‘पूजा मेरी जान’ का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है। और शायद इसी वजह से यह फ़िल्म अपने विषय के कारण आज के समय में और भी प्रासंगिक हो जाती है। यह एक मनोवैज्ञानिक थ्रिलर है। यह दोस्ती, प्रेम, अस्वीकृति और जुनून की कहानी भी है। लेकिन इन तमाम परतों के नीचे इसकी असली कहानी पुरुष अहंकार और अस्वीकृति के बीच की उस खतरनाक दूरी की है, जिसे हमारा समाज अक्सर प्रेम समझने की भूल करता रहा है।
सिने-सोहबत
प्रेम में असफल होना एक निजी त्रासदी हो सकती है। लेकिन अस्वीकृति को स्वीकार न कर पाना जब अधिकार, बदला, हिंसा और सामाजिक दबाव में बदल जाए, तब वह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं रह जाती। नवजोत गुलाटी और सह निर्देशक विपाशा अरविंद की ‘पूजा मेरी जान’ इसी असहज सच को अदालत के कटघरे में खड़ा करती है।
हमारे समाज में लड़कों को प्रेम करना सिखाया जाता है, लेकिन प्रेम में असफल होना नहीं। उन्हें लड़की को पसंद करना सिखाया जाता है, उसके लिए लड़ना सिखाया जाता है, उसे पाने की कोशिश करना सिखाया जाता है। फ़िल्मों ने तो कई दशकों तक यह भी सिखाया कि लड़की की ‘ना’ के पीछे कहीं न कहीं ‘हां’ छिपी होती है। लेकिन बहुत कम कहानियों ने यह पूछा कि जब लड़की सचमुच ‘ना’ कह दे, तब लड़का क्या करता है?
‘पूजा मेरी जान’ का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है। और शायद इसी वजह से यह फ़िल्म अपने विषय के कारण आज के समय में और भी प्रासंगिक हो जाती है।
यह एक अपराध-कथा है। यह एक मनोवैज्ञानिक थ्रिलर है। यह एक कोर्ट रूम ड्रामा है। यह दोस्ती, प्रेम, अस्वीकृति और जुनून की कहानी भी है। लेकिन इन तमाम परतों के नीचे इसकी असली कहानी पुरुष अहंकार और अस्वीकृति के बीच की उस खतरनाक दूरी की है, जिसे हमारा समाज अक्सर प्रेम समझने की भूल करता रहा है।
फ़िल्म की शुरुआत ‘रोमियो एंड जूलियट’ से होती है। मंच पर प्रेम का शेक्सपियरी आदर्श है और मंच के बाहर एक ऐसा प्रेम, जो अस्वीकृति के बाद त्रासदी में बदल जाता है। पूजा यानी मृणाल ठाकुर जब अनिकेत यानी विक्रम सिंह चौहान के प्रेम प्रस्ताव को ठुकराती है, तो कहानी अचानक उस जगह पहुंच जाती है जहां प्रेम, अधिकार और अपराध के बीच की सीमाएं धुंधली होने लगती हैं।
अनिकेत की आत्महत्या के बाद सवाल केवल यह नहीं रह जाता कि उसकी मौत के लिए कौन ज़िम्मेदार है। सवाल यह बन जाता है कि क्या किसी महिला का किसी पुरुष को अस्वीकार करना उसके जीवन की ज़िम्मेदारी भी उसके सिर डाल देता है? यहीं ‘पूजा मेरी जान’ अपनी सबसे मज़बूत ज़मीन तलाशती है।
विषय की तीव्रता के स्तर पर यह फ़िल्म ‘पिंक’ की याद दिलाती है। दोनों फ़िल्मों की कहानी एक नहीं है, उनका उपचार भी एक जैसा नहीं है। लेकिन दोनों एक बेहद ज़रूरी सामाजिक मिथक से टकराती हैं: “महिला की इच्छा और उसकी ‘ना’ का सम्मान।”
‘पिंक’ ने पूछा था- क्या ‘ना’ का मतलब ‘ना’ है?
‘पूजा मेरी जान’ उससे एक कदम आगे जाकर पूछती है- जब पुरुष उस ‘ना’ को सुनता है, तब उसके भीतर क्या होता है? क्या वह उसे स्वीकार करता है? क्या वह खुद को संभालता है? या फिर वह अस्वीकृति को अपना अपमान मान लेता है?
