लेखक गुंजित चोपड़ा और डिग्गी सिसोदिया अपराध को सनसनी नहीं बनाते। वे उसे सामाजिक संरचना की उपज की तरह देखते हैं। कथा की संरचना बेहद संयमित है और हर एपिसोड एक नई परत हटाता है। सीज़न दो का सबसे बड़ा गुण यह है कि वह दर्शक को जज बनने नहीं देता। वह हमें परिस्थितियों के भीतर खड़ा कर देता है। हम केवल अपराधी नहीं देखते, बल्कि हम उस रास्ते को भी देखते हैं जो उसे अपराध तक ले गया। शो रनर सुदीप शर्मा का विज़न इस सीज़न की रीढ़ है।
पंजाब की ठंडी सुबह में जब कोहरा खेतों को ढंक लेता है, तब दृश्यता कम हो जाती है लेकिन संवेदनाएं तेज़ हो जाती हैं। ‘कोहरा’ का दूसरा सीज़न इसी धुंध को रूपक बना कर हमारे समय की नैतिक उलझनों, पारिवारिक चुप्पियों और सामाजिक दबावों को परत-दर-परत खोलता है। यह केवल एक क्राइम-थ्रिलर नहीं, बल्कि अपराध के बहाने मनुष्य और समाज की आत्मा का परीक्षण है।
पहले सीज़न ने एक नए तरह की संवेदनशील क्राइम-स्टोरी का रास्ता खोला था। सीज़न दो उस विरासत को आगे बढ़ाते हुए और अधिक जटिल, अधिक आत्ममंथनकारी और कहीं-कहीं अधिक त्रासद हो जाता है।
कोहरा के मौजूदा सीजन की कहानी में ‘किसने’ से अधिक ‘क्यों’ का प्रश्न ज़्यादा अहम् है। दूसरे सीज़न की शुरुआत एक अपराध से होती है पर यह अपराध महज़ एक घटना नहीं, एक परिणाम है। जांच आगे बढ़ती है तो स्पष्ट होता है कि यह केवल किसी एक व्यक्ति की हिंसा नहीं, बल्कि सामूहिक चूक, दबे हुए सच और पारिवारिक दबावों का विस्फोट है।
लेखक गुंजित चोपड़ा और डिग्गी सिसोदिया अपराध को सनसनी नहीं बनाते। वे उसे सामाजिक संरचना की उपज की तरह देखते हैं। कथा की संरचना बेहद संयमित है और हर एपिसोड एक नई परत हटाता है। सीज़न दो का सबसे बड़ा गुण यह है कि वह दर्शक को जज बनने नहीं देता। वह हमें परिस्थितियों के भीतर खड़ा कर देता है। हम केवल अपराधी नहीं देखते, बल्कि हम उस रास्ते को भी देखते हैं जो उसे अपराध तक ले गया।
शो रनर सुदीप शर्मा का विज़न इस सीज़न की रीढ़ है। उन्होंने भारतीय क्राइम-ड्रामा को हमेशा सामाजिक संदर्भ में रखा है। ‘कोहरा दो’ में भी अपराध एक निजी घटना नहीं, बल्कि सामाजिक विफलताओं का आईना है। यहां पुलिस-प्रोसीजरल फॉर्मेट है, पर वह बाहरी ढांचा है। भीतर एक गहरी मानवीय बेचैनी है। पितृसत्ता, प्रवास का सपना, वर्ग-भेद, सम्मान की अवधारणा और कई बारीक़ अनुभव कहानी में बिना भाषण के समाया हुआ है।
रणदीप झा का निर्देशन इस सीज़न की आत्मा है। कैमरा अक्सर स्थिर रहता है। लंबे शॉट्स हैं, ठहरे हुए फ्रेम हैं, और सन्नाटा एक सक्रिय तत्व की तरह इस्तेमाल हुआ है। यह सीरीज़ तेज़ कट्स और शोर से नहीं, बल्कि मौन और निगाहों से तनाव पैदा करती है। कई बार कैमरा केवल चेहरे पर टिक जाता है और वही ठहराव दृश्य को अर्थ देता है। विज़ुअल नैरेटिव भी शानदार है। धुंधले आसमान और मिट्टी के रंग मिलकर एक मनोवैज्ञानिक वातावरण रचते हैं। ‘कोहरा’ यहां केवल मौसम नहीं, एक स्थायी मनोदशा है।
इस शो में काम करने वाले कलाकारों के अभिनय में भी बारीक़ी की जीत है। सुविंदर विक्की अपने किरदार को अत्यंत सादगी से निभाते हैं। उनका पुलिस अधिकारी किसी फिल्मी हीरो जैसा नहीं, बल्कि वह थका हुआ, उलझा हुआ और भीतर से टूटता हुआ इंसान है। उनकी आंखों में जो थकान है, वही कहानी का भावनात्मक तापमान तय करती है। बरुण सोबती का प्रदर्शन इस बार अधिक परतदार है। उनका किरदार कर्तव्य और निजी असुरक्षा के बीच झूलता है। वे कम बोलकर अधिक व्यक्त करते हैं।
