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सादगी का साहस: ‘नुक्कड़ नाटक’

धुरंधरजहां अपने विशाल सेट्स, हाई-ऑक्टेन एक्शन और स्टार पावर के दम पर दर्शकों को बांधती है, वहीं नुक्कड़ नाटकअपने विचारों और भावनाओं के सहारे आगे बढ़ती है। यह एक ऐसा अंतर है, जो दोनों फ़िल्मों को अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण बनाता है।

सिने-सोहबत

आज के समय में जब सिनेमाघरों और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर चकाचौंध, भव्यता और तकनीकी कौशल से लबरेज़ फिल्मों की भरमार है, ऐसे दौर में ‘नुक्कड़ नाटक’ जैसी फ़िल्म का आना किसी शांत नदी के बीच अचानक दिखने वाले निर्मल जल स्रोत जैसा लगता है। यह फ़िल्म न तो बड़े सितारों की भीड़ लेकर आती है, न ही करोड़ों के बजट का शोर मचाती है; लेकिन इसके बावजूद यह दर्शक के मन में एक गहरी छाप छोड़ने में सफल होती है। यहीं इसकी सबसे बड़ी जीत है। आज के सिने-सोहबत में सादगी, साहस और सिनेमा के असली जूनून के दम पर बनी फ़िल्म ‘नुक्कड़ नाटक’ पर चर्चा करते हैं।

पिछले महीने सिनेमाघरों में रिलीज़ होने के बाद अब यह फ़िल्म एक ओटीटी प्लेटफॉर्म पर स्ट्रीम हो रही है, जिससे इसे एक व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचने का अवसर मिला है। यहां सबसे अहम् सवाल यह है कि क्या ‘नुक्कड़ नाटक’ अपने इस साधारण से दिखने वाले रूप में असाधारण बन पाती है? जवाब है हां। साथ ही यह ‘हां’ सिर्फ़ कहानी के लिए नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे उस जुनून के लिए है जो सिनेमा को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद का सशक्त जरिया बनाता है।

फ़िल्म की कहानी एक छोटे से शहर में रहने वाले कुछ युवाओं के इर्द-गिर्द घूमती है, जो नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से समाज के ज्वलंत मुद्दों को उठाने का साहस करते हैं। यह कहानी नई नहीं है, लेकिन इसे जिस ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया गया है, वह इसे ख़ास बनाती है। लेखक, निर्देशक तन्मय शेखर ने किसी भी तरह की अनावश्यक जटिलता से बचते हुए एक सीधी, सच्ची और प्रभावशाली कथा रची है।

नुक्कड़ नाटक’ अपने शिल्प में एक ईमानदार और साहसी कोशिश है। लेखक निर्देशक तन्मय शेखर ने साधारण जीवन के असाधारण सवालों को बेहद सादगी से गढ़ा है और निर्देशन में भी उन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद कहानी को जीवंत बनाने में गहरी संवेदनशीलता दिखाई है।

दिलचस्प है कि लगभग ‘क्राउड फ़ंडिंग’ की मदद से बनाई गई इस फ़िल्म को जिस बैनर के तहत प्रोड्यूस किया गया है उसका नाम है, ‘हाउ टू एंटर बॉलीवुड’। निर्माता मेधा खन्ना और तन्मय शेखर के साथ साथ प्रोडक्शन हाउस का यह निर्णय अपने आप में साहसिक है कि उन्होंने बाज़ारू फॉर्मूलों से हटकर एक विचारप्रधान फिल्म को समर्थन दिया।

हिंदी सिनेमा में ‘क्राउड फ़ंडिंग’ का विचार इंडिपेंडेंट फ़िल्म मेकिंग के लिए एक सशक्त विकल्प बन कर उभरा है। इसका मूल भाव यह है कि फ़िल्म के लिए पूंजी किसी एक बड़े निर्माता के बजाय आम दर्शकों, समर्थकों और समुदाय से छोटे-छोटे योगदानों के रूप में जुटाई जाए। इसका एक ऐतिहासिक उदाहरण महान फ़िल्मकार श्याम बेनेगल की फ़िल्म ‘मंथन’ है, जिसे 1976 में गुजरात के आनंद स्थित अमूल डेयरी के लगभग पांच लाख किसानों ने दो-दो रुपए का योगदान देकर संभव बनाया। यह भारतीय सिनेमा में सामुदायिक भागीदारी का अद्वितीय मॉडल था।

बाद में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित फ़िल्मकार ओनिर ने अपनी फ़िल्म ‘आई एम’ के लिए अनेक व्यक्तिगत निवेशकों से धन जुटाया। इसी तरह अनुराग कश्यप की ‘अगली’ और ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ जैसी फ़िल्मों के लिए वैकल्पिक फाइनांस मॉडल और स्वतंत्र निवेशकों की भूमिका महत्वपूर्ण रही।

डिजिटल युग में रजत कपूर ने ‘रघु रोमियो’ और बाद में ‘आंखों देखी’ के लिए भी दर्शकों से सहयोग लिया। ‘क्राउड फंडिंग’ ने न केवल नए फ़िल्मकारों को मंच दिया है, बल्कि विषय वस्तु में भी साहस और विविधता लाई है, जिससे हिंदी सिनेमा अधिक लोकतांत्रिक और प्रयोगधर्मी बन रहा है।

