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नादब्रह्म की कल्पना और संगीत की उत्पत्ति

भारतीय परंपरा में संगीत केवल मनोरंजन का साधन अथवा भौतिक कला मात्र नहीं, अपितु यह परब्रह्म के साक्षात्कार, आत्मानुसंधान एवं मोक्ष प्राप्ति का एक सिद्ध, साक्षात और सर्वोत्कृष्ट मार्ग है। भारतीय संस्कृति में संगीत की उत्पत्ति, महता और उपयोगिता का विशद निरूपण हमारे प्राचीनतम ग्रंथों में उपलब्ध है। वेदों से लेकर उपनिषदों और पुराणों तक, संगीत को नादब्रह्म की संज्ञा दी गई है, जिसका उद्गम स्वयं परमेश्वर की संकल्पना से माना गया है। भारतीय चिंतन में संगीत की उत्पत्ति का मूलाधार अनाहत नाद अर्थात अनवरत गुंजायमान ध्वनि है। संगीत रत्नाकर में कहा गया है-

सामवेदादिदं गीतं संजग्राह पितामहः।

यह श्लोक स्पष्ट करता है कि जगत्पिता ब्रह्मा ने सामवेद से संगीत रूपी अमृत का दोहन किया है। वैदिक ग्रंथों में ओ३म् (ॐ) को समस्त नादों और मंत्रों का बीज माना गया है। बृहदारण्यक उपनिषद में गायत्री और साम के गूढ़ रहस्यों के माध्यम से नाद की सर्वव्यापकता को दर्शाया गया है। यह नाद ही परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी के रूप में स्थूल अभिव्यक्ति प्राप्त करता है। वैदिक काल में संगीत का स्वरूप पूरी तरह से आध्यात्मिक और यज्ञप्रधान था।

सामवेद की ऋचाओं का गायन विशेष यज्ञों, जैसे अग्निष्टोम, अश्वमेध आदि में किया जाता था। आरंभ में केवल तीन स्वरों- उदात्त, अनुदात्त और स्वरित का प्रयोग होता था, जो शनैः शनैः सात स्वरों -सा, रे, ग, म, प, ध, नि के रूप में विकसित हुए । ऋग्वेद में भी मंत्रों के गायन के लिए छंदों और संगीतमय स्वरों का उल्लेख मिलता है, जो यह सिद्ध करता है कि भारतीय संगीत की जड़ें अति प्राचीन हैं। उपनिषदों में संगीत को केवल लौकिक कला के रूप में नहीं, बल्कि ब्रह्मविद्या के समानांतर माना गया है।

छान्दोग्य उपनिषद के प्रारंभ में ही ओम् के उद्गीथ अर्थात संगीतयुक्त उच्चारण की महिमा का विस्तृत वर्णन करते हुए यह प्रतिपादित किया गया है कि जो कुछ भी साम (संगीत) है, वह सब उद्गीथ का ही विस्तार है। उपनिषदों के अनुसार जब साधक संगीत के माध्यम से अंतर्मुखी होता है, तब वह स्थूल जगत से ऊपर उठकर परब्रह्म के नाद स्वरूप का अनुभव करने लगता है।

कठोपनिषद और मुंडकोपनिषद में उस आध्यात्मिक चेतना का उल्लेख है, जो ॐ के नाद में लीन हो जाती है। औपनिषदिक ग्रंथों के अनुसार संगीत के सात स्वर मानव शरीर के सात चक्रों (ऊर्जा केंद्रों) को जागृत करने की सामर्थ्य रखते हैं। अतः संगीत अध्यात्म की प्रयोगशाला का एक अत्यंत सूक्ष्म और प्रभावी उपकरण है।