पुलिस सब इंस्पेक्टर के रूप में मोना़ सिंह का अभिनय इस सीज़न की सबसे बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने एक ऐसे स्त्री पात्र को जीवंत किया है जो केवल पीड़िता नहीं, बल्कि अपने भीतर जटिल नैतिक प्रश्नों से जूझती हुई एक संवेदनशील और सशक्त व्यक्तित्व है। उनकी आंखों में अपराध बोध, क्रोध, असुरक्षा और आत्मसम्मान, सब एक साथ दिखते हैं। वे किसी भी दृश्य को ऊंची आवाज़ में नहीं निभातीं। उनका ‘अंडरप्ले’ इस सीरीज़ की सौंदर्य-शास्त्रीय शैली से पूरी तरह मेल खाता है। कई दृश्यों में उनका मौन संवादों से अधिक मुखर है। वह इस कहानी की नैतिक धुरी बनकर उभरती हैं, जहां दर्शक बार-बार ठहरकर सोचता है। वरुण बडोला सत्ता और असुरक्षा के मिश्रण को प्रभावी ढंग से चित्रित करते हैं। उनका किरदार सामाजिक प्रतिष्ठा और निजी डर के बीच फंसा है। हरलीन सेठी युवा पीढ़ी की बेचैनी का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनका अभिनय ताजगी और संवेदनशीलता दोनों लिए हुए है। रैचेल शेली कहानी में एक अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य जोड़ती हैं। उनका किरदार दूरी और संवेदनशीलता के बीच संतुलन साधता है।
‘कोहरा 2’ का सबसे उल्लेखनीय पक्ष यह है कि महिला पात्र केवल घटनाओं की शिकार नहीं हैं। वे निर्णय लेती हैं, सवाल उठाती हैं और कहानी की दिशा तय करती हैं। मोना़ सिंह का किरदार विशेष रूप से यह दर्शाता है कि अपराध की कथा में स्त्री केवल भावनात्मक पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि नैतिक केंद्र भी हो सकती है। यह सीरीज़ पंजाब को केवल लोकेशन की तरह इस्तेमाल नहीं करती। खेत, हवेलियां, गुरुद्वारे, छोटे शहरों की राजनीति, सब मिलकर एक जीवित सामाजिक ताना-बाना रचते हैं।
विदेश जाने का सपना, परिवार की इज्जत, पुरुषत्व की परिभाषा, वर्ग-भेद, ये सब कहानी में सहजता से घुलते हैं। यहां छोटे कस्बों की चुप्पियां बड़े अपराधों को जन्म देती हैं। बैकग्राउंड स्कोर न्यूनतम है। कई दृश्यों में सन्नाटा ही सबसे प्रभावी ध्वनि है। साउंड-डिज़ाइन इस तरह रचा गया है कि दर्शक वातावरण का हिस्सा महसूस करे जैसे वह खुद उसी ठंडी सुबह में खड़ा हो।
गति धीमी, लेकिन विचारशील’। छह एपिसोड्स में पसरा ‘कोहरा 2’ तेज़-तर्रार थ्रिलर नहीं है। यह धीमी गति से चलती है। पर यह धीमापन उसकी कमजोरी नहीं, उसका सौंदर्य है। हर एपिसोड दर्शक से धैर्य मांगता है और अंत में उसी धैर्य का प्रतिफल देता है। ‘कोहरा’ का ये सीज़न कई मुश्किल प्रश्न उठाता है जैसे क्या कानून हमेशा न्याय दिलाता है? क्या परिवार की प्रतिष्ठा सच से अधिक महत्वपूर्ण है? क्या आधुनिकता की दौड़ में संवेदनशीलता पीछे छूट रही है? इन प्रश्नों का कोई स्पष्ट उत्तर नहीं। यही इसकी परिपक्वता है।
अगर इस शो की कमज़ोरियां की बात करें तो कुछ सब-प्लॉट्स और विस्तार पा सकती थीं। कहीं-कहीं कथा अत्यधिक संयमित होकर भावनात्मक उछाल से बचती है। लेकिन संभवतः यही इसका सौंदर्यशास्त्र है। यह शोर नहीं करती, बल्कि भीतर चुभती है।
‘कोहरा’ का दूसरा सीज़न भारतीय वेब-सीरीज़ की परिपक्वता का प्रमाण है। यह मनोरंजन से अधिक आत्ममंथन का माध्यम है। यह हमें बताता है कि अपराध केवल एक घटना नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया है और धुंध केवल बाहर नहीं, हमारे भीतर भी है। ‘कोहरा 2’ हमें सिखाता है कि सच्चाई तक पहुंचने के लिए धैर्य चाहिए। यह केवल एक केस का समाधान नहीं देता, यह दर्शक को अपने भीतर झांकने के लिए बाध्य करता है।
यदि आप ऐसी कहानी चाहते हैं जो आपको सोचने पर मजबूर करे, तो यह सीरीज़ एक अनिवार्य अनुभव है। यह धुंध केवल स्क्रीन पर नहीं छाती, यह हमारे भीतर उतरती है। और शायद इसी में इसकी असली ताकत है। देख लीजिएगा नेटफ्लिक्स पर है। (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और मशहूर यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)


