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डोनाल्ड ट्रंप: अमेरिका को बना दिया दुकान

वे एक मालिक हैं। ऐसे मालिक, जो हर संस्था को संपत्ति और हर व्यवस्था को सौदे की संभावना के रूप में देखते हैं। वे शून्य के मालिक हैं। वे शिकारी हैं, लेकिन जंगल के नहीं। जंगल का शिकारी भी प्रकृति के किसी संतुलन का हिस्सा होता है। ट्रंप का संसार बाजार का है। वहां हर चीज की कीमत है, हर संबंध का लाभ है और हर अवसर एक सौदा है।.. उनके स्वभाव को किसी सार्वजनिक उत्तरदायित्व ने नहीं गढ़ा। उसे सौदेबाजी ने गढ़ा है।

राष्ट्रों के जीवन में कुछ लोग नेता बनकर आते हैं, कुछ दूरदृष्टि लेकर और कुछ इतिहास की दिशा बदलने के लिए। डोनाल्ड ट्रंप इनमें से किसी श्रेणी में सहज नहीं बैठते। वे न परंपरागत अर्थों में राजनेता हैं, न दूरदर्शी और न ही इतिहास के उन तानाशाहों की तरह जिन्हें किसी बड़े विचार ने संचालित किया हो। वे उससे कहीं अधिक साधारण, और इसलिए कहीं अधिक खतरनाक हैं। वे एक मालिक हैं। ऐसे मालिक, जो हर संस्था को संपत्ति और हर व्यवस्था को सौदे की संभावना के रूप में देखते हैं। वे शून्य के मालिक हैं।

वे शिकारी हैं, लेकिन जंगल के नहीं। जंगल का शिकारी भी प्रकृति के किसी संतुलन का हिस्सा होता है। ट्रंप का संसार बाजार का है। वहां हर चीज की कीमत है, हर संबंध का लाभ है और हर अवसर एक सौदा है। उनके स्वभाव को किसी सार्वजनिक उत्तरदायित्व ने नहीं गढ़ा। उसे सौदेबाजी ने गढ़ा है। इसी कारण अमेरिकी राजनीति के इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि ट्रंप सत्ता में हैं। त्रासदी यह है कि अमेरिका ने इस सौदेबाजी को नेतृत्व समझ लिया, शोर को शक्ति मान लिया और संस्थाओं के प्रति अविश्वास को साहस का पर्याय बना दिया।

वे मूलतः दुकानदार हैं। फर्क केवल इतना है कि इस बार दुकान किसी बाजार में नहीं, दुनिया के सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र के भीतर खुली है। उन्हें ऐसा खजांची मिल गया है जिसकी तिजोरी खुली पड़ी है और एक ऐसा समाज, जो थका हुआ है, बंटा हुआ है और अपने ही आदर्शों से धीरे-धीरे दूर जा चुका है। ऐसे समाज ने स्वयं अपने हाथों से सत्ता की चाबी उन्हें सौंप दी।

ट्रंप को समझने के लिए उन्हें किसी महान राजनीतिक विचारधारा के प्रतिनिधि की तरह पढ़ना भूल होगी। वे क्रांति नहीं लाना चाहते। वे किसी नए समाज की रचना भी नहीं कर रहे। उनका संसार इच्छाओं का संसार है। उनके लिए दुनिया अवसरों का बाजार है, जहां स्थायी मूल्य नहीं, तत्काल लाभ मायने रखता है। वही सही है जिससे तुरंत फायदा हो जाए। वही निर्णय उपयोगी है जिससे अगला सौदा आसान हो जाए।

उनका कारोबारी जीवन भी इसी मानसिकता का विस्तार था। उन्होंने संस्थाएं बनाने की अपेक्षा उनसे मूल्य निकालना अधिक सीखा। दिवालियापन उनके लिए असफलता नहीं था। वह कारोबार की एक रणनीति थी। कर्ज बोझ नहीं, सौदे का औजार था। कंपनियां स्थायी निर्माण नहीं, ऐसी खदानें थीं जिनसे जितना संभव हो उतना लाभ निकाल लिया जाए। पीछे क्या बचा, यह कभी सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न नहीं रहा।

आज यही सोच अमेरिकी शासन व्यवस्था पर उतरती दिखाई देती है। सरकार सार्वजनिक विश्वास की संस्था कम और निजी प्रभाव का माध्यम अधिक लगने लगती है। प्रशासनिक एजेंसियां, नियामक संस्थाएं और न्याय विभाग की स्वतंत्रता लोकतंत्र के आवश्यक स्तंभ नहीं, बल्कि ऐसे अवरोध बन जाते हैं जिन्हें हटाया जा सकता है। राष्ट्रपति का पद भी संवैधानिक दायित्व से अधिक निजी ब्रांड का विस्तार बनकर दिखाई देता है।

