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बुरी दशा भारतीय मेधा की

एआई के इस दौर में, जहां मशीनें इंसानों की तरह सोचने लगी हैं, इंसानों को उनसे अधिक रचनात्मक और मौलिक बनना होगा। यदि हम राजनीति को संकीर्णता से ऊपर उठाकर राष्ट्र निर्माण की दिशा में ले जा सकें, राष्ट्रीय शिक्षा नीति को सही अर्थों में लागू कर सकें और युवाओं को भयमुक्त वातावरण दे सकें, तो भारत फिर से विश्वस्तरीय वैज्ञानिक, दार्शनिक और मौलिक विचारक पैदा कर सकता है।

मेधा किसी भी देश की वह भीतरी ताकत होती है, जो उसे सिर्फ जीवित नहीं रखती, बल्कि दुनिया को दिशा देने योग्य बनाती है। प्राचीन भारत में मेधा का मतलब सत्य और सृजनात्मक बुद्धि से था। इसी मेधा ने उपनिषदों के दर्शन से लेकर शून्य, आयुर्वेद और खगोल विज्ञान जैसे ज्ञान को जन्म दिया। लेकिन आज के भारत में भारतीय मेधा का कमजोर होना एक कड़वी और चिंताजनक सच्चाई बन गया है।

आज हमारी बौद्धिक क्षमता डिग्रियों, परीक्षा के अंकों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बड़े पैकेजों तक सीमित होकर रह गई है। जब किसी समाज में मौलिक सोच की जगह केवल नकल और रटंत ले लेती है, तब मेधा का पतन तय हो जाता है। यह संकट सिर्फ शिक्षा का नहीं है, बल्कि राजनीति, समाज, युवाओं के मन और नई तकनीकी क्रांतियों से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।

राजनीति किसी भी देश की दिशा और प्राथमिकताएं तय करती है। दुर्भाग्य से भारत की राजनीति ने मेधा को मजबूत करने के बजाय उसे अपने तात्कालिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया है। देश के बड़े विश्वविद्यालय और शोध संस्थान, जो कभी स्वतंत्र सोच और वैचारिक मंथन के केंद्र हुआ करते थे, आज राजनीतिक अखाड़े बनते जा रहे हैं। संस्थानों का राजनीतिकरण हो चुका है। कुलपतियों और प्रोफेसरों की नियुक्तियों में योग्यता से अधिक वैचारिक और राजनीतिक निष्ठा देखी जाने लगी है। इससे शिक्षा और शोध दोनों का स्तर गिरा है। राजनीतिक दल लंबे समय के वैज्ञानिक अनुसंधान या बुनियादी शिक्षा सुधार के बजाय ऐसी योजनाओं पर जोर देते हैं, जिनसे तुरंत वोट मिल सकें। यही वजह है कि भारत आज भी शोध और विकास पर अपनी जीडीपी का बहुत छोटा हिस्सा खर्च करता है।

आज का राजनीतिक माहौल समाज को पक्ष और विपक्ष में इस तरह बांट चुका है कि निष्पक्ष और रचनात्मक आलोचना की जगह कम होती जा रही है। जब युवा मन स्वतंत्र रूप से सोचने और सवाल पूछने से डरने लगे, तो वह खुद को सुरक्षित सीमाओं में बंद कर लेता है। डर के माहौल में मौलिक मेधा कभी विकसित नहीं हो सकती। जब योग्यता और प्रतिभा की जगह जाति, धर्म या क्षेत्रीय समीकरणों के आधार पर अवसर बांटे जाते हैं, तो असली प्रतिभा हतोत्साहित होती है। इससे योग्य युवाओं में व्यवस्था के प्रति असंतोष और दूरी बढ़ती है।

आज का भारतीय युवा एक गहरे मानसिक और अस्तित्वगत संकट से गुजर रहा है। बचपन से ही उसे सफलता की अंधी दौड़ में धकेल दिया जाता है। कोटा जैसे कोचिंग केंद्र इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। वहां मेधा को ज्ञान हासिल करने की क्षमता नहीं, बल्कि परीक्षा पास करने वाली मशीन मान लिया गया है। लगातार दबाव के कारण युवा अवसाद, अकेलेपन और आत्महत्या जैसे खतरनाक रास्तों की ओर बढ़ रहे हैं। जो दिमाग हर समय तनाव में हो, वह नई और मौलिक सोच कैसे पैदा करेगा?

असुरक्षा, आर्थिक अनिश्चितता और बेरोजगारी के डर ने युवाओं से जोखिम लेने की क्षमता छीन ली है। आज का युवा विज्ञान, दर्शन या कला में नया रास्ता खोजने के बजाय सुरक्षित सरकारी नौकरी या कॉरपोरेट सेक्टर के ऊंचे पैकेज को ही अंतिम लक्ष्य मानने लगा है। जबकि मौलिकता हमेशा जोखिम मांगती है। दूसरी ओर, सोशल मीडिया, रील और इंटरनेट के दौर में युवाओं की एकाग्रता तेजी से घट रही है। गंभीर अध्ययन के बजाय वे तुरंत मिलने वाली सतही जानकारी पर निर्भर हो रहे हैं। सूचनाओं की इस बाढ़ ने सोचने की क्षमता को कमजोर किया है और कॉपी-पेस्ट संस्कृति को बढ़ावा दिया है।

