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सनातन धर्म में गिरावत, विकृति की वजह

मनुस्मृति 1/91 से यह विचार भी सामने आता है कि जन्म के आधार पर किसी व्यक्ति को ऊंचा या नीचा नहीं माना जाना चाहिए। शिक्षा के अवसर सभी को मिलने चाहिए। लेकिन महाभारत के युद्ध के बाद समाज को व्यवस्थित करने वाली वर्ण व्यवस्था में बदलाव आने लगा। जो वर्ण व्यवस्था पहले योग्यता और कर्म के आधार पर निर्धारित होती थी, वह धीरे-धीरे जन्म आधारित व्यवस्था में बदलने लगी। वर्ण भी पैतृक संपत्ति की तरह पिता से पुत्र को मिलने लगा। इसी परिवर्तन ने समाज में ऊंच-नीच की भावना को बढ़ावा दिया।

द्वापर युग में महाभारत के युद्ध से पहले ही ब्राह्मणत्व का ह्रास शुरू हो गया था। ब्राह्मण अपने मूल कर्तव्यों से दूर होने लगे थे। वे गुरुकुलों को छोड़कर राजकुमारों को पढ़ाने के लिए राजमहलों और उनके घरों तक जाने लगे थे। दूसरी ओर राजाओं और राजकुमारों में उच्छृंखलता बढ़ रही थी। वे धर्म, राज्य और शासन की अपने ढंग से व्याख्या करने लगे थे। जरासंध जैसे राजा चक्रवर्ती सम्राट बनने की महत्वाकांक्षा में निर्दोष राजाओं और उनके राजवंशों को समाप्त करने के प्रयास में लगे हुए थे।

महाभारत के युद्ध के बाद केंद्रीय सत्ता के अभाव में इन प्रवृत्तियों को और बढ़ने का अवसर मिला। राजनीतिक अस्थिरता ने वैदिक धर्म के ह्रास और उसमें विकृतियां पैदा होने की परिस्थितियां बनाईं। महाभारत के युद्ध में केवल बड़ी संख्या में मनुष्यों का ही संहार नहीं हुआ, बल्कि अनेक विद्वानों और मनीषियों की मृत्यु के साथ ज्ञान-विज्ञान, कला और कौशल की परंपराओं को भी भारी क्षति पहुंची।

आपसी फूट के कारण कौरवों, पांडवों और यादवों का विनाश हुआ। लेकिन आपसी फूट का वही रोग आज भी भारतीय समाज में बना हुआ है। पता नहीं इस भयंकर रोग से कब मुक्ति मिलेगी या यह भारतीयों को सुख-शांति से वंचित कर दुख के सागर में डुबोता रहेगा। आज भी हिंदू समाज का एक बड़ा हिस्सा आपसी फूट और संघर्ष के उसी रास्ते पर चलता दिखाई देता है, जिस पर दुर्योधन चला था। लोग अपने ही समाज और देश को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

भारतीय प्राचीन शास्त्रों के अध्येताओं के अनुसार स्वायंभुव मनु से लेकर पांडवों तक आर्यों का चक्रवर्ती राज्य रहा। इसके बाद आपसी विरोध और संघर्ष के कारण उनका पतन शुरू हुआ। दूसरे शब्दों में कहें तो इस देश को जितना नुकसान गृहकलह ने पहुंचाया, उतना शायद किसी एक अन्य कारण ने नहीं पहुंचाया।

इसका परिणाम यह हुआ कि देश का पूरा वातावरण सनातन वैदिक जीवन मूल्यों के ह्रास और उनमें विकृतियां पैदा होने का कारण बनने लगा। राजनीतिक पराजय ने केवल क्षत्रियों के पराक्रम और शक्ति को ही कमजोर नहीं किया, बल्कि भारतीय चिंतन, आत्मगौरव, अस्मिता और आत्मसम्मान की भावना को भी गहरी चोट पहुंचाई।