जब किसी लोकतंत्र में यह प्रश्न उठने लगे कि सत्ता और निजी संपत्ति के बीच की रेखा कितनी बची है, तब चिंता केवल नैतिकता की नहीं रह जाती। तब प्रश्न पूरे गणराज्य का हो जाता है। यदि सार्वजनिक पद निजी समृद्धि का साधन बनने लगे, तो शासन की मुद्रा बदल जाती है। निर्णय नीति से नहीं, लाभ से मापे जाने लगते हैं। तब यह पूछना स्वाभाविक हो जाता है कि आखिर शासन की असली पूंजी क्या रह गई है। उत्तर असहज है—गणराज्य स्वयं।

हर मालिक को अपने लोग चाहिए। हर जागीर अपने वफादारों पर टिकी होती है। सत्ता भी इससे अलग नहीं होती। ट्रंप के चारों ओर ऐसे लोगों का घेरा बनता गया जिनकी सबसे बड़ी योग्यता स्वतंत्र विचार नहीं, व्यक्तिगत निष्ठा थी। उनका भविष्य संस्था से नहीं, व्यक्ति से जुड़ा था। वे संविधान के कर्मचारी कम और सत्ता के सेवक अधिक दिखाई देने लगे।

ऐसे चेहरे इतिहास में नए नहीं हैं। उत्तर-औपनिवेशिक देशों की राजनीति में वे बार-बार दिखाई देते रहे हैं। वहां सलाहकार शासक के होते थे, राज्य के नहीं। अधिकारी संविधान के प्रति नहीं, सत्ता के प्रति उत्तरदायी बनते थे। योग्यता की जगह निकटता महत्व पाने लगती थी। निर्णय संस्थाओं में नहीं, दरबारों में लिए जाते थे। लोकतंत्र बाहर से जस का तस दिखाई देता था, लेकिन भीतर उसका चरित्र बदल चुका होता था।

अमेरिका को लंबे समय तक इसीलिए अलग माना जाता रहा कि वहां संस्थाएं व्यक्तियों से बड़ी थीं। राष्ट्रपति बदलते थे, लेकिन व्यवस्था बनी रहती थी। प्रशासन अपनी निरंतरता बनाए रखता था। कानून सत्ता को सीमित करता था। किंतु जब व्यवस्था की स्थिरता ही राजनीतिक संघर्ष का विषय बन जाए, तब गणराज्य का संतुलन बदलने लगता है।

हाल के वर्षों में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों की सेवा-शर्तों में किए गए बदलावों ने इसी चिंता को और गहरा किया। जब किसी अधिकारी को यह महसूस होने लगे कि स्वतंत्र राय उसकी नौकरी छीन सकती है, तब निष्पक्ष प्रशासन धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है। विशेषज्ञता की जगह आज्ञाकारिता महत्व पाने लगती है। शासन की रीढ़ माने जाने वाली नौकरशाही धीरे-धीरे व्यक्ति-निष्ठ तंत्र में बदलने लगती है।

लोकतंत्र का क्षरण हमेशा घोटालों से शुरू नहीं होता। कई बार सब कुछ कानून के भीतर होता दिखाई देता है, लेकिन व्यवस्था की आत्मा बदल चुकी होती है। नियुक्तियां योग्यता से अधिक निष्ठा पर होने लगती हैं। संस्थाएं सार्वजनिक दायित्व की जगह राजनीतिक सुविधा का साधन बन जाती हैं। नियम बने रहते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य बदल जाता है। बाहर से गणराज्य वैसा ही दिखाई देता है, भीतर उसका व्याकरण बदल चुका होता है।

यही ट्रंप की राजनीति का सबसे गहरा अर्थ है। यह केवल लेन-देन की राजनीति नहीं है। यह उस मानसिकता का विस्तार है जिसमें हर संस्था का मूल्य इस आधार पर तय होता है कि उससे कितना लाभ निकाला जा सकता है। राष्ट्र तब साझा विश्वास का घर नहीं रह जाता। वह धीरे-धीरे एक ऐसे विशाल बाजार में बदलने लगता है जहां हर चीज बिकाऊ है और हर संस्था केवल अगले सौदे का इंतजार कर रही है।

