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पुलिस थानों की दशा बदहाल

देश भर के पुलिस स्टेशनों में हजारों-लाखों जब्त कारें, बाइकें व अन्य छोटे बड़े वाहन सड़ रहे हैं। जो कि थानों से सटी सड़कों पर खड़े रहते हैं और यातायात बाधित करते हैं। ईंधन रिसाव, जंग, बरसाती पानी से मच्छर पनपते हैं, डेंगू-मलेरिया का खतरा बढ़ता है। आग लगने का जोखिम तो हमेशा बना ही रहता है।

अक्सर हम फ़िल्मों और वेब सीरीज में यह देखते हैं कि किस तरह भारत की पुलिस को बुनियादी सुविधाओं और लाचार पुरानी व्यवस्थाओं के चलते अक्सर कोर्ट और मीडिया का शिकार बनना पड़ता है। जबकि वास्तविक स्थिति सभी को पता है कि पुलिस वाले भी आख़िर इंसान ही होते हैं। यदि पुलिस से उम्मीद की जाए कि वह क़ानून व्यवस्था बनाए रखे तो क्या पुलिस व पुलिस थानों में बुनियादी जरूरतों का ध्यान रखना सरकार की प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए? इस बात को नजरंदाज नहीं किया जा सकता कि फ़िल्में व टीवी शो समाज का आईना होते हैं। इनमें दिखाए जाने वाली पुलिस की लाचारी वास्तविकता पर ही आधारित होती है।

आज जब सरकार ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘मॉडर्न पोलिसिंग’ का नारा लगाती है, तब भी देश के अधिकांश पुलिस स्टेशन उसी औपनिवेशिक युग की इमारतों में कैद हैं। बुनियादी सुविधाओं की कमी, जर्जर इंफ्रास्ट्रक्चर और पुरानी व्यवस्था न केवल पुलिस कर्मियों के काम को बाधित कर रही है, बल्कि आम जनता के लिए भी ये स्टेशन आतंक का प्रतीक बने हुए हैं। 2025 के इंडिया जस्टिस रिपोर्ट के अनुसार, 83 प्रतिशत पुलिस स्टेशनों में कम से कम एक सीसीटीवी कैमरा जरूर लगा है, लेकिन ऐसे कई मामले हैं जिनमें सुप्रीम कोर्ट के मानकों का पालन असंगत है। 78 प्रतिशत स्टेशनों में महिला हेल्पडेस्क बनी हैं, फिर भी महिला पुलिसकर्मियों का राष्ट्रीय औसत मात्र 12 प्रतिशत है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्टेशनों की संख्या 2017-22 के बीच 7 प्रतिशत घट गई है, जबकि शहरी क्षेत्रों में 4 प्रतिशत बढ़ी।

जनवरी 2023 के केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, देश में 17,849 पुलिस स्टेशन हैं, जिनमें से 58 में वाहन नहीं, 680 में लैंडलाइन फोन नहीं और 282 में मोबाइल फोन तक नहीं हैं। कई स्टेशनों में बिजली, इंटरनेट और डिजिटल साक्षरता की भारी कमी है। बीपीआरडी (ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट) ने आधुनिक पुलिस स्टेशन भवनों के लिए मानक तय किए हैं, जिनमें आगंतुकों के लिए प्रतीक्षा कक्ष, शौचालय, जांच कक्ष और रिकॉर्ड रूम शामिल हैं, लेकिन ज्यादातर राज्यों में इनका पालन नाममात्र का है। असिस्टेंस टू स्टेट्स फॉर मॉडर्नाइजेशन ऑफ पुलिस (एएसयूएमपी) योजना के तहत केंद्र ने 2025-26 में 540 करोड़ रुपये आवंटित किए, लेकिन इसमें भी उपयोगिता कम पाई गई।

सवाल उठता है कि यह जर्जर इंफ्रास्ट्रक्चर पुलिस कार्य को किस तरह बाधित कर रहा है? स्टेशन हाउस ऑफिसर (एसएचओ) को 24 घंटे ड्यूटी पर रहना पड़ता है, लेकिन ज़्यादातर थानों में न तो आराम कक्ष ठीक हैं, न बैरक स्वच्छ। मैनुअल पेपरवर्क, पुराने रिकॉर्ड और भीड़भाड़ के कारण जांच में देरी होती है। जनता शिकायत दर्ज कराने आती है तो प्रतीक्षा कक्ष न होने से खुले में खड़ी रहती है। महिला आगंतुकों के लिए अलग शौचालय की कमी आम है। परिणामस्वरूप, पुलिस पर भरोसा घटता है और अपराधी लाभ उठाते हैं।

सबसे दर्दनाक स्थिति मालखाने (पुलिस रिकॉर्ड रूम) की है। यहां सबूत, हथियार, नशीले पदार्थ और संपत्ति रखी जाती है, लेकिन ज्यादातर स्टेशनों में यह कमरा गंदा, भीड़भाड़ वाला और असुरक्षित होता है। मैनुअल रजिस्टर, चूहों-कीड़ों का आतंक और अपर्याप्त जगह के कारण सबूत बिगड़ जाते हैं। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 2024 में चूहों द्वारा सबूत नष्ट होने पर डीजीपी को आदेश दिया था कि मालखाने की नियमित देखभाल हो।