चारों ओर से आक्रमणों और संकटों से घिरे भारतीय इतने भयभीत और असुरक्षित महसूस करने लगे कि उन्होंने अपने धर्म और समाज की रक्षा के लिए अपने चारों ओर एक सुरक्षा कवच बनाने का प्रयास किया। उद्देश्य था कि सनातन वैदिक धर्म सुरक्षित बना रहे। यह उपाय कुछ हद तक कारगर भी हुआ, लेकिन इसका एक दूसरा परिणाम निकला। भारतीय समाज धीरे-धीरे अपने धर्म के मूल स्रोत वेदों से ही दूर होता चला गया। वेदों का नाम तो लोगों को मालूम था, लेकिन उनके ज्ञान और शिक्षाओं से उनका संबंध कमजोर पड़ता गया।

स्थिति यहां तक पहुंची कि जो ब्राह्मण वर्ग कभी वेदों को अपना सर्वस्व मानता था, वह भी वेदों और उनके वास्तविक अर्थों से अपरिचित होने लगा। दुख की बात है कि आज भी वेदों के वास्तविक ज्ञाता विद्वानों की कमी बनी हुई है। यही देश की अवनति और पतन का एक प्रमुख कारण है।

वैदिक मान्यता के अनुसार ब्राह्मण वह है जो वेदों का ज्ञाता हो, स्वार्थ से मुक्त हो, परमात्मा के तत्व को समझता हो, विशाल हृदय वाला हो और सबके कल्याण की कामना करता हो। जो भेदभाव से ऊपर उठकर समाज का मार्गदर्शन करे, वही ब्राह्मण कहलाने का अधिकारी है।

लेकिन दुर्भाग्य से विद्या और ज्ञान के आधार पर ब्राह्मण कहलाने की परंपरा धीरे-धीरे जन्म के आधार पर ब्राह्मण होने की व्यवस्था में बदल गई। कुछ लोगों ने केवल जन्म के आधार पर स्वयं को ब्राह्मण घोषित करना शुरू कर दिया। यह धारणा भी प्रचारित की गई कि ब्राह्मण के मुख से निकला वचन स्वयं भगवान का वचन है और जो ब्राह्मण से विरोध करता है, उसका नाश हो जाता है। ‘ब्रह्मवाक्यं जनार्दनः’ और ‘ब्रह्मद्रोही विनश्यति’ जैसे कथन इसी धारणा के प्रतीक हैं। इन कथनों का अपना धार्मिक संदर्भ हो सकता है, लेकिन जब इन्हें उनके मूल संदर्भ से अलग करके स्वार्थ के लिए इस्तेमाल किया गया तो इनसे समाज में अनेक बुराइयां पैदा हुईं।

इस प्रकार वैदिक ज्ञान से दूर हो चुके स्वार्थी और अशिक्षित तथाकथित ब्राह्मणों ने भारतीय समाज की सोचने-समझने की शक्ति को कमजोर किया। उन्होंने ज्ञान पर अपना अधिकार बनाए रखने का प्रयास किया और दूसरे वर्गों को शिक्षा से वंचित रखा।

इसके पीछे उनका स्वार्थ था। अशिक्षित व्यक्ति को भ्रमित करना आसान होता है। उसे अपने हित में इस्तेमाल करना भी सरल होता है। इसलिए दूसरे वर्गों को शिक्षित होने से रोकने की प्रवृत्ति बढ़ी। इसका सबसे अधिक प्रभाव क्षत्रियों पर पड़ा, क्योंकि उस समय राजसत्ता उन्हीं के हाथों में थी। धर्म और ज्ञान के क्षेत्र में मर्यादाओं का इससे बड़ा उल्लंघन क्या हो सकता था?

जिस समाज को कभी गुण, कर्म और योग्यता के आधार पर ब्राह्मणत्व प्राप्त करने वाले विद्वानों ने उन्नति के शिखर तक पहुंचाया था, उसी समाज को जन्म के आधार पर ब्राह्मण होने का दावा करने वालों ने संकट में डाल दिया।

दोनों में बुनियादी अंतर था। पहले ब्राह्मणत्व का आधार गुण, कर्म, ज्ञान और योग्यता थी। बाद में जन्म को ही उसका आधार बना दिया गया। पहले साधना और अध्ययन जरूरी थे, बाद में बिना साधना के भी जन्म के आधार पर श्रेष्ठता का दावा होने लगा।

किसी समाज को आगे बढ़ाने का मूल आधार साधना, परिश्रम और योग्यता है। लेकिन आज समाज को इस रास्ते पर आगे बढ़ने की प्रेरणा और मार्गदर्शन देने वालों की कमी दिखाई देती है।

