंतन, आविष्कार, जैसे गुणों की कोई समझ नहीं दिखती — जिन का बच्चों में विकास मुख्यतः शिक्षा से जुड़ा है। पर इस की चिन्ता किसी निन्दा, आलोचना में नहीं दिखती।
परन्तु ध्यान दें कि सभी लोगों को वोटर या चाकर समझने वाले ही विविध विशिष्ट अकादमिक संस्थाओं को एक झाड़ू से समेट सकते हैं। यह शैक्षिक बुद्धि नहीं, पार्टी-बुद्धि है। लेनिनीय, गाँधीवादी जैसी। जिस से केवल अनुचर अथवा कुली-कारकून-सिपाही बनते हैं, स्कॉलर-विचारक-साइंटिस्ट नहीं। यह स्वतंत्र भारत का दुर्भाग्य है कि अब हम यह मोटी बात भी समझने से परे हो चुके कि दुनिया में शिकागो, हार्वर्ड, प्रिंसटन, कैम्ब्रिज, ऑक्सफोर्ड, हैरो, ईटन, जैसी अकादमिक संस्थानों की अपनी-अपनी विशिष्ट पहचान कैसे बनी? वह ‘सब धान बाइस पसेरी’ करने, सब संस्थानों को एक एजेंसी के हवाले करने, विद्वानों को पार्टी कार्यकर्ताओं या बाबुओं के अधीन कर देने से बन ही नहीं सकती थी। पर जो हार्वर्ड का ही मजाक उड़ाएं, उन के हाथों वही हो सकता था जो हो रहा है!
सोचें, यदि तमाम अमेरिकी आइवी लीग संस्थानों की एक प्रवेश परीक्षा, और एक एजेंसी, एक ठेकेदार द्वारा उस का निर्णय, मूल्यांकन, परीक्षण होने लगे तो उन संस्थाओं की पहचान क्या बचेगी? उन शानदार संस्थानों में मौजूद विद्वानों के हाथ में क्या रहेगा? वही, जो यहाँ दिख रहा है। संस्थानों के प्रधान समेत, उन के विद्वान, शिक्षक, आदि इंतजार करते रहते हैं कि ऊपर से बाबू जो सूची, सामग्री, या निर्देश भेजेंगे, उस अनुसार सब कुछ करना है। क्या यही शिक्षा संस्थानों की ‘स्वायत्तता’ रह गई? जो शिक्षा ब्रिटिश राज में, और स्वतंत्र भारत के पहले दो दशकों तक भी एक पवित्र क्षेत्र था — जहाँ राजनीतिक दल तो दूर, शासन का भी नियमित हस्तक्षेप नहीं था — उस का क्रमशः बढ़ता राजनीतिकरण और दलीय स्वार्थ में तहस-नहस करना अब मानो अंतिम सीढ़ी तक आ गया है।
आज आए दिन देश के बड़े-बड़े अकादमिक संस्थान नेताओं के पोस्टर लगाने, और नारों जुमलों पर कार्यक्रम करते रहने को विवश हैं। अब जून में स्कूली बच्चों और विश्वविद्यालयी युवाओं को एक ‘हत्या दिवस’ भी मनाना पड़ता है! क्यों? क्योंकि किन्हीं बड़े प्रधान को सूझी कि इस से विपक्षी दल पिटेगा! यह उदाहरण है। ऐसे हुक्म दिनों-दिन बढ़ते जा रहे हैं, जिन में दलीय हित प्रधान उद्देश्य है। शैक्षिक संस्थाओं की मर्यादा का इस से बड़ा मजाक शायद ही हो सकता है। वह सीधे-सीधे सत्ता परिवार के स्वार्थ साधन का औजार बना दी गई हैं। यदि किसी स्कूल या विश्वविद्यालय का रजिस्टर देखें तो हर साल उन्हें ऐसे अनेक दिवस मनाने पड़ते हैं जो सच्चे शिक्षक को अनुचित लगेगा। वह छात्रों का मूल्यवान समय नष्ट करना ही नहीं, उन के सरल विश्वासी माथे को दलबंदी की घृणा में लपेटने का अपराध है! यह हालिया वर्षों में सनक जैसा बढ़ता गया है। यह किसी छोटे प्रधान की कल्पना शायद ही होगी। इस प्रकार, बिना पूरा परिदृश्य देखे किसी को बकरा बनाने से क्या होगा! क्या अन्य शिक्षा की पवित्रता, गुणवत्ता, और स्वायत्तता बहाल करने के लिए स्वतंत्र होंगे? उस के लिए देशी-विदेशी विद्वानों, अध्यापकों, विशेषज्ञों की सलाह लेंगे? न कि हर बात में पहले नेता, फोटो, नारा, और दलीय बंधुओं को संतुष्ट रखने में हलकान।
अतः शिक्षा की सांगोपांग समीक्षा बिना केवल चेहरे बदलने से शायद ही कुछ हो। पिछले दसियों बरस से अनेक छोटे प्रधान, अपनी राजकीय जिम्मेदारी छोड़ लंबे-लंबे समय पार्टी-कार्य और चुनावी धंधे में भेजे जाते रहे हैं। क्या वे स्वेच्छा से ऐसा करते हैं? राजकीय जिम्मेदारी उपेक्षित कर पार्टी काम पर जाना क्या वैधानिक रूप से भी उचित है? अनैतिक तो है ही कि ‘बिना किसी भेदभाव सभी देशवासियों’ के लिए कर्तव्य शपथ लेने वाला दूसरे दलों पर झूठे-सच्चे दोष लगाता रहे। यह संविधान की भावना और सामान्य नैतिकता, दोनों के विरुद्ध है। सो, एक बार जब राष्ट्रीय हित के ऊपर दलीय स्वार्थ हावी हो जाए, तो पतन दर पतन की सीढ़ी गिरते जाना ही परिणति है। जब देश सेवा के नाम पर कोई दलीय स्वार्थ में डूब जाए, उसी में बुद्धि लगाए, उसी पर इतराए — तब उस ढलान पर रुकना कठिन है। अतः पहले शिक्षा का उददेश्य निर्धारित होना चाहिए। अभी वह गायब हो गया है। आए दिन स्कूल, विश्वविद्यालय, अकादमियों, में विविध आयोजन, बैनर, तमाशे, प्रचार, आदि गतिविधियाँ यांत्रिक सी चलती दिखती हैं। वह मूल संदर्भ लुप्त है, जिस से उन का औचित्य देखा जा सके कि वे गतिविधियाँ किसलिए की गई? हर शैक्षिक संस्था का प्रधान यही उत्तर देगा कि ऊपर के आदेश से वह सब हुआ। अतः शिक्षा की स्वायत्तता बहाल करना, तथा इसे राजनीति से मुक्त रखना पहली आवश्यकता है। तभी अन्य गड़बड़ियों के सुधार का उपाय हो सकेगा।


