राज्य-शहर ई पेपर व्यूज़- विचार

नए साल का संदेशः हौसला नहीं छोड़ना !

नया साल उत्साह भरता है। पर देखे नए साल का भी ….कोई पाइंट ऐसा नहीं होना चाहिए जहां से आप आगे बढ़ सकें। हर चीज में शक पैदा कर दो उसे अस्वीकार्य घोषित कर दो ताकि सिर्फ ढलान ही ढलान बचे। अब कविता बना रहे है कि  ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं। हिम्मत होती तो आईटी सेल इसे लिखने वाले के नाम से प्रचारित करता। मगर इनका एक कवि नहीं जिसका नाम हो और उस नाम से कविता एकदम से क्लिक कर जाए। … तभी दिनकर के नाम की मिलावटी तुकबंदी है।

नया साल नए साल जैसा ही होना चाहिए। उम्मीदों का और हौसलों का। 2025 गया। ऐसे ही कुछ और साल भी देश और समाज को पीछे जाते देखते हुए गुजर गए।!

शुरु में, 2014 में इतने बुरे की आशंका किसी को नहीं थी। भाजपा आरएसएस के विचार सबको मालूम थे मगर सिर्फ चुनाव जीतना ही सब कुछ होगा बाकी देश की कोई चिन्ता नहीं होगी यह तो तब शायद ही कोई सोच पाया था।

मगर इसके बावजूद अगर हम वापसी की बात कर रहे हैं तो कोई बहुत अनोखी बात नहीं है। मानव स्वभाव ही बेहतरी की भावना से संचालित होता है। अगर ऐसा नहीं होता तो अंग्रेजों की गुलामी के दौर में देश में आजादी की भावना बलवती नहीं होती।

110 साल पहले विदेश से गांधी जब वापस भारत आए तब देश की क्या हालत थी? सोया हुआ था।

निराश। नियति को स्वीकार कर चुका था। 1857 के बाद हुए अंग्रेजों के दमन के जख्म भरे नहीं थे। आजादी की वह पहली लड़ाई लड़ने वालों की पीढ़ी में से कई लोग जिन्दा थे। दिल्ली जहां सबसे ज्यादा दमन हुआ था वहां से लोगों को पलायन करना पड़ा था वह देश के दूसरो हिस्सों में जाकर उस समय अंग्रेजों द्वारा ढाए गए जुल्मों की कहानियां सुनाते थे।

उस सबकी दहशत लोगों में बैठी थी। तब 1915 में इसी जनवरी महीने में गांधी दक्षिण अफ्रीका से वापस भारत लौटे थे। और फिर आगे की कहानी सब को मालूम है कि निराश हताश और भय में जी रहे लोगों को गांधी ने कैसे जगाया।

तो उम्मीद लोगों का स्वभाव है। डर से निकलना भी चाहता है। डर में दुबक के बैठे रहना सुरक्षा का अहसास देता है। मगर वह वास्तविक सुरक्षा नहीं होती। डर का घेरा और तंग होता जाता है और व्यक्ति और सिमटता जाता है।

नया साल उत्साह भरता है। आप देख रहे होंगे कि नए साल का विरोध भी इसीलिए और तेज होता जा रहा है। कोई पाइंट ऐसा नहीं होना चाहिए जहां से आप आगे बढ़ सकें। हर चीज में शक पैदा कर दो उसे अस्वीकार्य घोषित कर दो ताकि सिर्फ ढलान ही ढलान बचे।

वह कविता, सस्ती कविता भी बना दी है। ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं। हिम्मत होती तो आईटी सेल इसे लिखने वाले के नाम से प्रचारित करता। मगर अपना कोई कवि ही ऐसा है नहीं जिसका नाम हो जिसके नाम से कविता एकदम से क्लिक कर जाए तो इसे दिनकर के नाम से प्रचारित करते हैं। पूरा नाम लिखकर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर। हद तो यह है कि एआई ( आर्टिफिशियल इन्टिलिजेन्स) भी इस सतही कविता को दिनकर के नाम से ही बता रहा है।