पौराणिक ग्रंथों में संगीत की उत्पत्ति और उसके विकास का अत्यंत मनोहारी और दार्शनिक विवरण प्राप्त होता है। शिव पुराण और लिंग पुराण में भगवान शिव को नाट्यराज और नटेश्वर के रूप में चित्रित किया गया है। शिव के डमरू से चौदह माहेश्वर सूत्रों की उत्पत्ति हुई, जिसे संपूर्ण व्याकरण और संगीत शास्त्र का मूल माना जाता है। देवी पार्वती की शयन मुद्रा से प्रेरित होकर भगवान शिव ने रुद्रवीणा की रचना की। उनके पंचमुखों से पांच रागों- श्री, वसंत, भैरव, पंचम, नट नारायण की उत्पत्ति हुई तथा छठा राग देवी पार्वती के मुख से उद्भूत हुआ।

श्रीमद्भागवत पुराण और विष्णु पुराण में भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी के नाद का रहस्योद्घाटन किया गया है। कृष्ण की वंशी का संगीत जड़ और चेतन दोनों को स्पंदित कर देता है। गोपियों का रासलीला संगीत, भक्ति का वह उच्चतम सोपान है जहां संगीत आत्मीय मिलन का माध्यम बन जाता है। वायु पुराण में संगीत के ग्राम, मूर्छना, तान और अलंकारों का वैज्ञानिक विवेचन मिलता है। वाल्मीकि रामायण में लव और कुश द्वारा महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण के गायन का प्रसंग आता है।

यह संगीत की उस उपयोगिता को दर्शाता है, जहां महाकाव्य और इतिहास को संगीतमय बनाकर जन-जन तक पहुंचाया गया। संगीत हृदय परिवर्तन और ज्ञान के विस्तार का सबल माध्यम बना। आचार्य भरत मुनि का नाट्यशास्त्र संगीत और कला का सर्वमान्य और सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रंथ है। इसे पंचम वेद की मान्यता प्राप्त है। इस ग्रंथ में स्वरों, श्रुतियों (22 श्रुतियां), वाद्यों (तत, अवनद्ध, सुशिर, घन), और रसों का ऐसा वैज्ञानिक और रस निष्पत्ति का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है, जो आज भी भारतीय संगीत की रीढ़ है । नाट्यशास्त्र संगीत की उपयोगिता को लोक रंजन और परम कल्याण दोनों के साथ जोड़ता है।

भारतीय परंपरा में संगीत शब्द व्यापक है-

गीतं वाद्यं तथा नृत्यं त्रयं संगीतमुच्यते।

अर्थात- गायन, वादन और नृत्य इन तीनों के समवेत रूप को संगीत कहा जाता है। संगीत की महता को दर्शाते हुए महर्षि याज्ञवल्क्य ने याज्ञवल्क्य स्मृति में कहा है-

वीणावादनतत्त्वज्ञः श्रुतिजातिविशारदः।

तालज्ञश्चाप्रयासेन मोक्षमार्गं नियच्छति।।

अर्थात- जो व्यक्ति वीणा वादन के तत्व को जानता है, श्रुतियों और जातियों में पारंगत है तथा ताल का ज्ञाता है, वह बिना किसी प्रयास के मोक्ष मार्ग को प्राप्त कर लेता है।

भारतीय दर्शन के अनुसार, संगीत में नाद (ध्वनि) और कला का अद्भुत समन्वय है। नाद योग के माध्यम से चित्त की वृत्तियों का निरोध होता है। महर्षि पतंजलि द्वारा प्रतिपादित योग सूत्र में भी चित्त की चंचलता को रोकने के लिए एकाग्रता की बात कही गई है, और नाद-योग, ध्यान की अवस्था प्राप्त करने का सबसे सुगम मार्ग है। संगीत की उपयोगिता मनुष्य के जन्म से लेकर उसकी अंतिम यात्रा तक अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है । भारतीय संगीत की सबसे बड़ी उपयोगिता उसकी उपचार शक्ति है।

प्राचीन भारतीय संतों ने विभिन्न रागों को रोग निवारण और मन की शांति से जोड़ा था। राग दीपक, राग मल्हार, राग दरबारी आदि केवल कलाकृतियां नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव मन की भावनाओं को नियंत्रित करने वाले वैज्ञानिक स्पंदन हैं। संगीत मानसिक तनाव, अवसाद को दूर कर जीवनी शक्ति का संचार करता है। संगीत की सर्वोच्च उपयोगिता आत्म साक्षात्कार है। ईश्वर स्तुति, भजन और कीर्तन के माध्यम से मानव मन सांसारिक वासनाओं से मुक्त होकर दिव्य ऊर्जा से जुड़ जाता है।