यहीं से राजनीति लेन-देन की सीमा पार कर निकासी की राजनीति बन जाती है। जैसे कोई व्यापारी खदान से खनिज निकालकर उसे खाली छोड़ देता है, वैसे ही संस्थाओं से उनका मूल्य निकाल लिया जाता है। अमेरिका ने दो सौ वर्षों में अदालतों, स्वतंत्र एजेंसियों, प्रशासनिक परंपराओं, विश्वविद्यालयों, अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों और संवैधानिक मर्यादाओं की जो पूंजी अर्जित की थी, वह किसी एक पीढ़ी की कमाई नहीं थी। वह अनेक पीढ़ियों के धैर्य, संयम और आत्मानुशासन का परिणाम थी। विरासत का अर्थ उसे बढ़ाना होता है, खर्च कर देना नहीं। लेकिन जब विरासत को निजी संपत्ति समझ लिया जाए, तब उसका अंत शुरू हो जाता है।

यही प्रवृत्ति नए आर्थिक क्षेत्रों में भी दिखाई देती है। राजनीति और निजी कारोबार के बीच की दूरी लगातार घटती जाती है। सत्ता से निकटता ही सबसे बड़ी पूंजी बन जाती है। धन प्रभाव खरीदता है और प्रभाव निर्णयों को प्रभावित करने लगता है। विदेशी निवेश केवल निवेश नहीं रह जाता, वह सत्ता तक पहुंचने का रास्ता भी बन सकता है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत पारदर्शिता होती है। जब वही धुंधली पड़ने लगे, तब केवल आर्थिक व्यवस्था नहीं, राजनीतिक नैतिकता भी संकट में आ जाती है।

यहां भ्रष्टाचार पारंपरिक अर्थों में दिखाई नहीं देता। रिश्वत का कोई लिफाफा नहीं, किसी अंधेरे कमरे का कोई गुप्त सौदा नहीं। सब कुछ नियमों के भीतर होता दिखाई देता है। लेकिन नियमों की आत्मा बदल चुकी होती है। व्यवस्था का उद्देश्य सार्वजनिक हित नहीं, निजी सुविधा बनने लगता है। यही सबसे खतरनाक स्थिति होती है, क्योंकि तब भ्रष्टाचार अपवाद नहीं रहता, वह शासन की भाषा बन जाता है।

कभी अमेरिका की संस्थाओं को लोहे की तरह मजबूत माना जाता था। विश्वास था कि वहां कोई व्यक्ति संविधान से बड़ा नहीं हो सकता। लेकिन संस्थाओं की मजबूती केवल कानून से नहीं आती। वह उस राजनीतिक संस्कृति से आती है जो स्वयं अपनी सीमाओं का सम्मान करती है। जब सत्ता अपनी सीमाओं को ही बाधा मानने लगे, तब सबसे मजबूत संस्थाएं भी धीरे-धीरे कांच की तरह नाजुक हो जाती हैं।

न्यायपालिका, प्रशासन और स्वतंत्र नियामक संस्थाओं के अधिकारों को लेकर हाल के वर्षों में जो संघर्ष दिखाई दिया, वह केवल संवैधानिक बहस नहीं था। वह इस प्रश्न का संघर्ष था कि लोकतंत्र में अंतिम निष्ठा व्यक्ति के प्रति होगी या संस्था के प्रति। यदि हर संस्था अंततः कार्यपालिका की इच्छा पर निर्भर हो जाए, तो शक्ति का संतुलन बदल जाता है। लोकतंत्र का ढांचा खड़ा रहता है, लेकिन उसका आधार खिसकने लगता है।

कांग्रेस राजनीतिक ध्रुवीकरण में उलझी दिखाई देती है। निगरानी संस्थाएं कमजोर पड़ती हैं। प्रशासनिक स्वायत्तता सिकुड़ती है। अंतरराष्ट्रीय गठबंधन भी स्थायी नीति के बजाय तत्काल राजनीतिक गणना का हिस्सा बनने लगते हैं। गणराज्य धीरे-धीरे शासन की प्रणाली से अधिक व्यक्ति की इच्छा का विस्तार बन जाता है।

लेकिन किसी भी गणराज्य का सबसे बड़ा संकट संस्थाओं का नहीं, नागरिकों का होता है। लगातार विवाद, आरोप, सनसनी और राजनीतिक संघर्ष लोगों को थका देते हैं। आक्रोश सामान्य हो जाता है। सत्य भी पसंद और नापसंद में बंट जाता है। नागरिक प्रश्न पूछना छोड़ देते हैं। वे केवल अगला दृश्य देखने लगते हैं।

