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विकसित राष्ट्र बनने का रास्ता

बजट के प्रावधानों से प्रकट होता है कि भारत अपनी क्षमताओं का विस्तार करने वाला है ताकि दुनिया के बाजार में भारत के उत्पादों की पहुंच बढ़ाई जाए। अमेरिका के साथ समझौते का फ्रेमवर्क जारी होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि इससे मेक इन इंडिया कार्यक्रम को लाभ होगा। उन्होंने यह भी कहा कि देश की महिलाओं व युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बनेंगे।

इस वर्ष संसद का बजट सत्र कई कारणों से बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। बजट सत्र शुरू होने से ठीक पहले भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार संधि हुई और सत्र के बीच में अमेरिका के साथ दोपक्षीय व्यापार संधि की घोषणा हुई। इसका फ्रेमवर्क जारी हो गया है और आगे की वार्ता 13 फरवरी को शुरू होगी। भारत के लिए अच्छी बात यह है कि पिछले साल जुलाई में अमेरिका के राष्ट्रपति ने जो रेसिप्रोकल यानी जैसे को तैसा टैरिफ लगाया था उसे 25 से घटा कर 18 फीसदी कर दिया है और रूस से तेल खरीदने की वजह से जो अतिरिक्त 25 फीसदी टैरिफ लगाया था उसे समाप्त कर दिया है। यह फैसला भारत के अंतरराष्ट्रीय व्यापार की तस्वीर बदलने वाला है। यह ध्यान रखने की जरुरत है कि जुलाई के बाद जब भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगा हुआ था तब भी अमेरिका के साथ होने वाले व्यापार में कमी नहीं आई थी। एक साल पहले की तुलना में इस अवधि में भारत का निर्यात ज्यादा टैरिफ होने के बावजूद बढ़ा था। कल्पना करें कि 50 प्रतिशत टैरिफ होने पर जब निर्यात बढ़ा था तो 18 फीसदी हो जाने पर उसमें कितनी तेजी आएगी!

अमेरिका के साथ जो दोपक्षीय व्यापार संधि यानी बीटीए होनी है उसके अंतरिम फ्रेमवर्क पर बात करें उससे पहले बजट को संक्षेप में समझने की आवश्यकता है। उसी से पता चलेगा कि कैसे भारत ने दुनिया के देशों के साथ व्यापार बढ़ाने की तैयारी पर काम करना शुरू किया है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने भाषण की शुरुआत भारत के विनिर्माण सेक्टर को मजबूती देने के उपायों से की। भारत उन सभी क्षेत्रों में विनिर्माण को मजबूत करेगा, जिन क्षेत्रों के उत्पादों के लिए विदेशी बाजार खुल रहा है। यूरोपीय संघ के 27 देशों के अलावा ब्रिटेन, न्यूजीलैंड जैसे देश और अब अमेरिका का बाजार भारत के निर्यातकों के लिए खुल रहा है। भारत इन देशों को खिलौने बेचता है साथ ही कपड़े, चमड़े के उत्पाद, रत्न व जेवरात, समुद्री उत्पाद आदि भी बेचता है। औषधि, आयुर्वेदिक उत्पाद और कई तरह के कृषि उत्पाद भी बड़ी मात्रा में अमेरिका और यूरोप के बाजारों में जाते हैं। अमेरिका में बिकने वाली ज्यादातर जेनेरिक दवाएं भारत से जाती हैं। वित्त मंत्री ने अपने भाषण में इन सभी उत्पादों से जुड़े क्षेत्रों को सशक्त बनाने के प्रावधान किए। ध्यान रहे बजट से पहले ही पिछले साल केंद्र सरकार ने श्रम सुधार कर दिए हैं। साथ ही जीएसटी के दूसरे चरण को भी लागू कर दिया गया है। केंद्रीय वित्त मंत्री ने विनिर्माण सेक्टर को बढ़ावा देने के उपायों के साथ साथ सीमा शुल्क से जुड़े नियमों में भी बड़ा बदलाव किया है। इसका मकसद भी भारतीय कंपनियों को निर्यात के लिए तैयार करना और सक्षम बनाना का है। यह सब किया गया वित्तीय अनुशासन को कायम रखते हुए और अर्थव्यवस्था के बुनियादी ढांचे को मजबूत बनाते हुए।

