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संघ सुखानुभूति का सच

Byशंकर शरण,
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चुनाव से चुनाव तक की अनन्त आशा करते जीवन पूरना चाहिए। भाषा, संस्कृति, शिक्षा, कानून, जजिया, संख्या, मात्रा, आदि किसी पैमाने की बात ही नहीं उठानी चाहिए। सब गाँधीजी जैसे अवतार पर भरोसा कर छोड़ देना चाहिए। ”क्या आप को हमारी नीयत पर भी संदेह है?” इसे तुरुप के इक्के की तरह रखकर वे आत्मविश्वास से तमतमा उठते हैं। पर संदेह तो गाँधीजी की नीयत पर भी न था!

संघ-परिवार, और उस के उत्साही समर्थक सुखानुभूति में सराबोर हैं। ऐसे कि एक भी असुविधाजनक सत्य सामने रखने वाले पर व्यंग्य/धमकी की बौछार करने को तैयार, चाहे वह शुभचिंतक क्यों न हो। विरोधी दलों के रूप में उन्होंने एक सुखद मनपसंद शत्रु भी तय कर लिया है जिन से शत्रुता में कोई कष्ट उठाने, एक खरोंच तक लगने का भय नहीं। क्यों कि वे हिन्दू भाई ही हैं जिन पर वीर बनना निरापद है! निरापद वीरता, यानी घोर कायरता, जो सदियों से हिन्दू चरित्र में घुस कर जम गई है।

एक बार महान रूसी लेखक चेखव ने गोर्की को कहा था, “तुम मेरे बारे में कहानी लिखो, ताकि मेरे भीतर सदियों की गुलामी के जो अवशेष हैं वे बाहर आ सकें।” चेखव के पूर्वज भूदास (सर्फ) थे, और उन्हें लगता था कि कुलीन रूसियों (जेंट्री) की तुलना में वे पूर्णतः स्वतंत्र स्वभाव नहीं बन सके हैं। वह कोई निजी प्रसंग न था। चेखव आम रूसी जनों की मानसिकता की ही चिन्ता कर रहे थे। इसीलिए उस सत्य का सामना कर पूर्ण स्वतंत्र बनने बनाने की चाह से उन्होंने गोर्की से वह बात कही थी।

उसी तरह, सदियों के इस्लामी और अंग्रेज शासनों में जो हीनता और दब्बूपन आम हिन्दू में बैठा हुआ है, हमारे नेता और बौद्धिक उस से आज भी संपृक्त हैं। बल्कि उस हीनता के प्रतिनिधि हैं। एक ओर, असली शत्रुओं के प्रति स्थाई भगोड़ापन, और चोरी-छिपे, यानी सुरक्षित होकर खूब काल्पनिक गप्पें देना, उन्हें कोसना, या निरीह, पराजित मान लेना, आदि। दूसरी ओर, अपने जैसे अन्य हिन्दू दलों, संस्थाओं, व्यक्तियों पर शेर बनना! उन की चौबीस घंटे खुली बुराई, हमले, उन्हीं को शत्रु बताकर, उन से देश को ‘मुक्त’ कराने के आरामदेह साहस में झूमना। इस फूहड़ता पर जो ऊँगली रखे, वैसे हिन्दू मित्र पर भी बिफर पड़ना। जबकि हिन्दू समाज के असल शत्रुओं के सामने प्रेमिल बालक सा निहोरे करना। यह चरित्र गाँधीजी में भी सहज रूप से था। किसी सहयोगी हिन्दू भी को जली-कटी सुनाने में उन्हें संकोच नहीं था। परन्तु किसी अंग्रेज, मुसलमान, या क्रिश्चियन के सामने वे सज्जनता की मूर्ति बनने लगते थे। ऐसे व्यक्ति के सामने भी जो गाँधी के प्रति खुली वितृष्णा रखता, उन का सार्वजनिक अपमान तक करता था। जैसे, अली बंधु या जिन्ना। किन्तु गाँधी जी का कोई निकट हिन्दू भी कुछ असहमति व्यक्त करे, तो गाँधीजी का तीखा, क्रोधी, व्यंग्यात्मक व्यवहार देखने लायक होता था! यह सब वही, सदियों की जमी हिन्दू हीनता व भीरूता का ही लक्षण था, जो आज के सब से प्रतिनिधि गाँधीवादियों, संघ परिवार नेताओं में छलकता देख सकते हैं।