वैदिक काल में धर्म का एक प्रमुख आधार यज्ञ था। शतपथ ब्राह्मण 1/5/1/7 में कहा गया है, ‘यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म।’ अर्थात यज्ञ श्रेष्ठतम कर्म है। यज्ञ का उद्देश्य एक ओर पर्यावरण की शुद्धि माना गया था तो दूसरी ओर वह व्यक्ति की आध्यात्मिक साधना का माध्यम भी था। लेकिन समय के साथ यज्ञ की परंपरा में भी विकृतियां पैदा होने लगीं।

वाममार्गियों ने यज्ञ में पशुबलि की प्रथा शुरू की। जबकि निरुक्त 2/11 के अनुसार यज्ञ को ‘अध्वर’ अर्थात अहिंसक कहा गया है। स्वार्थ और मांसाहार की इच्छा से प्रेरित लोगों ने वेद मंत्रों की अपने अनुकूल व्याख्या की। उन्होंने पशुबलि ही नहीं, बल्कि गौबलि और नरबलि जैसी प्रथाओं को भी धार्मिक कर्मकांड का हिस्सा बना दिया।

वैदिक ग्रंथों में गाय को ‘अघ्न्या’ कहा गया है। अर्थात जिसे मारा नहीं जाना चाहिए। ऋग्वेद 10/87/16 का उल्लेख करते हुए लेखक पशुबलि, गौबलि और नरबलि के निषेध की बात करता है।

यः पौरुषेयेण क्रविषा समङ्क्ते यो अश्वेन पशुना यातुधानः।

यो अघ्न्याया भरति क्षीरमग्ने तेषां शीर्षाणि हरसापि वृश्च।

समाज में शिक्षा और वैदिक ज्ञान की कमी के कारण लोगों को भ्रमित करना आसान हो गया था। इसका लाभ उन पुरोहितों ने उठाया जो अपनी इच्छाओं और स्वार्थ के अनुसार धार्मिक कर्मकांडों की व्याख्या करने लगे थे।

इस तरह यज्ञ जैसी धार्मिक और आध्यात्मिक परंपरा पशुबलि जैसी प्रथाओं से विकृत होने लगी। पशुहिंसा को यज्ञ का आवश्यक हिस्सा बताने वाले लोग आज तक यह सिद्ध नहीं कर पाए कि किसी जीव की बलि देकर उसे स्वर्ग पहुंचाया जा सकता है। वे न तो अपने प्रियजनों को मारकर स्वर्ग भेज सके और न ही यज्ञ की वेदी पर किसी मृत व्यक्ति को फिर जीवित कर सके।

इससे लेखक यह निष्कर्ष निकालता है कि पशुबलि का औचित्य सिद्ध करने वाले विधान स्वार्थी पुरोहितों ने अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए बनाए थे।

महर्षि दयानंद सरस्वती ने भी यज्ञ में पशुबलि और पशुहत्या का पूरी तरह निषेध किया था। उनके अनुसार अश्वमेध, गोमेध और नरमेध का अर्थ घोड़े, गाय या मनुष्य की बलि देना नहीं है। उनकी व्याख्या में राष्ट्र की उन्नति और अभिवृद्धि के लिए किए जाने वाले कार्य अश्वमेध हैं। अन्न की अभिवृद्धि से जुड़े कार्य गोमेध हैं और मनुष्य का अंतिम संस्कार नरमेध है। लेकिन वैदिक ज्ञान से दूर होते जाने के कारण समय के साथ यज्ञ की मूल भावना विकृत होती गई।

महर्षि दयानंद की तरह गौतम बुद्ध ने भी सामाजिक और धार्मिक कुरीतियों का विरोध किया। उन्होंने यज्ञ में पशुबलि और हिंसा की प्रथाओं को स्वीकार नहीं किया। जब पशुबलि को वेदों के अनुकूल बताया गया तो गौतम बुद्ध वेदों की प्रामाणिकता स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुए।

वैदिक धर्म की एक प्रमुख विशेषता एकेश्वरवाद रही है। वेदों में एक परमेश्वर की महिमा का वर्णन मिलता है। ऋग्वेद 1/164/46 के अनुसार इंद्र, मित्र, वरुण आदि उसी एक प्रकाशस्वरूप परमात्मा के नाम हैं। इसी मंत्र में कहा गया है कि सत्य एक है, लेकिन विद्वान उसे अनेक नामों से पुकारते हैं।