दिल्ली के कई स्टेशनों में एक मालखाना अधिकारी के पास हजारों एग्जिबिट्स होते हैं, लेकिन स्टाफ की कमी से घंटों खोजबीन करनी पड़ती है। इससे सबूतों में छेड़छाड़, गुम होने या अदालत में अस्वीकार होने की घटनाएँ आम हैं। कुछ राज्यों में ई-मालखाना शुरू हुआ है, जहां बारकोड और डिजिटल ट्रैकिंग से पारदर्शिता आई, लेकिन यह पूरे देश में लागू नहीं हुआ।

इसी तरह, जब्त वाहनों की समस्या पर्यावरणीय आपदा बन चुकी है। देश भर के पुलिस स्टेशनों में हजारों जब्त कारें, बाइकें व अन्य छोटे बड़े वाहन सड़ रहे हैं। जो कि थानों से सटी सड़कों पर खड़े रहते हैं और यातायात बाधित करते हैं। ईंधन रिसाव, जंग, बरसाती पानी से मच्छर पनपते हैं, डेंगू-मलेरिया का खतरा बढ़ता है। आग लगने का जोखिम तो हमेशा बना ही रहता है। पंजाब सरकार ने हाल ही में आदेश दिया कि सभी जब्त वाहन शहर से बाहर स्क्रैप यार्ड में शिफ्ट किए जाएं, लेकिन अन्य राज्यों में ऐसा नहीं हुआ।

ऐसे में सुधार कैसे हो? सबसे पहले, बीपीआरडी के मॉडल पुलिस स्टेशन मानकों को सख्ती से लागू किया जाए। हर स्टेशन में डिजिटल रिकॉर्ड रूम (ई-मालखाना), सीसीटीवी नाइट विजन, पर्याप्त शौचालय, प्रतीक्षा कक्ष और महिला हेल्पडेस्क अनिवार्य हों। नियम उल्लंघन के बाद जब्त वाहनों के लिए अलग-अलग डिस्पोजल यार्ड और ऑनलाइन नीलामी की व्यवस्था हो, ताकि 30 दिनों में उन्हें हटाया जा सके। उसी तरह अपराध में शामिल वाहनों की विस्तृत फॉरेंसिक जांच के बाद, कोर्ट के आदेश पर उन्हें भी थानों से हटाया जाए। पुलिस कर्मियों के लिए बेहतर बैरक, कैंटीन और प्रशिक्षण सुविधाएं जरूरी हों। जनता के लिए थाने ‘यूजर फ्रेंडली’ बनाने के लिए शिकायत पोर्टल, हेल्पडेस्क और कम्युनिटी पोलिसिंग को बढ़ावा दें।

गौरतलब है कि पुलिस सुधार समितियों ने इन मुद्दों पर बार-बार आवाज उठाई। 1977-81 की नेशनल पुलिस कमीशन ने बुनियादी ढांचे, प्रशिक्षण और स्वायत्तता पर जोर दिया। रिबेरो, पद्मनाभैया और मलीमाथ समितियों ने भी यही सिफारिशें कीं। 2006 में प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सात ऐतिहासिक निर्देश दिए। राज्य सुरक्षा आयोग का गठन, डीजीपी की दो साल की न्यूनतम अवधि, एसपी और एसएचओ की स्थिरता, जांच और कानून-व्यवस्था का अलगाव, पुलिस स्थापना बोर्ड, शिकायत प्राधिकरण और राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग। लेकिन ज्यादातर राज्य इन्हें लागू करने में असफल रहे। थॉमस कमेटी (2008) ने राज्यों की उदासीनता पर दुख जताया। कारण स्पष्ट हैं, पुलिस राज्य विषय है, जहाँ राजनीतिक दखल, फंड का दुरुपयोग और सुधारों से सत्ता के लिए खतरा बना रहता है। मॉडल पुलिस एक्ट 2006 को भी सिर्फ कुछ राज्यों ने ही अपनाया है।

आज जरूरत है मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की। केंद्र सरकार एएसयूएमपी फंड का पूरा उपयोग सुनिश्चित करे, अनुपालन न करने वाले राज्यों पर करवाई करे और सुप्रीम कोर्ट इसकी नियमित समीक्षा करे। पुलिस स्टेशन अगर आधुनिक और जन-अनुकूल नहीं बने, तो ‘विकसित भारत’ का सपना अधूरा रहेगा। समय की माँग है कि हम पुलिस को सेवा प्रदाता मानें, न कि सिर्फ अपराध नियंत्रक। बुनियादी सुविधाओं से शुरू कर सुधार की दिशा में कदम उठाएं, ताकि पुलिसकर्मी और जनता दोनों को न्याय मिले।

By रजनीश कपूर

दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के प्रबंधकीय संपादक। नयाइंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर।

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