अतः यह क्लासिक हिन्दू विकत्थन परंपरा है। बड़े-बड़े शब्द, छोटे-छोटे कर्म। मजबूत से बचना, कमजोर पर चढ़ना। वफादार मजमे में उपदेशना। जहाँ कठिन सवालों का अंदेशा हो, वहाँ गायब रहना। …हिन्दी लेखक निर्मल वर्मा ने पचास वर्ष पहले कहा था: ‘हम सांस्कृतिक रूप से इतने असहाय अंग्रेजों के काल में भी नहीं थे।‘ आज वे होते तो संभवतः जोड़ते — और राजनीतिक रूप से भी। ऐसे असहाय से क्या उम्मीद हो!
एक बड़े भारतीय नेता ने कहा था: ‘अहिंसा में तोप से भी अधिक बल है’। तब से एक सौ सत्रह साल बीत गये। न उन्होंने, न उन के शिष्यों ने कभी उस बल से किसी को हराकर दिखाया। यदि उस उच्चतर बल को सिद्ध कर दिखाना न था, तो फिर कहा किस लिए, किस के लिए?
उस के लगभग पचास वर्ष बाद एक और बड़े भारतीय नेता ने कहा: ”मैंने सेना को बोल दिया है: चीनियों को उठा कर सीमा से बाहर फेंक दें।” पर हुआ यह कि जल्द ही कलकत्तावासियों को लगा कि अब उन्हें चीनी राज में जाना है। हालाँकि, चीनी वहाँ तक नहीं आए और कुछ इलाकों पर कब्जा करके ही संतुष्ट रह गये।
कुछ वर्ष बाद जब पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया, तब एक अन्य बड़े भारतीय नेता ने दिल्ली के रामलीला मैदान में हुंकार भरी: ”अमेरिका का सातवाँ बेड़ा जो हिन्द महासागर की ओर आ रहा है, उस का एक भी जहाज बच कर वापस न जाने पाए!” खूब तालियाँ बजी जिसे सुन वह बेड़ा, जो आधी दुनिया तबाह करने की ताकत रखता था, सहम गया! उस ने युद्ध में कोई हस्तक्षेप नहीं किया।
वही नेता, अनंतर सर्वोच्च बनने पर मानो एक सांस्कृतिक जुलूस लेकर पाकिस्तान गये। फिर लौटकर खुद जश्न मनाने लगे कि ”देखो, देखो, मैंने पारंपरिक दुश्मनी का कैसा समाधान कर दिया!” जश्न ऐसा व्यापक था कि भारतीय सेना तक को संदेश मिला कि अब तो समस्या ही खत्म हुई! पर जल्द पता चला कि जब नेता अपने सुंदर जुलूस से दुश्मन को मोह रहे थे, तभी वह दुश्मन पूरी तैयारी से भारत का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र कब्जाने में लगा हुआ था! नतीजा: जब उस कब्जे का पता चला तो वह उलटने में सैकड़ों भारतीय सैनिकों की बलि चढ़ गई।
फिर आगे, पाँच जिहादियों ने भारत से एक नागरिक विमान का अपहरण कर फिरौती माँगी तो नेता ने सादर फिरौती दी। उन के निकट सहयोगी स्वयं फिरौती ले गये, और जिहादियों को सौंपा। उन फिरौतियों ने फिर अमेरिका समेत कई जगह तबाही ढाई। पर कोई बात नहीं, नेता ने तो भलाई सोची थी। सो, अनंतर वे भारत ‘रत्न’ बताए गए!
उन के सहयोगी एक अन्य बड़े नेता ने एक बार चिंतनशील मुद्रा में कहा: ‘भारत सॉफ्ट स्टेट बन गया है’। तब विरोधी दल की सरकार थी। नेता किसी राजपद पर न थे। हाँ, तैयारी में थे। सो इशारा था कि सत्ता में लौह-पुरुष की जरुरत है। संदेश पब्लिक तक पहुँचा, और वे बड़े राजपद पर आ गये। अब कायदे से भारत को ‘हार्ड स्टेट’ बनता होना था। उन्हीं नेता को देश की आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी भी मिली। पर हुआ यह कि उसी दौर में जिहादियों ने कश्मीरी हिन्दुओं का आए-दिन संहार शुरू कर दिया। पहले से अधिक और लगातार! तब उन्हीं नेता ने उतना ही चिंतनशील उदगार प्रकट किया: ”अब कश्मीर में बचे हुए पंडितों की सुरक्षा सरकार कैसे कर सकती है!” यानी नहीं कर सकती।
तब सहज ही जिहाद का हौसला बढ़ा। उस ने देख लिया कि नेता और उन के ‘हार्ड’ स्टेट को कुछ न सूझ रहा। उस खुले बयान के बाद गँवार भी समझ लेता कि आगे क्या होना है। नतीजा: जल्द ही हिन्दू-विहीन कश्मीर। फिर काफिर-फ्री कश्मीर में मधुर पर्यटन उद्योग एवं मोमिन एकाधिकार! केवल उस का खर्चा व इंतजामात बाकी काफिर भारत के माथे। कश्मीर में हिन्दू नहीं बचे, तो क्या हुआ! देश का विकास और विश्वगुरु बनना कोई रोक नहीं सकता — यह उन नेता के उत्तराधिकारी का दावा है!