आज जब लड़कियां और महिलाएं अलग-अलग मंचों पर अपने अनुभव साझा कर रही हैं, सीमाओं, सहमति, पीछा किए जाने, भावनात्मक दबाव और पुरुषवादी व्यवहार के खिलाफ आवाज़ उठा रही हैं, तब ‘पूजा मेरी जान’ का विषय महज सिनेमाई विषय नहीं रह जाता। यह उस सामाजिक बातचीत का हिस्सा बन जाता है जो हमारे घरों, कॉलेजों, दफ्तरों और डिजिटल दुनिया में लगातार चल रही है।
और फ़िल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि वह पुरुष को केवल खलनायक बनाकर संतुष्ट नहीं होती। वह उस मानसिकता की पड़ताल करने की कोशिश करती है, जिसने पीढ़ियों से पुरुष को यह विश्वास दिलाया है कि प्रेम में उसका अधिकार है।
मृणाल ठाकुर ने पूजा को केवल ‘पीड़ित लड़की’ की तरह नहीं निभाया है। उनके अभिनय में डर है, उलझन है, गुस्सा है और सबसे महत्वपूर्ण अपनी कहानी खुद कहने की कोशिश है। पूजा की मुश्किल सिर्फ़ यह नहीं है कि उसके साथ कुछ गलत हुआ है। उसकी मुश्किल यह भी है कि उसे लगातार यह साबित करना पड़ रहा है कि उसने कुछ गलत नहीं किया।
यही वह बिंदु है जहां फ़िल्म का कोर्टरूम ड्रामा असर पैदा करता है। अदालत में सवाल कानून के होते हैं, लेकिन कटघरे में खड़ी महिला को अक्सर अपने चरित्र का हिसाब देना पड़ता है। समाज की अदालत उससे भी पहले अपना फैसला सुना चुकी होती है।
हुमा कुरैशी की सना इस पूरी कहानी में एक ज़रूरी संतुलन लेकर आती हैं। वह वकील हैं, लेकिन केवल कानूनी प्रतिनिधि नहीं। वह दोस्त भी हैं, गवाह भी, और इस कहानी की भावनात्मक धुरी भी। हुमा ने सना को जिस सहजता से निभाया है, वह फ़िल्म को भाषण बनने से बचाती है।
विक्रम सिंह चौहान के लिए अनिकेत एक मुश्किल किरदार है। उसे सिर्फ ‘ऑब्सेसिव लवर’ बनाना आसान होता। लेकिन उसके भीतर मौजूद प्रेम, चोट, अपेक्षा और अधिकार-बोध को साथ लेकर चलना ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। फ़िल्म इसी विरोधाभास से अपना तनाव पैदा करती है।
विजय राज़ अपनी विशिष्ट उपस्थिति के साथ कहानी को एक अलग ऊर्जा देते हैं। राजेश जैस, चैतन्य व्यास और बाकी कलाकार भी उस दुनिया को विश्वसनीय बनाने में योगदान करते हैं। फ़िल्म के छोटे-बड़े किरदार मिलकर उस सामाजिक वातावरण का निर्माण करते हैं जिसमें यह त्रासदी संभव होती है।
नवजोत गुलाटी और कनिष्क के लेखन तथा निरेन भट्ट के अडिशनल स्क्रीनप्ले और संवादों का श्रेय यहां खास तौर पर उल्लेखनीय है क्योंकि ऐसी कहानी लिखना आसान नहीं है।
एक तरफ दर्शक को थ्रिलर का रोमांच चाहिए। दूसरी तरफ विषय इतना संवेदनशील है कि मनोरंजन के नाम पर उसकी गंभीरता कम नहीं की जा सकती।
‘पूजा मेरी जान’ कई जगहों पर इस संतुलन साधती है और कहानी को आगे बढ़ाने के लिए रहस्य का इस्तेमाल करती है। इसके केंद्र में जो सवाल है, वह हर नए खुलासे के साथ थोड़ा और असहज होता जाता है।
फ़िल्म हमें यह भी याद दिलाती है कि पॉपुलर कल्चर ने प्रेम के नाम पर कितने खतरनाक व्यवहारों को सामान्य बनाया है। ‘एकतरफा प्यार’ को महान बना देना।