‘एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।’

ऋग्वेद 10/114/5 में भी इसी विचार को व्यक्त किया गया है।

‘एकं सन्तं बहुधा कल्पयन्ति।’

अर्थात एक ही तत्व की अनेक रूपों में कल्पना की जाती है। कठोपनिषद में भी एक परमात्मा के अनेक रूपों में प्रकट होने का विचार मिलता है।

‘एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति।’

आचार्य यास्क ने भी इस विचार का समर्थन किया। उनके अनुसार एक ही देवता अपने ऐश्वर्य और गुणों के कारण अनेक रूपों में स्तुति का विषय बनता है।

‘महाभाग्याद् देवताया एक आत्मा बहुधा स्तूयते।’ निरुक्त 7/4

इसी प्रकार शतपथ ब्राह्मण 14/7/2/22 में कहा गया है।

मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति।

मनसैवानुद्रष्टव्यमेतदप्रमेयं ध्रुवम्।

इसका आशय है कि जो परम सत्य को अनेक अलग-अलग रूपों में देखता है, वह जन्म-मृत्यु के चक्र में पड़ा रहता है। परम तत्व को मन और आत्मज्ञान से समझना चाहिए, क्योंकि वह अत्यंत सूक्ष्म और स्थायी है।

इस प्रकार वैदिक ग्रंथों में ईश्वर की अवधारणा स्पष्ट रूप से प्रस्तुत की गई है। लेकिन समय के साथ यह धारणा मजबूत होती गई कि देवता एक नहीं, बल्कि अनेक हैं। इस विचार को बढ़ावा देने में वेदों की कर्मकांड आधारित व्याख्याओं की भी भूमिका रही। अलग-अलग देवताओं की स्तुति और उनके अलग नामों के कारण यह धारणा बनने लगी कि सभी देवता स्वतंत्र और अलग-अलग अस्तित्व रखते हैं।

आचार्य यास्क जैसे विद्वानों ने भी कुछ सीमा तक देवताओं के अलग-अलग स्वरूपों की व्याख्या स्वीकार की थी। लेकिन धीरे-धीरे विभिन्न देवताओं के स्वतंत्र व्यक्तित्व, चरित्र और धार्मिक परंपराएं विकसित होने लगीं। इससे वैदिक धर्म की एकेश्वरवाद की मूल भावना कमजोर हुई। इसका प्रभाव हिंदू समाज की एकता पर भी पड़ा।

जो समाज पहले एक परमात्मा की अवधारणा से जुड़ा हुआ था, उसमें अलग-अलग देवताओं और आस्थाओं के आधार पर समुदाय बनने लगे। विभिन्न समूहों के अपने-अपने आराध्य और धार्मिक केंद्र हो गए। परिणामस्वरूप समाज अनेक संप्रदायों में बंटता चला गया।

वैदिक ग्रंथों के अनुसार प्राचीन समाज में व्यक्ति का वर्ण उसके गुण और कर्म के आधार पर निर्धारित होता था। ‘वर्ण’ शब्द की उत्पत्ति ‘वृ’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ वरण करना या चुनना है। इसका आशय यह है कि वर्ण जन्म से अपने आप प्राप्त नहीं होता था, बल्कि व्यक्ति को अपनी योग्यता और कर्म के आधार पर उसे प्राप्त करना पड़ता था।

वर्ण कोई पैतृक संपत्ति नहीं थी जो पिता से पुत्र को विरासत में मिल जाए। उसे विद्या की तरह अध्ययन, परिश्रम और साधना से प्राप्त करना होता था। जैसे किसी योग्य और विद्वान पिता का पुत्र केवल जन्म लेने से पिता की विद्या और योग्यता प्राप्त नहीं कर सकता, उसे स्वयं अध्ययन और परिश्रम करना पड़ता है। उसी प्रकार वर्ण की योग्यता भी व्यक्ति को स्वयं अर्जित करनी होती थी।

यह एक न्यायसंगत व्यवस्था थी, क्योंकि इसमें जन्म के बजाय व्यक्ति की योग्यता और कर्म को महत्व दिया गया था।