उत्तराधिकारी ने भी सर्वोच्च की तैयारी दौर में छप्पन इंची भंगिमा दी: ‘देश की सैन्य तैयारी ऐसी होनी चाहिए कि कोई आँख उठाकर देखने की हिम्मत न करे।’ फिर सर्वोच्च बन कर वे सैन्य सरंजाम में भी लगे दिखे। पर उस से लघु पड़ोसी तक निर्विकार रहे। ऊपर से एक दूर देश के शासक, जो नेता के ‘दोस्त’ भी थे, ने भारत को झटके देना शुरू कर दिया! नेता को समझ न आया कि क्या करे। न मुँह से कुछ निकला। अब तक वे नित नये तमाशे, भाषण, जुमले से देश को झुलाते रहे थे। ऊँची बातों और अनोखे करतबों से रुतबा बनाया था। पर सुप्रीमो बनने पर उन की सारी वीरता केवल दुर्बल देसियों को अपशब्द कहने, विरोधी दल को मिटा देने की घोषणाओं और योजनाओं में ही देखी गई। बलवान दुर्जनों के प्रति चुप्पी ही रही।
सो, हिन्दू नेताओं की बातें सदैव अविश्वसनीय रही हैं। इसीलिए अभी एक बड़े नेता की हालिया घोषणाएं कि ‘4 मई के बाद बंगाल में लव-जिहाद और लैंड-जिहाद खत्म हो जाएगा’ वैसी ही लगती हैं। अन्यथा जिन राज्यों में उन की सत्ता दशकों से है — वहाँ जिहाद खत्म हो चुका होना चाहिए था। पर वह हर कहीं जारी है, अक्सर उन नेता के संगठनों के सहयोग से! जिस का कारण है कि वे जानते भी नहीं कि जिहाद है क्या? वरना, उन के सर्वोच्च नेता ‘मुहम्मद के रास्ते पर चलने’ का संदेश कदापि न देते! उन्हें नहीं मालूम कि मुहम्मद का स्वघोषित ‘सब से प्रिय काम’ जिहाद ही था। । सो, बंगाल समेत पूरे भारत में जिहाद का बेखटके चलते रहना ही अधिक संभावित है।
अतः यह क्लासिक हिन्दू विकत्थन परंपरा है। बड़े-बड़े शब्द, छोटे-छोटे कर्म। मजबूत से बचना, कमजोर पर चढ़ना। वफादार मजमे में उपदेशना। जहाँ कठिन सवालों का अंदेशा हो, वहाँ गायब रहना।
हिन्दुओं की विकत्थन (वाग्वीरता) प्रवृत्ति हमें दिखे या नहीं, तमाम दुष्टों, मतलबियों को साफ दिखती रही है। सौ सालों से भी अधिक, असलियत यही है कि अंदर-बाहर, विकट दुर्जनों व दुश्मनों के सामने अधिकांश हिन्दू नेता बगलें ही झाँकते हैं। पर वैसे भाषणों, नाटकीय अदाओं — उपवास रखने, कबूतर उड़ाने, से ध्यान लगाने तक — के आदी। साथ ही, हर महत्वपूर्ण या खतरनाक तत्व को ‘दोस्त’ या चेला बताते।
यह हिन्दू अदाएं, खूबियाँ-खामियाँ अंदरुनी दबंगों, और विदेशियों को लंबे समय से मालूम है। नतीजन उन्हें हमारी पोल जानते हुए तदनुसार मैनेज करना सरल रहा है। प्रायः वे भारत पर ध्यान भी नहीं देते। व्यापारिक लेन-देन के सिवा हम उन के हिसाब से प्रायः बाहर हैं। क्योंकि बाकी क्षेत्रों में गोल-गोल बातों के सिवा इधर शायद ही कुछ है।
यह कोई दुर्योग नहीं कि यहाँ ऐसे विकत्थन प्रेमी नेता, और बौद्धिक भी, हिन्दू ही रहे। मुस्लिम इस आदत से दूर हैं। वे यदि धमकी देते हैं तो लड़ने, मरने खुद सामने रहते हैं। दूसरों पर जबावदेही या तीसरे का रोना नहीं रोते। वे अपनी क्षमता, अपनी सीमा, और हिन्दू नेताओं की कमियाँ, लालसाएं, आदि जानते हुए शान्ति एवं अशान्ति पूर्वक अपने ध्येय की ओर निरंतर बढ़ रहे हैं। तभी जिहाद सतत जारी है। इस रूप में मुस्लिम नेता ही कर्मयोगी और व्यक्तिगत नि:स्वार्थ साबित हुए हैं। जबकि अधिकांश हिन्दू गपयोगी और कुर्सी-भोगी रहे हैं।