अब भाजपा आरएसएस का प्रचार तंत्र यह तो नहीं बताएगा कि दिनकर की असली कविता तो यह है –

“ गांधी का पी रुधिर जवाहर पर फुंफकार रहे हैं! “

देखिए कितनी दूर तक देखा था दिनकर ने। 1962 में लिखा था। 60 साल से ज्यादा हो गए अभी भी जवाहर ही मुख्य निशाने पर है। जवाहरलाल नेहरू। कितने सही शब्द का इस्तेमाल किया था फुंफकार रहे हैं। फुंफकारना क्या होता है? बिना कारण लगातार जहर फैंकना।

तो दिनकर की असली कविता यह है। मगर उनके नाम को यूज करना है। उसके जरिए अपने प्रतिक्रियावादी सिर्फ विरोध करने वाले विचारों को स्थापित करना है तो नए साल का विरोध उनके नाम से किया जा रहा है।

नया साल मतलब साल की शुरूआत। यानि उम्मीदों की भी। और उम्मीद तोड़ना ही यथास्थितिवाद फैलाना ही इनका मूल उद्देश्य है।

तो अगर आगे बढ़ना है वापस दुनिया में भारत का नाम बनाना है तो हिम्मत और हौसले को बनाए रखना होगा।

बीते साल की नाकामयाबियों पर लिखने को बहुत कुछ है। क्या क्या लिखें? अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि खराब हुई है। अभी जाते हुए साल में न्यूयार्क टाइम्स ने पेज वन पर आरएसएस का कच्चा चिट्ठा खोल दिया है। यहां आरएसएस कहती है हमें इस नजरिए से मत देखो उस नजरिए से मत देखो, आप हमें जानते नहीं हो उधर न्यूयार्क टाइम्स ने लाठियां लिए आरएसएस के स्वयंसेवकों की बड़ी सी तस्वीर और प्रधानमंत्र मोदी का फोटो छापकर लिख दिया कि आरएसएस भारत को लोकतंत्र के उजाले से दूर करके अंधेरे की तरफ ले जा रहा है।

भारत की संवैधानिक संस्थाएं जो भारत की मजबूती का आधार था उन्हें ध्वस्त कर दिया गया है। सर्वधर्म समभाव या भारत की जो धर्मनिरपेक्ष छवि थी उसे गहरा आघात लगा है। इससे पहले बीबीसी आरएसएस पर डाक्यूमैंट्री बना चुका है। जिसे भारत में प्रतिबंधित कर दिया गया और बीबीसी के दफ्तरों पर छापे मारे गए।

अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर एक तरफ यह हाल है दूसरी तरफ अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप भारतीयों को हथकड़ी बेड़ी पहनाकर भारत भेजने के साथ मुहावरे में नहीं वास्तव में पचास बार से ज्यादा यह कह चुके हैं कि व्यापार की धमकी देकर मैंने भारत पाकिस्तान के बीच सीजफायर करवाया। और इतना ही नहीं 8 लड़ाकू विमान गिरे वाली बात वे इस तरह कहते हैं जैसे भारत के गिरे हों। पाकिस्तान की तारीफ करते हैं। वहां के आर्मी चीफ मुनीर जो पहलगाम के आतंकवादी हमले के जिम्मेदार है उन्हें लंच पर बुलाते है।

मतलब गुजरे साल मई में हुए आपरेशन सिंदूर के बाद से अब तक उन्होंने कोई मौका नहीं छोड़ा जब भारत का अपमान नहीं किया हो। मगर आश्चर्य है कि एक बार भी हमारे प्रधानमंत्री मोदी ने उनका प्रतिकार नहीं किया। क्या डर है? भारत इतना डरा हुआ तो कभी नहीं था। एक प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी भी थीं जो आंख में आंख डालकर अमेरिका के राष्ट्रपति से बात करती थीं। सैनिक शक्ति का रौब दिखाने पर कहती थीं कि सातवां बेड़ा नहीं आठवां भी भेज दो। भारत नहीं डरेगा।