सो, वे कांग्रेस, सपा, जदयू या अन्य हिन्दुओं, ब्राह्मणों, आदि पर नियमित चोट करने में जितना सुख उठाते हैं, या जैसे-तैसे चुनाव जीत लेने को बड़ी वीरता समझ छाती फुलाते हैं। उतनी ही सावधानी से असल शत्रुओं द्वारा पूरे हिन्दू समाज पर चोट होने, देश या विदेश में हिन्दुओं के संहार, या भयावह जिबह किये जाने पर भी मुँह तक नहीं खोलते। मानो कुछ हुआ ही नहीं! चाहे वह ठीक राजधानी में क्यों न हुआ हो। दूसरी ओर, घर में भोले समर्थकों या बंधक सदस्यों को मनगढ़ंत आश्वासन देते हैं कि ‘चुपचाप सब हो रहा है’। जिस की झूठी पुष्टि हिन्दू समाज के असल शत्रु भी दिन-रात संघ-परिवार को नफरती, फासिस्ट, आदि कह कर (एक तीर से दो शिकार) करते रहते हैं । ठीक वे शत्रु जिन्हें खुश करने, उपहार देने में संघ परिवार के नेता धन और ध्यान देने में शाहखर्च बने रहते हैं। गाँधीजी की तरह ही हिन्दुओं को दाँव पर लगा-लगा कर।

इस तरह, असल शत्रुओं के दोनों हाथ लड्डू हैं। वे संघ नेताओं सत्ताधारियों से मनचाही मुरादें पूरी कराते हुए, निरंतर शिकायतों से दबाव भी बनाए रखते हैं। इस प्रकार, असल शत्रु अधिक सामर्थ्यवान, जमीनदार और कब्जेवर बनाए जा रहे हैं। जबकि संघ-परिवार के मतवाले अन्य हिन्दू दलों, नेताओं को ही चुनाव में हराकर खुद को शेर समझ रहे हैं। जिन के सामने कोई कुछ नहीं, अपना शुभचिंतक आलोचक हिन्दू भी नहीं। बल्कि उसी को आँखें दिखाईं जाती हैं कि वह सुखानुभूति में खलल क्यों डाल रहा! नकारात्मक बातें क्यों देखता है? क्यों नहीं सोचता कि गर दूसरे हिन्दू सत्ता में आये तो क्या भयावह हो सकता है? आदि।

यानी, उन्हें असल शत्रुओं का आभास है, जो कुछ दलों के पीछे हैं! परन्तु जिन के विरुद्ध संघ-परिवार नेता मौखिक भी असमर्थ हैं। जबकि अन्य हिन्दू नेताओं, बौद्धिकों पर शाब्दिक और भौतिक, हर‌ वीरता दिखाना उन का नित्यकर्म है‌।

किन्तु सुखानुभूति 1940 से 1947  तक, या उस से पहले भी कांग्रेसियों में कोई कम थी? क्या 1937  के चुनाव या बाद में भी कांग्रेस को लगभग एकाधिकारी समर्थन, और गाँधी महान के जयकारे में कोई कसर थी? परन्तु क्या उस सुखानुभूति, चुनावों में भारी जीतों ने हिन्दू समाज को बचाया? क्या ठीक उन्हीं बार-बार चुनाव जीतते, महान हिन्दू नेताओं ने ही बंगाल, कश्मीर, और पंजाब के करोड़ों हिन्दुओं को एक झटके में देश से ही काट कर फेंक नहीं दिया था? क्या अवतार बताए गये गाँधी ने ही ‘मानव इतिहास का सब से बड़ा विश्वासघात’ नहीं किया, जब पंजाब बंगाल के हिन्दुओं को दिए वचन से एकाएक फिर कर जिहादियों से तबाह होने छोड़ दिया? विभाजन निर्णय की खुद पुष्टि कराने के बाद गाँधी कभी पंजाब नहीं गये। उन के ही विश्वासघात से औचक मारे जा रहे हिन्दुओं को एक बार देखने तक नहीं गये। उन्हीं गाँधी का देवत्व फिर भी बनाया, बचाया गया। अतिरंजित राजकीय प्रचार जबरन थोपकर।