कब्र में पाँव रखे भी आम हिन्दू नेता अपने लिए एक और ‘टर्म’, तथा अपनी संतान को कुछ वैसा ही मिलने के सिवा किसी बात के लिए जलील होते, तिकड़म करते नहीं दिखते। समाज पर पड़ती चोट उन्हें नहीं दिखती, या उन की संवेदना नहीं छूती। उस पर कुछ करना वे दूसरों की जिम्मेदारी मानते हैं। कुछ तो कहते भी हैं: ‘हम ने हिन्दुओं का ठेका नहीं ले रखा’, ‘बाकी लोग क्या कर रहे हैं!’ वही नेता अपने कार्यकर्ताओं को बोलते हैं: ‘हमें मुसलमानों की सेवा करनी है, चाहे वे हमें एक भी वोट न दें।’
एक पूरा का पूरा हिन्दू संगठन, अपने को ‘विश्व का सब से बड़ा’ कहता हुआ, कुर्सी से बाहर रहते बंगलादेश के हिन्दुओं के लिए लंबी-चौड़ी माँगे करता था। लंबे प्रस्ताव पास कर हिन्दुओं को उकसाता था कि भारत सरकार के खिलाफ विद्रोह कर दें यदि वह बंगलादेश हिन्दुओं के लिए अलाँ फलाँ न करे। वह सब पढ़ते-सुनते हिन्दुओं में आक्रोश फैला और संगठन से सहानुभूति बढ़ी। जिस की परिणति अंततः उस संगठन को सारी कुर्सियाँ मिल जाने में हुई।
इस के बाद? बंगलादेश के हिन्दुओं के निरन्तर संहार, अपमान, होते रहने पर भी संगठन न केवल अपनी पिछली माँगें भूल गया, जिसे पूरा करना उस के अपने ‘स्वयंसेवक’ के हाथ में’ साथ में था — बल्कि उस की पूरी अदा बदल गई! सारी कुर्सी पा, अब वह बंगलादेश में उत्पीड़कों से विनती, तथा ‘दुनिया’ के लोगों से कुछ करने की ‘अपील’ करके हाथ झाड़े खड़ा है। ऐसा रंग बदल, ऐसी भीरुता, यहाँ किसी अन्य हिन्दू दल ने भी नहीं दिखायी जो इस ‘सब से बड़े’ स्वनामधन्य संगठन ने दर्शायी। यह संगठित विकत्थन का सिरमौर है।
इसलिए, हिन्दू नेताओं को ठगना या हाथ उमेठना सरल रहा है। ये अपनी ही बातों पर सम्मोहित खुद को महात्मा, विश्वनेता, लौह-पुरूष, दैवी-उत्पत्ति, आदि मान लेते हैं! कोई लीवर बनाने की फिक्र नहीं करते, जिस का उपयोग देश या समाज के हित आड़े वक्त करें। वे केवल निरापद विरोधी नेताओं, दलों के खिलाफ नये-नये लीवर बनाते रहते हैं ताकि कुर्सी अपने कब्जे रहे। बस। चाहे देश में यहाँ-वहाँ अनहोनी होती रहे: न जिम्मेदारी लेनी, न नेतृत्व बदलना।
यही वर्तमान युग की हिन्दू राजनीति है। आम जनता अज्ञानी और निरुपाय होती है। उस के नाम पर नेता ही सोचते, करते हैं। पर जो उभरता है, जल्द ही दूसरा रंग दिखाता है। सारी संस्थाएं, एजेंसियाँ, मंच, आदि नेताओं और उन के लगुओं के हाथ रहतीं, या उन्हें कंडम बना दिया जाता है। दलों के अंदर भी विवेकवान लोगों को किनारे रखा, या भगा दिया जाता है। ताकि विकत्थन सुभीते से चलता रहे।
हिन्दी लेखक निर्मल वर्मा ने पचास वर्ष पहले कहा था: ‘हम सांस्कृतिक रूप से इतने असहाय अंग्रेजों के काल में भी नहीं थे।’ आज वे होते तो संभवतः जोड़ते — और राजनीतिक रूप से भी। ऐसे असहाय से क्या उम्मीद हो!