भक्ति आंदोलन के संतों, जैसे मीराबाई, सूरदास, त्यागराज और संत ज्ञानेश्वर ने संगीत को ही अपना आराध्य और मोक्ष का साधन बनाया। संगीत जाति, धर्म, और भाषा की सीमाओं से परे है। यह सामाजिक सद्भाव और एकता की डोर को मजबूत करता है। कजरी, सोहर, बिहू, बाउल आदि भारतीय लोक संगीत सामाजिक उत्सवों, ऋतु परिवर्तनों और कृषि कार्यों में मानव को प्रकृति के साथ जोड़कर उल्लास और ऊर्जा प्रदान करता है।

विश्व संगीत दिवस के अवसर पर भारतीय परंपरा में संगीत की इस अनवरत धारा का सिंहावलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि संगीत मानव सभ्यता का सर्वाधिक परिष्कृत, उदात्त और दिव्य आविष्कार है। वेद, उपनिषद, पुराण और नाट्यशास्त्र के आलेख इस बात के साक्षी हैं कि भारत ने संगीत को केवल आमोद-प्रमोद की वस्तु नहीं माना, बल्कि इसे ब्रह्म साक्षात्कार का एक सशक्त माध्यम माना है। नादब्रह्म की यह साधना आज भी प्रासंगिक है। बाह्य जगत की भागदौड़ और भौतिकवाद की चकाचौंध में जब मानव मन अशांत होता है, तब संगीत ही वह संजीवनी बूटी है जो आंतरिक शांति, आनंद और ईश्वरत्व की अनुभूति कराती है । भारतीय संगीत का प्रत्येक स्वर, प्रत्येक लय और प्रत्येक ताल इस शाश्वत सत्य को उद्घाटित करता है कि समूची सृष्टि एक संगीत है और हम सभी उस संगीत के एक अभिन्न अंग हैं।

भारतीय साहित्य में सामवेद को समस्त संगीतात्मक विद्याओं का मूल उत्स स्वीकार किया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने “वेदानां सामवेदोऽस्मि” कहकर इसके दिव्य वैभव को प्रतिपादित किया है। सामवेद मात्र ऋचाओं का संग्रह नहीं, अपितु ऋचाओं पर आश्रित विशिष्ट गान पद्धति है, जिसे सामगान कहा जाता है। विश्व संगीत दिवस के पावन परिप्रेक्ष्य में, सामगान की प्रविधि तथा यज्ञ (याग) एवं ऋतु चक्र के साथ इसके वैज्ञानिक व आध्यात्मिक अंतर्संबंधों का विवेचन भारतीय मनीषा की पराकाष्ठा को दिग्दर्शित करता है। सामगान लौकिक संगीत से सर्वथा भिन्न, एक अत्यंत परिष्कृत और जटिल विधा है।

ऋग्वेद की ऋचाओं को जब विशिष्ट स्वरों और गान पद्धति से आबद्ध किया जाता है, तब वह साम रूप धारण करती हैं। जैमिनीय सूत्र के अनुसार- “गीतिषु सामाख्या” अर्थात् गानक्रिया ही साम है। यज्ञीय अनुष्ठान के समय सामगान को सुव्यवस्थित करने के लिए इसे मुख्यतः पांच भागों (पंचविध साम) अथवा सात भागों (सप्तविध साम) में विभक्त किया गया है, जिन्हें भक्तियां कहा जाता है- हिंकार, प्रस्ताव, उद्गीथ, प्रतिहार, उपद्रव, निधन, प्रणव। मूल ऋचाओं को गान योग्य बनाने के लिए अक्षरों और स्वरों में छह प्रकार के परिवर्तन किए जाते हैं, जिन्हें सामविकार कहते हैं- विकार, विश्लेषण, विकर्षण, अभ्यास, वीर, और स्तोभ।