क्या वही इतिहास बचे कश्मीर, बचे बंगाल या कि बचे पूरे देश में दोहराया जा रहा है? या दोहराया जाएगा? क्या अपनी ही लफ्फाजियों, मनगढ़ंत कल्पनाओं के सिवा कोई ठोस पैमाना है – बल्कि क्या कोई भी पैमाना है जिस से असली हालत माप सकें? नहीं, कोई पैमाना ही नहीं है। पैमाने की बात ही रफा-दफा की जाती है, कि उस की जरूरत ही क्या! अपनी सुखानुभूति और विरोधी हिन्दुओं को दिन-रात फींचना, शोर-शराबा, नित नये तमाशे करना ही काफी है कि हिन्दू समाज आगे बढ़‌ रहा है। यदि कोई कानूनी, शैक्षिक, भाषाई, सांस्कृतिक, भौगोलिक, सांख्यिक, अप्रत्यक्ष जजिया, आदि पैमाने की बात उठाये तो उसे लाँछन से बींध दो। बस! हो गई सुखानुभूत नशे की वीरता।

निस्संदेह, यह भक्ति-नशा गाँधी युग में भी हो चुका है। टैगोर, श्रीअरविन्द, श्रद्धानन्द, सहजानन्द, अंबेदकर, जैसे कितने ही सत्यनिष्ठ हिन्दुओं की बातें, चेतावनियाँ, सुझाव, आग्रह उसी आत्ममुग्ध महानता में डिसमिल किए जाते थे। 1919 से 1947  तक, ऐसी अनेक गंभीर बातें इतिहास के पन्नों में प्रमाणिक दर्ज हैं। जिन्हें पूरी सावधानी से दबाकर, गाँधीजी की चमत्कारी परन्तु झूठी छवि बनाई और थोपी गई है। किन पर? बेचारे हिन्दुओं पर ही!

किसी गैर-हिन्दू भारतीय समूह में गाँधी का नामलेवा खोजना भी कठिन है। वे अपने मित्र-शत्रु जानते हैं, वे यथार्थवादी राजनीति के अभ्यस्त हैं। उन्हें उन के नेताओं ने किसी नेता, पार्टी भक्ति की सीख नहीं दी है। सदैव ठोस लेने छीनने का हिसाब सिखाया है। जबकि हिन्दू नेताओं ने अपने समाज को, सदैव सांकेतिक, तमाशाई, हवाई, भावुक राजनीति का अभ्यस्त बनाया है। सो, जब वे विवेकानन्द, टैगोर, श्रीअरविन्द, श्रद्धानन्द जैसे मनीषियों की असुविधाजनक बातें अनसुनी कर आत्ममुग्ध चलते रहे, तो आज के ऐरे-गैरे हिन्दू आलोचक क्या चीज हैं! एक से दूसरे अपने ही तमाशे पर, खुद ढोल बजाते, हिन्दुओं को सुखानुभूति में भरमाते संघ-परिवार का जीवन मजे से चल रहा है। अतः उन की माँग है कि हिन्दू समाज को भी सुख महसूस करना चाहिए। चुनाव से चुनाव तक की अनन्त आशा करते जीवन पूरना चाहिए। भाषा, संस्कृति, शिक्षा, कानून, जजिया, संख्या, मात्रा, आदि किसी पैमाने की बात ही नहीं उठानी चाहिए। सब गाँधीजी जैसे अवतार पर भरोसा कर छोड़ देना चाहिए।

”क्या आप को हमारी नीयत पर भी संदेह है?” इसे तुरुप के इक्के की तरह रखकर वे आत्मविश्वास से तमतमा उठते हैं। पर संदेह तो गाँधीजी की नीयत पर भी न था! न नेहरू की नीयत पर, जब वे चीन से दोस्ती पर खुद फिदा होकर भारत को संयुक्त राष्ट्र में मिल रही विशिष्ट शक्ति ठुकरा रहे थे और उसी समय चीन लद्दाख के हिस्से चुपचाप हड़प रहा था। नीयत तो वाजपेई की भी बेजोड़ थी, जब वे बस में चढ़कर लाहौर जा खुद विभोर हो रहे थे। ठीक उसी समय पाकिस्तानी फौज कारगिल पर चुपचाप कब्जा कर रही थी।

पर यह सब सुन कर बेचारा, असहाय, भला, भीरू हिन्दू करे क्या! गाँधी युग से ही उसे लगातार महानता, लफ्फाजी, और नीयत के भरोसे रखा गया है। आज तो उस के हाथ और खाली हैं, जब जिन पर तकिया था, वही पत्ते हवा दे रहे हैं

By शंकर शरण

हिन्दी लेखक और स्तंभकार। राजनीति शास्त्र प्रोफेसर। कई पुस्तकें प्रकाशित, जिन में कुछ महत्वपूर्ण हैं: 'भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहासलेखन', 'गाँधी अहिंसा और राजनीति', 'इस्लाम और कम्युनिज्म: तीन चेतावनियाँ', और 'संघ परिवार की राजनीति: एक हिन्दू आलोचना'।

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