दिल्ली में कोचिंग सेंटर बेसमेंट डूबने की घटना की तरह, यहां भी सख्त कार्रवाई से भविष्य की त्रासदियां रोकी जा सकती हैं। अदालतों का हस्तक्षेप जवाबदेही सुनिश्चित करेगा और आम आदमी का विश्वास बहाल करेगा।…प्रारंभिक निष्कर्ष बताते हैं कि रोड सेफ्टी, ड्रेनेज, डिजास्टर रिस्पॉन्स और कमांड कंट्रोल में विफलताएं थीं। एसआईटी की रिपोर्ट संभवत: प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश करेगी, जिसमें सस्पेंशन और कानूनी कार्यवाही शामिल होगी।
नोएडा, जो उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख औद्योगिक और आईटी हब है, हाल ही में एक दुखद घटना से सुर्खियों में आया। 17 जनवरी 2026 को, 27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत हो गई। मौत का कारण उनकी कार का एक निर्माण स्थल पर पानी से भरे गड्ढे में गिर जाना। यह घटना युवराज के परिवार के लिए न केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी है, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और आपदा प्रबंधन की विफलता का जीता-जागता उदाहरण भी है। नोएडा के जिला प्रशासन और विभिन्न आपदा लड़ने वाली एजेंसियां इस मौत के लिए उतनी ही जिम्मेदार हैं, जितना कि बिल्डर। मामला अब एक विशेष जांच टीम (एसआईटी) के बीच जूझ रहा है। सवाल है कि ऐसे मामलों में अदालतों को क्या करना चाहिए जिससे कि एक मिसाल कायम हो।
युवराज मेहता गुड़गांव से लौट रहे थे, जब बारिश और कोहरे के कारण सेक्टर 150, में एक निर्माण स्थल पर उनकी कार 20 फीट गहरे पानी भरे गड्ढे में गिर गई। यह गड्ढा एक व्यावसायिक परियोजना के बेसमेंट के लिए खोदा गया था, लेकिन बारिश के पानी से भर गया था। कोई बैरिकेडिंग नहीं थी, रोशनी अपर्याप्त थी जिस कारण उनकी कार सीधा पानी में जा गिरी। युवराज के पिता के अनुसार उनका बेटा दो घंटे तक संघर्ष करता रहा, लेकिन बचाव टीम की लापरवाही के कारण उसे बचाया नहीं जा सका। यह घटना कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि सिस्टेमेटिक फेलियर का नतीजा है।
अब सवाल यह है कि जिला प्रशासन की भूमिका क्या है? नोएडा अथॉरिटी, जो शहर की योजना और विकास के लिए जिम्मेदार है, ने निर्माण स्थल की निगरानी में घोर लापरवाही बरती। खाली जमीनों पर निर्माण कार्य की अनुमति देते समय, अथॉरिटी को सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित करना चाहिए। लेकिन यहां, गड्ढा खोदने के बाद कोई सुरक्षा उपाय नहीं किए गए। बारिश के मौसम में पानी भरने की संभावना स्पष्ट थी, फिर भी कोई निरीक्षण नहीं हुआ। क्या अथॉरिटी के अधिकारियों को पहले से शिकायतें नहीं मिली थीं? स्थानीय निवासियों ने कई बार जलभराव और असुरक्षित साइटों की शिकायत की, लेकिन उन्हें नजरअंदाज किया गया। क्या यही लापरवाही सीधे तौर पर मौत का कारण बनी?