बजट के प्रावधानों से प्रकट होता है कि भारत अपनी क्षमताओं का विस्तार करने वाला है ताकि दुनिया के बाजार में भारत के उत्पादों की पहुंच बढ़ाई जाए। अमेरिका के साथ समझौते का फ्रेमवर्क जारी होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि इससे मेक इन इंडिया कार्यक्रम को लाभ होगा। उन्होंने यह भी कहा कि देश की महिलाओं व युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बनेंगे। निश्चित रूप से यह बड़ी बात है और इसे समझना व स्वीकार करना बहुत मुश्किल नहीं है। जब अमेरिका अपना 27 लाख करोड रुपए का बाजार भारत के लिए खोल रहा है, यूरोपीय संघ के साथ भी 25 लाख करोड़ रुपए का कारोबार होना है और संयुक्त अरब अमीरात के साथ भी 25 लाख करोड़ रुपए के व्यापार की सहमति बनी है तो निश्चित रूप से भारत से निर्यात होने वाली वस्तुओं का उत्पादन बढ़ेगा और जब उत्पादन बढ़ेगा तो उसमें महिलाओं और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बनेंगे। यूरोपीय संघ के साथ तो मोबिलिटी का समझौता अलग से हुआ है, जिससे भारत के युवाओं को यूरोपीय देशों में ज्यादा आसानी से शिक्षा व रोजगार के अवसर मिलेंगे। एक और अच्छी बात यह है कि अमेरिका के साथ समझौते से पहले जितने तरह की आशंकाएं जताई जा रही थीं वो सारी गलत साबित हुई हैं। भारत ने अपने किसानों और पशुपालकों के हितों की पूरी तरह से रक्षा की है। सोयाबीन सहित सभी फसलों को अंतरिम समझौते से बाहर रखा गया है। हालांकि ऐसा नहीं है कि अमेरिका के कृषि व डेयरी उत्पादों पर पहले पूरी तरह से पाबंदी थी। पहले भी ये उत्पाद भारत के बाजार में आते थे लेकिन उन पर मात्रात्मक पाबंदी थी और टैरिफ ज्यादा था। वह स्थिति बनी रहेगी।

बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक तरफ वाणिज्य मंत्रालय की टीम दुनिया के देशों के साथ व्यापार संधियां कर रही है तो दूसरी ओर वित्त मंत्रालय ने ऐसा बजट तैयार किया, जो इन व्यापार संधियों के लिए पूरक की तरह काम करे। बजट में ऐसे प्रावधान किए, जिनसे भारत को इन संधियों का अधिकतम लाभ मिल सके। बजट में विनिर्माण सेक्टर से लेकर बुनियादी ढांचे के विकास पर ध्यान केंद्रित किया गया। वित्त मंत्री ने 12.20 लाख करोड़ रुपए के पूंजीगत खर्च का ऐलान किया। इसमें से लगभग आधा खर्च सड़क और रेल नेटवर्क को मजबूत करने के लिए किया जाएगा। यह मानने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि सरकार के इस मध्यावधि बजट में लोक लुभावन घोषणाओं से ज्यादा देश के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने, नीतिगत स्तर पर एक दिशा देने और विनिर्माण सेक्टर को शक्तिशाली बनाने पर ध्यान केंद्रित किया गया। इसका लाभ आने वाले वर्षों में देश के सभी 140 करोड़ नागरिकों को मिलेगा। बजट प्रावधानों और दुनिया भर के देशों के साथ हो रहे व्यापार समझौतों से 2047 तक भारत को विकसित बनाने के संकल्प को शक्ति मिलेगी।