पीछा करने को रोमांस बना देना। ज़िद को समर्पण कहना। अस्वीकृति को चुनौती मान लेना। और अंततः पुरुष के दुख को इतना बड़ा बना देना कि महिला की स्वतंत्र इच्छा उसके सामने छोटी लगने लगे। यहीं ‘पूजा मेरी जान’ की आवाज़ सबसे ऊंची सुनाई देती है।
और फिर आती है अदालत। फ़िल्म का कोर्ट रूम वाला हिस्सा केवल कहानी को कानूनी दिशा देने के लिए नहीं है। अदालत यहां एक रूपक भी है। कानून के सामने एक मामला है। समाज के सामने एक महिला है। और दर्शक के सामने एक सवाल कि क्या हम वास्तव में ‘ना’ को स्वीकार करना सीख चुके हैं? या केवल यह दावा करना सीख गए हैं कि हम सीख चुके हैं? यह फ़र्क़ बहुत बड़ा है।
नवजोत गुलाटी ने एक कठिन विषय को मुख्यधारा के कथानक में पिरोने की कोशिश की है और विपाशा अरविंद के सह निर्देशन ने इस दृष्टि को पूरा करने में योगदान दिया है। फ़िल्म की मूल ताकत उसका विषय है, लेकिन उसे दर्शक तक पहुंचाने के लिए निर्देशन को रहस्य, भावना और सामाजिक टिप्पणी के बीच संतुलन बनाना पड़ा है।
निर्देशक का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय यह है कि फ़िल्म सवाल को दर्शक के सामने छोड़ती है। वह आपको केवल यह नहीं बताती कि किसे सही मानना है। वह आपको उस मानसिकता के सामने बैठाती है, जिसने पूरी परिस्थिति को जन्म दिया। और शायद यही वजह है कि फ़िल्म खत्म होने के बाद भी इसका सबसे महत्वपूर्ण संवाद आपके भीतर चलता रहता है कि किसी को प्यार करने का अधिकार है। लेकिन किसी पर अपना प्यार स्वीकार करने की ज़िम्मेदारी नहीं थोपी जा सकती।
‘पूजा मेरी जान’ की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह प्रेम को अपराध नहीं बनाती। यह असफल प्रेम को भी अपराध नहीं बनाती। यह केवल उस क्षण पर सवाल उठाती है जब प्रेम अधिकार में बदल जाता है और अस्वीकृति अपमान में।
यहीं से हिंसा की शुरुआत हो सकती है। यहीं से पीछा करना शुरू हो सकता है। यहीं से भावनात्मक दबाव पैदा हो सकता है। और कभी-कभी यहीं से एक ऐसी त्रासदी जन्म ले सकती है जिसका बोझ किसी निर्दोष व्यक्ति पर डाल दिया जाता है। फ़िल्म का शीर्षक भले ही प्रेम की भाषा में हो, ‘पूजा मेरी जान’, लेकिन इसकी आत्मा दरअसल एक बहुत कठोर वाक्य में छिपी है: तुम मेरी जान हो सकते हो, लेकिन तुम मेरी मिल्कियत नहीं हो। और शायद आज के समय में इस वाक्य को सुनना, समझना और स्वीकार करना सबसे ज़रुरी है।
‘पूजा मेरी जान’ हर मायने में परिपूर्ण फ़िल्म होने का दावा नहीं करती। लेकिन एक ऐसे विषय को लोकप्रिय सिनेमा के भीतर लाने की कोशिश जरूर करती है जिस पर बात करना ज़रूरी है। क्योंकि लड़कियों को ‘ना’ कहना सीखने की जितनी ज़रुरत है, उससे कहीं ज्यादा ज़रुरत शायद लड़कों को ‘ना’ सुनना सीखने की है। और जब तक यह सीख हमारे समाज में सामान्य व्यवहार का हिस्सा नहीं बनती, तब तक ऐसी कहानियां ज़रूरी रहेंगी।
‘पिंक’ ने हमें बताया था कि ‘ना’ का अर्थ ‘ना’ है। ‘पूजा मेरी जान’ हमें याद दिलाती है कि उस ‘ना’ के बाद क्या करना है, यह सीखना भी उतना ही ज़रूरी है। ज़ी 5 पर है। देख लीजिएगा। (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)
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