इसके अलावा, आपदा लड़ने वाली एजेंसियां जैसे फायर ब्रिगेड, पुलिस और एनडीआरएफ की प्रतिक्रिया अप्रभावी थी। घटना के बाद दो घंटे तक युवराज संघर्ष करते रहे, लेकिन बचाव अभियान में देरी हुई। कोई उचित उपकरण नहीं थे और समन्वय की कमी थी। क्या ये एजेंसियां आपदा प्रबंधन के लिए तैयार नहीं थीं? नोएडा जैसे शहर में, जहां भारी बारिश आम है, ड्रेनेज सिस्टम और आपातकालीन प्रतिक्रिया को मजबूत होना चाहिए। लेकिन यहां, रोड सेफ्टी, ड्रेनेज और डिजास्टर रिस्पॉन्स सभी विफल हो गए। एसआईटी की प्रारंभिक जांच में यह स्पष्ट हुआ है कि यह कोई फ्रीक एक्सीडेंट नहीं, बल्कि मल्टीपल सिस्टम फेलियर था। जिला प्रशासन ने इन एजेंसियों की निगरानी नहीं की, जिससे वे लापरवाह बनी रहीं।
प्लानर्स के डायरेक्टर्स अभय कुमार, रवि बंसल और सचिन कर्णवाल को गिरफ्तार किया है। उन पर आईपीसी की धारा 105 (गैर-इरादतन हत्या), 106 (लापरवाही से मौत) और 125 (जीवन खतरे में डालना) के तहत आरोप लगे हैं। एक अलग एफआईआर में पर्यावरण उल्लंघन के लिए भी मामला दर्ज हुआ है। निश्चित रूप से, बिल्डर ने साइट को फेंस नहीं किया, जो उनकी जिम्मेदारी थी। लेकिन क्या प्रशासन निर्दोष है? नोएडा अथॉरिटी के अधिकारियों ने निर्माण अनुमति दी, लेकिन नियमित निरीक्षण नहीं किया। खाली जमीन की स्थिति को जानते हुए भी, उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की। क्या ये अधिकारी भी लापरवाही के दोषी नहीं? केवल बिल्डर को निशाना बनाना एक आसान तरीका है, लेकिन असली समस्या प्रशासनिक विफलता है। अगर अधिकारी जिम्मेदार नहीं ठहराए गए, तो ऐसी घटनाएं दोहराई जाएंगी।
जानकारों की मानें तो, खाली जमीन की स्थिति को नजरअंदाज करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी स्पष्ट है। नोएडा में कई निर्माण साइटें हैं, जहां गड्ढे खुले छोड़ दिए जाते हैं। अथॉरिटी को इनकी मॉनिटरिंग करनी चाहिए, लेकिन भ्रष्टाचार और लापरवाही के कारण ऐसा नहीं होता। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने भी पर्यावरणीय उल्लंघनों पर ध्यान दिया है। क्या अथॉरिटी के सीईओ को हटाना पर्याप्त है? नहीं, व्यक्तिगत जवाबदेही तय होनी चाहिए। अधिकारियों पर भी एफआईआर दर्ज होनी चाहिए, क्योंकि उन्होंने सुरक्षा मानकों को लागू नहीं किया। यह मौत केवल बिल्डर की गलती नहीं, बल्कि प्रशासन की मिलीभगत का नतीजा है।
कोर्ट चाहें तो इस मामले में कोर्ट के पास एक मिसाल कायम करने का अवसर है। सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट को स्वत: संज्ञान लेना चाहिए और एक व्यापक जांच आदेशित करनी चाहिए। दोषी अधिकारियों पर आईपीसी की समान धाराओं के तहत मुकदमा चलाया जाए। जुर्माना और जेल की सजा के अलावा, सस्पेंशन और डिमोशन जैसे प्रशासनिक दंड भी लगाए जाएं। अदालतें निर्देश दें कि सभी निर्माण साइटों पर अनिवार्य बैरिकेडिंग, लाइटिंग और ड्रेनेज हो। साथ ही, आपदा प्रबंधन के लिए एक स्वतंत्र ऑडिट सिस्टम स्थापित किया जाए। दिल्ली में कोचिंग सेंटर बेसमेंट डूबने की घटना की तरह, यहां भी सख्त कार्रवाई से भविष्य की त्रासदियां रोकी जा सकती हैं। अदालतों का हस्तक्षेप जवाबदेही सुनिश्चित करेगा और आम आदमी का विश्वास बहाल करेगा।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आदेश पर गठित एसआईटी, जिसमें मेरठ डिविजनल कमिश्नर, एडीजी मेरठ जोन और पीडब्ल्यूडी चीफ इंजीनियर शामिल हैं, ने नोएडा अथॉरिटी अधिकारियों से पूछताछ की है। प्रारंभिक निष्कर्ष बताते हैं कि रोड सेफ्टी, ड्रेनेज, डिजास्टर रिस्पॉन्स और कमांड कंट्रोल में विफलताएं थीं। एसआईटी की रिपोर्ट संभवत: प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश करेगी, जिसमें सस्पेंशन और कानूनी कार्यवाही शामिल होगी। यह रिपोर्ट पर्यावरणीय उल्लंघनों पर भी फोकस करेगी, जिससे नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की कार्रवाई तेज होगी। यदि एसआईटी निष्पक्ष रही, तो यह केवल बिल्डरों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि सिस्टेमिक सुधारों का मार्ग प्रशस्त करेगी। लेकिन अगर राजनीतिक दबाव पड़ा, तो यह एक और सफेद हाथी साबित हो सकती है।
यह घटना हमें याद दिलाती है कि विकास की दौड़ में सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। युवराज जैसे युवाओं की मौत व्यर्थ नहीं जानी चाहिए। प्रशासन को जवाबदेह बनाना जरूरी है, ताकि नोएडा सचमुच एक स्मार्ट सिटी बने, न कि लापरवाही का शिकार। सरकार, अदालतें और समाज को मिलकर ऐसी त्रासदियों को रोकना होगा।