‘नुक्कड़ नाटक’ के तकनीकी पक्ष में कैमरा वर्क यथार्थ के करीब रहता है, हैंडहेल्ड शॉट्स कहानी को दस्तावेज़ी प्रभाव देते हैं। साउंड डिज़ाइन सधा हुआ है और परिवेश को प्रामाणिक बनाता है। बैकग्राउंड म्यूज़िक न्यूनतम है, जो भावनाओं को ओवरड्रामेटिक होने से बचाता है। एडिटिंग कहीं-कहीं ढीली जरूर पड़ती है, लेकिन समग्र रूप से फिल्म के स्वाभाविक प्रवाह को बनाए रखती है।

‘नुक्कड़ नाटक’ की सबसे बड़ी ताकत इसका “जुनून” है। फिल्ममेकिंग का वह जुनून, जो सीमित संसाधनों के बावजूद कुछ कहने की बेचैनी से पैदा होता है। आज जब फ़िल्में अक्सर मार्केटिंग रणनीतियों और बॉक्स ऑफिस के गणित में उलझ जाती हैं, यह फ़िल्म उस मूल भावना की याद दिलाती है, जिससे सिनेमा का जन्म हुआ था, कहानी कहने की इच्छा। निर्देशक का यह साहस कि वे बिना किसी बड़े नाम या ग्लैमर के एक संवेदनशील विषय पर फ़िल्म बनाते हैं, काबिल-ए-तारीफ है।

फ़िल्म का एक और महत्वपूर्ण पहलू है इसका प्रयोगधर्मी दृष्टिकोण। ‘नुक्कड़ नाटक’ पारंपरिक कहानी कहने के ढांचे को तोड़ने की कोशिश करती है। कई जगहों पर यह फ़िल्म थिएटर और सिनेमा के बीच की रेखा को धुंधला कर देती है। कुछ दृश्य ऐसे हैं, जहां लगता है कि हम फ़िल्म नहीं, बल्कि किसी लाइव परफॉर्मेंस का हिस्सा बन गए हैं। यह प्रयोग हर दर्शक को पसंद आए, यह ज़रूरी नहीं, लेकिन यह निश्चित रूप से फ़िल्म को अलग पहचान देता है।

फ़िल्म में सामाजिक संदेशों की प्रस्तुति भी उल्लेखनीय है। बेरोज़गारी, सामाजिक असमानता, भ्रष्टाचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मुद्दों को कहानी में इस तरह पिरोया गया है कि वे बोझिल नहीं लगते। यह फ़िल्म उपदेश देने की बजाय संवाद स्थापित करने की कोशिश करती है। यही वजह है कि इसका प्रभाव धीरे-धीरे दर्शक के भीतर उतरता है।

हालाँकि, यह भी सच है कि फ़िल्म की यह सादगी हर किसी के लिए नहीं है। आज के दर्शक, जो ‘धुरंधर’ जैसी भव्य और तेज़ तर्रार फिल्मों के आदी हो चुके हैं, उनके लिए ‘नुक्कड़ नाटक’ की धीमी गति और सरल प्रस्तुति चुनौतीपूर्ण हो सकती है। ‘धुरंधर’ जहां अपने विशाल सेट्स, हाई-ऑक्टेन एक्शन और स्टार पावर के दम पर दर्शकों को बांधती है, वहीं ‘नुक्कड़ नाटक’ अपने विचारों और भावनाओं के सहारे आगे बढ़ती है। यह एक ऐसा अंतर है, जो दोनों फ़िल्मों को अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण बनाता है।

दरअसल, इन दोनों तरह की फ़िल्मों का सह-अस्तित्व ही सिनेमा को समृद्ध बनाता है। एक तरफ जहां ‘धुरंधर’ जैसी फ़िल्में हमें विस्मित करती हैं, वहीं ‘नुक्कड़ नाटक’ जैसी फ़िल्में हमें सोचने पर मजबूर करती हैं। एक हमें वास्तविकता से कुछ समय के लिए दूर ले जाती है, तो दूसरी हमें उसी वास्तविकता के और करीब ले आती है।

इस फ़िल्म में कलाकारों के अभिनय की बात करें तो सभी कलाकारों मोलश्री, शिवांग राजपाल, दानिश हुसैन ने बेहद स्वाभाविक और ईमानदार प्रदर्शन किया है। उनके चेहरे पर कोई बनावटीपन नहीं दिखता, जो फिल्म के यथार्थ को और मजबूत बनाता है। संवाद भी सरल और प्रभावी हैं, जो सीधे दिल तक पहुंचते हैं। फ़िल्म के म्यूजिक डायरेक्टर पृथेश मेनन हैं हालांकि संगीत का इस्तेमाल बहुत सीमित है, लेकिन जहां भी है, वह कहानी के भाव को गहराई देता है।

तकनीकी दृष्टि से देखें तो फ़िल्म में कुछ कमियां भी नज़र आती हैं। कुछ दृश्यों में संपादन थोड़ा ढीला लगता है और सिनेमैटोग्राफी में भी वह चमक नहीं है, जिसकी आज के दर्शक अपेक्षा करते हैं। हालांकि ये कमियां फ़िल्म के मूल भाव को कमज़ोर नहीं कर पातीं, बल्कि कई बार यही अपूर्णता इसे और अधिक वास्तविक बना देती है। नेटफ़्लिक्स पर है। देख लीजियेगा।  (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और मशहूर यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)

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