संसद का बजट सत्र और भी कई कारणों से बहुत अहम हो गया है। बजट सत्र होने के बावजूद विपक्ष ने रचनात्मक भूमिका निभाने की बजाय टकराव का रास्ता चुना। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने लोकसभा में नियमों का उल्लंघन करके एक अप्रकाशित किताब के अंश पढ़ने शुरू कर दिए और जब नियम 349 के हवाले उनको रोका गया तो उन्होंने इसे अपने अहंकार का मुद्दा बना दिया। उनकी पार्टी अपने नेता के अहंकार की रक्षा के लिए उतर गई और इसका परिणाम यह हुआ कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर सरकार की ओर से पेश धन्यवाद प्रस्ताव पर लोकसभा में चर्चा नहीं हो सकी। जब चर्चा नहीं हो पाई तो प्रधानमंत्री का जवाब भी नहीं हो पाया। विपक्षी पार्टियों ने महिला सांसदों को आगे करके ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि स्पीकर महोदय को कहना पड़ा कि कुछ अप्रत्याशित घटित हो सकता था। इसलिए प्रधानमंत्री ने लोकसभा में जवाब नहीं दिया। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर राज्यसभा में चर्चा हुई तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राज्यसभा में जवाब दिया। पता नहीं विपक्षी पार्टियों को इसका अनुमान है या नहीं कि ऐसे महत्वपूर्ण अवसर पर भी संसद को बाधित करके वे अंततः अपना नुकसान करते हैं।

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की अप्रकाशित किताब के हवाले जो सवाल उठा रहे थे वो सवाल पलट कर उनकी पार्टी और सरकार के ऊपर आ गए। कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने 2007 में सेना के रिटायर मेजर जनरल वीके सिंह के गुड़गांव स्थिति आवास पर छापा मरवाया था। उनके खिलाफ सीबीआई ने केस दर्ज किया था। उनका कसूर इतना था कि उन्होंने ‘इंडियाज एक्सटर्नल इंटेलीजेंसः सीक्रेट्स ऑफ रिसर्च एंड एनालिसिस विंग’ नाम से एक किताब लिखी थी। इससे कांग्रेस सरकार की ढेर सारी कमियां सामने आ रही थीं। ध्यान रहे मेजर जनरल वीके सिंह चार साल तक भारत की विदेशी खुफिया एजेंसी में तैनात रहे थे। उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर किताब लिखी थी लेकिन कांग्रेस की सरकार ने इसके लिए उनके खिलाफ सीबीआई में मुकदमा कराया और छापा मरवाया। कांग्रेस और उसके नेताओं को समझना चाहिए सेना का मामला बहुत संवेदनशील होता है और उस पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए। लगातार हार से परेशान कांग्रेस को एक मुद्दे की तलाश है और उस तलाश में उसके नेता सेना को घसीटने से भी बाज नहीं आ रहे हैं। परंतु बजट सत्र में कांग्रेस का यह प्रयास भी नाकाम रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में इस विवाद का कोई जिक्र नहीं किया। लेकिन उन्होंने बताया कि कांग्रेस की पहले की सरकारों ने कितनी गड़बड़ी की है, जिसे ठीक करने में उनका सबसे ज्यादा समय जाया हो रहा है। प्रधानमंत्री ने जो कहा उसे समझने के लिए उनकी ओर से दिया गया एक उदाहरण काफी है। उन्होंने बताया कि उनके जन्म से पहले नर्मदा बांधी की आधारशिला रखी गई थी और जब वे मुख्यमंत्री बने तो उनके प्रयास से यह कार्य पूरा हुआ। उनके स्वंय मुख्यमंत्री रहते इसके लिए तीन दिन तक धरना देना पड़ा था। प्रधानमंत्री ने कहा है कि वे कांग्रेस की इस कार्य संस्कृति को बदलते हुए देश को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में बढ़ रहे हैं। उनको परवाह नहीं है कि विपक्ष उनके बारे में क्या कहता है। उन्होंने कहा कि उनका रिमोट 140 करोड़ लोग हैं। इसका अर्थ है कि वे वही करते हैं, जो 140 करोड़ लोग चाहते हैं और जो उनके हित का है। इसमें अड़ंगा डाल कर विपक्ष अपना नुकसान करता है।  (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

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