मनुस्मृति में वर्णों के लिए बताए गए कर्म भी इसी विचार की पुष्टि करते हैं। मनुस्मृति के पहले अध्याय में चारों वर्णों के कार्यों का वर्णन मिलता है। मनुस्मृति 1/88 के अनुसार ब्राह्मण का प्रमुख कार्य अध्ययन और अध्यापन करना, यज्ञ करना और कराना तथा पूरे समाज को अच्छे मार्ग पर चलने की प्रेरणा देना था। समाज के कल्याण की चिंता करना भी उसका कर्तव्य था।

मनुस्मृति 1/89 के अनुसार क्षत्रिय का कार्य अध्ययन करने के साथ देश की बाहरी और आंतरिक शत्रुओं से रक्षा करना तथा राज्य में शांति और व्यवस्था बनाए रखना था।

मनुस्मृति 1/90 के अनुसार वैश्य का कार्य अध्ययन के अलावा पशुपालन, कृषि, व्यापार, उद्योग और दूसरे आर्थिक कार्यों के माध्यम से संपत्ति अर्जित करना था।

शूद्र का कार्य अन्य तीन वर्णों की सेवा, सहायता और श्रम से जुड़े काम करना माना गया था।

मनुस्मृति 1/91 से यह विचार भी सामने आता है कि जन्म के आधार पर किसी व्यक्ति को ऊंचा या नीचा नहीं माना जाना चाहिए। शिक्षा के अवसर सभी को मिलने चाहिए। वेदों का ज्ञान और विद्या पूरे समाज के लिए उपलब्ध होने चाहिए। लेकिन महाभारत के युद्ध के बाद समाज को व्यवस्थित करने वाली वर्ण व्यवस्था में बदलाव आने लगा।

जो वर्ण व्यवस्था पहले योग्यता और कर्म के आधार पर निर्धारित होती थी, वह धीरे-धीरे जन्म आधारित व्यवस्था में बदलने लगी। अब व्यक्ति का वर्ण उसके गुण, कर्म और विद्या से तय होने के बजाय परिवार और जन्म से निर्धारित होने लगा। वर्ण भी पैतृक संपत्ति की तरह पिता से पुत्र को मिलने लगा।

इस परिवर्तन ने समाज में ऊंच-नीच की भावना को बढ़ावा दिया। जन्म के आधार पर श्रेष्ठता और हीनता की धारणाएं मजबूत होने लगीं। गौतम धर्मसूत्र जैसे ग्रंथों के अध्ययन से पता चलता है कि बाद के समय में शूद्रों को समाज में निम्न स्थान दिया जाने लगा था।

गौतम धर्मसूत्र 1/1 के अनुसार उन्हें वेद पढ़ने और यज्ञ करने के अधिकार से वंचित रखा गया। कई स्मृति और सूत्र ग्रंथों में शूद्रों के उपनयन संस्कार का विधान भी नहीं मिलता।

उस समय उपनयन संस्कार शिक्षा प्राप्त करने की एक महत्वपूर्ण शर्त माना जाता था। इसलिए उपनयन के अधिकार से वंचित होने का अर्थ शिक्षा के अवसरों से भी वंचित होना था। वर्णों के आधार पर दंड व्यवस्था में भी भेदभाव होने लगा। एक जैसा अपराध करने पर अलग-अलग वर्णों के लोगों को अलग-अलग दंड दिए जाते थे।

इस प्रकार समय के साथ न समाज में सभी वर्णों की स्थिति समान रही और न ही उनके लिए कानून और दंड की व्यवस्था समान रही। जो वर्ण व्यवस्था मूल रूप से समाज के संगठन, विभिन्न कार्यों के संचालन और सभी के विकास के उद्देश्य से बनाई गई थी, वह धीरे-धीरे ऊंच-नीच और जन्म आधारित भेदभाव की व्यवस्था में बदल गई। यही सनातन वैदिक धर्म में ह्रास और विकृति का एक बड़ा कारण बना।

By अशोक 'प्रवृद्ध'

सनातन धर्मं और वैद-पुराण ग्रंथों के गंभीर अध्ययनकर्ता और लेखक। धर्मं-कर्म, तीज-त्यौहार, लोकपरंपराओं पर लिखने की धुन में नया इंडिया में लगातार बहुत लेखन।

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