यह तो हुई अन्तरराष्ट्रीय स्तर की बात जहां भारत कमजोर हुआ है और उसकी छवि खराब।

और इधर देश में क्या हुआ? साढ़े 11 साल की नफरत और विभाजन की आग अब सब  जगह पहुंच गई है। दलित, पिछड़े, आदिवासी, मुस्लिम, महिला तो छोड़ दीजिए जिनसे यह कहते थे कि हम तुम्हारे लिए ही काम कर रहे हैं उन ब्राह्मण और राजपूतों के बीच भी नफरत और वैमनस्य पैदा कर दिया। यूपी में भाजपा के ब्राह्मण विधायकों को बैठक करने पर पार्टी की तरफ से चेतवानी दी जा रही है। जबकि इससे पहले राजपूत विधायक बैठक कर चुके थे।

मतलब इनके नफरत के जहर से कोई नहीं बचा है। महिला के बारे में हाल यह है कि उसकी सुरक्षा तो छोड़ दीजिए आज ऐसी स्थिति ले आए हैं कि लोग बलात्कार का समर्थन करने लगे। निर्भया के समय कोई सोच सकता था? उसी समय उठा कर अंदर कर दिया जाता।

देश की अंदरुनी हालत पर लिखने के इतने पाइंट हैं कि अख़बार में यह थोड़ी सी जगह नहीं पूरा पेज ही मांगना पड़ेगा। ऐसा कभी नहीं हुआ जो खुले आम तलवारें बांटी जा रही हैं। नार्थ ईस्ट का लड़का उत्तराखंड में यह कहते कहते मर जाता है कि वह भारतीय हैं। लींचिंग ( पीट पीट कर मार डालना) पहले कभी सुनी भी नहीं गई थी। और अब हालत यह है कि लींचिग होती है और उसके बाद सरकार कोर्ट में जाकर कहती है कि जो आरोपी हैं वह उनके खिलाफ केस वापस लेना चाहती है।

वह तो शुक्र करो की अदालत ने जो पहली लींचिग 2015 में अखलाक की हुई थी उस मामले में केस वापस लेने के यूपी सरकार की अपील को रिजेक्ट कर दिया नहीं तो इसमें और तेजी आती। और याद रखिए कि लींचिंग के शिकार केवल मुस्लिम ही नहीं हैं। अभी यह नार्थ ईस्ट का युवा एंजेल चकमा मारा गया। उससे पहले 12वीं कक्षा का छात्र आर्यन मिश्रा मारा गया। और लड़के की हत्या के बाद उसके पिता सियानंद मिश्रा पर इतना दबाव डाला गया कि वे हरियाणा छोड़कर जाने की बात करने लगे।

पूरी कानून व्यवस्था इन्होंने अपने हाथों में ले ली है। सरकार में हिम्मत नहीं है कि इनके खिलाफ बोल सके। बरेली में एक छात्रा की बर्थडे पार्टी में घुसकर मारपीट करने वाला रिषभ ठाकुर पुलिस को चैलेंज कर रहा है कि हमसे पंगा मत लेना पता भी नहीं चलेगा कि कहां गए! यूपी में ही इंसपेक्टर सुबोध सिंह को गौ रक्षकों ने मार डाला था।

यह हालत है। मगर क्या इसको स्वीकार कर लें? नहीं। नए साल से उम्मीदें बरकरार हैं। पुराने प्रेम-सद्भाव भाईचारे के दिनों की वापसी की।

By शकील अख़्तर

स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स के पूर्व राजनीतिक संपादक और ब्यूरो चीफ। कोई 45 वर्षों का पत्रकारिता अनुभव। सन् 1990 से 2000 के कश्मीर के मुश्किल भरे दस वर्षों में कश्मीर के रहते हुए घाटी को कवर किया।

Leave a comment