वैदिक गान का विकास तीन मूल स्वरों- उदात्त (उच्च), अनुदात्त (नीच), और स्वरित (समाहार) से हुआ। सामगान में इन तीन स्वरों का विस्तार सात स्वरों में हुआ, जिन्हें साम-पारिभाषिक शब्दावली में क्रुष्ट, प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, मन्द्र, और अतिस्वार्य कहा गया। यही स्वर आगे चलकर लौकिक संगीत के षड्ज (सा), ऋषभ (रे), गांधार (ग), मध्यम (म), पंचम (प), धैवत (ध), और निषाद (नि) बने।

भारतीय संस्कृति में यज्ञ और सामगान एक-दूसरे के पूरक हैं। यज्ञ स्थूल आहुति है, तो सामगान उसकी सूक्ष्म आत्मिक चेतना है। बिना सामगान के कोई भी सोमायग पूर्ण नहीं माना जाता। यज्ञशाला में चार मुख्य ऋत्विज् होते हैं- होता (ऋग्वेद), अध्वर्यु (यजुर्वेद), ब्रह्मा (अथर्ववेद), और उद्गाता (सामवेद)। उद्गाता का कार्य यज्ञ में देवताओं के आह्वाहन के लिए उच्च कोटि के सामों का गान करना है। सोमयाग, जैसे अग्निष्टोम, वाजपेय, राजसूय में जब सोमलता का रस निकाला जाता है, तब उस क्रिया को ऊर्जस्वित करने के लिए पवमान सूक्तों का सामगान होता है।

मान्यता है कि साम की ध्वनि तरंगें यज्ञीय धूम और मंत्रों के प्रभाव को अंतरिक्ष मंडल तक प्रसारित करती हैं, जिससे देवताओं की तृप्ति होती है। भारतीय ऋषियों ने यह सूक्ष्म अनुभव किया था कि प्रकृति का ऋतु परिवर्तन केवल मौसम का बदलना नहीं है, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा के स्पंदन का बदलना है। अतः, विशिष्ट ऋतुओं में विशिष्ट सामों के गायन का विधान किया गया ताकि प्रकृति और मानव-चेतना के मध्य सामंजस्य स्थापित हो सके। छान्दोग्य उपनिषद (द्वितीय प्रपाठक) में छः ऋतुओं- वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर और साम के अंगों क्रमशः हिंकार, प्रस्ताव, उद्गीथ, प्रतिहार, निधन का स्पष्ट दार्शनिक व वैज्ञानिक संबंध निरूपित है।

सामगान की इसी ऋतु अनुकूल पद्धति से कालांतर में भारतीय शास्त्रीय संगीत के ऋतु-राग विकसित हुए। वर्षा ऋतु में सामगान की लहरियों ने आगे चलकर राग मल्हार और उसके विभिन्न प्रकारों को जन्म दिया, जो आज भी मेघों को आकर्षित करने और वर्षा जनित शांति प्रदान करने के लिए गाए जाते हैं। वसन्त ऋतु के सामों से राग वसन्त और राग बहार का उद्भव हुआ, जो प्रकृति में नवजीवन और उल्लास का संचार करते हैं। सामगान की शैली और उसका याग व ऋतुओं के साथ संबंध यह प्रमाणित करता है कि भारत का प्राचीन संगीत केवल मनोरंजन की विधा नहीं, अपितु एक खगोलीय, ऋतु जैविक और आध्यात्मिक विज्ञान था। मंत्रों के उतार-चढ़ाव, ऋतुओं के बदलते स्वर और यज्ञ की समिधा मिलकर एक अखंड ब्रह्मांडीय संगीत की रचना करते हैं। यह पद्धति सिखाती है कि जब मनुष्य प्रकृति की लय के साथ सुर मिलाकर जीता है, तभी जीवन में वास्तविक सामंजस्य और साम (शांति) की स्थापना होती है।

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By अशोक 'प्रवृद्ध'

सनातन धर्मं और वैद-पुराण ग्रंथों के गंभीर अध्ययनकर्ता और लेखक। धर्मं-कर्म, तीज-त्यौहार, लोकपरंपराओं पर लिखने की धुन में नया इंडिया में लगातार बहुत लेखन।

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