आज जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, चैट जीपीटी और दूसरे जनरेटिव एआई टूल तेजी से फैल रहे हैं, तब भारतीय युवाओं के सामने एक नया और अधिक खतरनाक बौद्धिक संकट खड़ा हो गया है। भारत की आईटी क्रांति मुख्य रूप से कोडिंग, टेस्टिंग और बैक-ऑफिस जैसे तकनीकी कामों के आउटसोर्सिंग पर आधारित थी। यह काम अधिकतर यांत्रिक थे। अब एआई इन्हें कुछ सेकंड में कर रहा है। इससे बड़े पैमाने पर रोजगार संकट और छंटनी का खतरा बढ़ रहा है।

जब युवा अपने असाइनमेंट, प्रोजेक्ट, कोडिंग और यहां तक कि साधारण ईमेल लिखने के लिए भी एआई पर निर्भर हो जाते हैं, तो उनका मस्तिष्क धीरे-धीरे निष्क्रिय होने लगता है। एआई पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता युवाओं की समस्या सुलझाने की क्षमता को कमजोर कर रही है। मौलिक सोच का महत्व घटता जा रहा है। जब तैयार सामग्री आसानी से उपलब्ध हो, तो मेहनत से गहरा अध्ययन करने की आदत कम हो जाती है। परिणाम यह है कि समाज में गंभीर विचारकों की जगह केवल सामग्री प्रबंधकों की भीड़ बढ़ रही है।

भारतीय मेधा के इस पतन को रोकने के लिए सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 लागू की। सिद्धांत के स्तर पर यह काफी प्रगतिशील नीति है, लेकिन जमीन पर इसे लागू करने में बड़ी चुनौतियां हैं। इस नीति में रटने वाली शिक्षा खत्म कर तार्किक सोच, मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा और बहुविषयक पढ़ाई पर जोर दिया गया है। यह युवाओं को कला और विज्ञान को साथ पढ़ने की स्वतंत्रता भी देती है। लेकिन नीति कागज पर जितनी अच्छी दिखती है, उसका क्रियान्वयन उतना ही धीमा है।

सरकारी स्कूलों और विश्वविद्यालयों में आज भी आधुनिक सुविधाओं और प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी है। जब तक ढांचागत सुधार नहीं होंगे, तब तक यह नीति एक दस्तावेज बनकर रह जाएगी। उच्च शिक्षा और तकनीकी पुस्तकों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी अभी शुरुआती स्तर पर है। इसी कारण ग्रामीण क्षेत्रों की प्रतिभाएं मुख्यधारा से जुड़ नहीं पा रही हैं।

इस बड़े संकट से निकलने के लिए हमें तुरंत और लंबे समय के स्तर पर गंभीर बदलाव करने होंगे। अकादमिक संस्थानों को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करना होगा। विश्वविद्यालयों को राजनीति की प्रयोगशाला बनाने के बजाय स्वतंत्र सोच और शोध के केंद्र के रूप में विकसित करना होगा। शिक्षा व्यवस्था में अंकों की अंधी दौड़ कम कर व्यावहारिक कौशल और मानसिक स्वास्थ्य को पाठ्यक्रम का जरूरी हिस्सा बनाना होगा। युवाओं को यह समझाना होगा कि असफलता जीवन का अंत नहीं है।

साथ ही युवाओं को यह भी समझना होगा कि एआई उनका दुश्मन नहीं, बल्कि एक उपकरण है। शिक्षा व्यवस्था को अब उन क्षमताओं पर ध्यान देना चाहिए, जिन्हें एआई कभी पूरी तरह नहीं बदल सकता, जैसे मौलिक रचनात्मकता, संवेदनशीलता और गहरा दार्शनिक विश्लेषण। सरकार और निजी क्षेत्र को मिलकर ऐसा माहौल बनाना होगा, जहां युवा शोध और स्टार्टअप की ओर बढ़ सकें। असफलता के डर को कम करने के लिए आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा भी देनी होगी।

भारतीय मेधा का ह्रास कोई प्राकृतिक समस्या नहीं है। यह हमारी बनाई हुई व्यवस्थागत विफलता का परिणाम है। समस्या न तो युवाओं की क्षमता में है और न ही इस देश की मिट्टी में। समस्या उस राजनीतिक, सामाजिक और तकनीकी माहौल में है, जो मेधा को विकसित होने से रोक रहा है। एआई के इस दौर में, जहां मशीनें इंसानों की तरह सोचने लगी हैं, इंसानों को उनसे अधिक रचनात्मक और मौलिक बनना होगा। यदि हम राजनीति को संकीर्णता से ऊपर उठाकर राष्ट्र निर्माण की दिशा में ले जा सकें, राष्ट्रीय शिक्षा नीति को सही अर्थों में लागू कर सकें और युवाओं को भयमुक्त वातावरण दे सकें, तो भारत फिर से विश्वस्तरीय वैज्ञानिक, दार्शनिक और मौलिक विचारक पैदा कर सकता है। भारतीय मेधा का पुनर्जागरण ही एक समर्थ भारत की असली नींव बनेगा।

By अशोक 'प्रवृद्ध'

सनातन धर्मं और वैद-पुराण ग्रंथों के गंभीर अध्ययनकर्ता और लेखक। धर्मं-कर्म, तीज-त्यौहार, लोकपरंपराओं पर लिखने की धुन में नया इंडिया में लगातार बहुत लेखन।

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