यहीं लोकतंत्र चुपचाप तमाशे में बदल जाता है।

राजनीति शासन से अधिक प्रदर्शन बन जाती है। राष्ट्रपति संवैधानिक पद से अधिक मंच का मुख्य अभिनेता दिखाई देता है। समाचार नीति की सूचना नहीं, मनोरंजन का अगला दृश्य बन जाते हैं। नागरिक सहभागी नहीं रहते, दर्शक बन जाते हैं। तालियां और हूटिंग मतदान से अधिक महत्वपूर्ण लगने लगती हैं।

कोई भी राष्ट्र केवल चुनावों से नहीं चलता। वह संस्थाओं पर विश्वास, नागरिक अनुशासन और भविष्य के प्रति सामूहिक उत्तरदायित्व पर चलता है। व्यापार में अगला सौदा हमेशा संभव होता है। कोई कंपनी डूब जाए तो दूसरी बनाई जा सकती है। लेकिन राष्ट्र के साथ ऐसा नहीं होता। लोकतांत्रिक संस्थाओं का क्षरण किसी नई कंपनी की तरह फिर से शुरू नहीं किया जा सकता। उनकी विश्वसनीयता टूट जाए तो उसे वापस पाने में पीढ़ियां लग जाती हैं।

महान गणराज्य अक्सर किसी विस्फोट से नहीं टूटते। वे धीरे-धीरे अपनी रोशनी खोते हैं। पहले संस्थाओं पर विश्वास कम होता है। फिर सार्वजनिक जीवन सिकुड़ता है। उसके बाद साझा नैतिकता क्षीण होने लगती है। अंततः समाज यह भूल जाता है कि कानून व्यक्ति से बड़ा क्यों बनाया गया था।

इसलिए किसी गणराज्य का सबसे बड़ा शत्रु हमेशा बाहर नहीं होता। कई बार उसका सबसे बड़ा शत्रु भीतर बैठा होता है—वह उदासीनता जो नागरिकों को यह विश्वास दिला देती है कि संस्थाएं अपने आप बची रहेंगी। इतिहास बताता है कि संस्थाएं कभी अपने आप नहीं बचतीं। उन्हें बचाने के लिए नागरिकों का निरंतर जागृत रहना आवश्यक होता है।

ट्रंप इस पूरी कहानी में केवल एक व्यक्ति नहीं हैं। वे उस बेचैनी, असंतोष, लालच और थकान का प्रतिबिंब हैं, जो लंबे समय से अमेरिकी समाज के भीतर जमा होती रही। उन्होंने कोई नया समाज नहीं बनाया। उन्होंने उसी समाज को उसके सामने खड़ा कर दिया, जैसा वह भीतर से बन चुका था। दर्पण चेहरे नहीं बदलता, केवल उन्हें दिखाई देता है।

वे एक दिन सत्ता से चले जाएंगे। हर शासक जाता है। लेकिन उनके जाने के बाद जो बचेगा, वही असली प्रश्न होगा। क्या संस्थाएं पहले जैसी रहेंगी? क्या नागरिकों का विश्वास लौट आएगा? क्या सार्वजनिक जीवन फिर साझा मूल्यों पर खड़ा हो सकेगा? या फिर गणराज्य केवल अपने पुराने वैभव की स्मृति बनकर रह जाएगा?

इतिहास का सबसे कठोर पाठ यही है कि गणराज्य अचानक नहीं मरते। वे अपने ही मूल्यों को छोड़ते-छोड़ते समाप्त होते हैं। वे शक्ति को संयम से ऊपर, व्यक्ति को संस्था से ऊपर और तमाशे को शासन से ऊपर रख देते हैं। उसी क्षण उनका पतन शुरू हो जाता है।

शून्य का यह सौदागर वही करता है जो वह हमेशा करता आया है। वह संस्था से उसका मूल्य निकाल लेता है, लाभ अपने साथ ले जाता है और पीछे केवल खोल छोड़ देता है। त्रासदी यह नहीं कि उसने ऐसा किया। त्रासदी यह है कि एक महान राष्ट्र ने उसे ऐसा करने दिया।

अंततः राष्ट्र और कैसीनो में केवल एक अंतर होता है। कैसीनो अगली बाजी पर चलता है। राष्ट्र अगली पीढ़ी पर। जिस दिन कोई समाज दोनों के बीच का अंतर भूल जाता है, उसी दिन उसका भविष्य गिरवी पड़ना शुरू हो जाता है। यही किसी भी गणराज्य की सबसे बड़ी चेतावनी है।

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