शुक्रवार को पश्चिम बंगाल की जिन तीन सीटों पर मतदान हुआ वे तीनों सीटें भाजपा की हैं। दूसरे चरण में चुनाव उत्तरी बंगाल से निकल कर मैदानी इलाके में पहुंचा है। उत्तरी बंगाल की एक दार्जिलिंग सीट है और दो अन्य सीटें बालुरघाट और रायगंज हैं। 2019 में तीनों सीटें भाजपा जीत गई थी लेकिन 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद ममता बनर्जी ने इस इलाके में अपने को मजबूत किया है। यहां जम कर मतदान भी हुआ है। ममता अपना वर्चस्व वापस हासिल करना चाहती हैं। यहां भी भाजपा को एक या दो सीट का नुकसान होता है तो वह विपक्ष का फायदा है।
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उत्तर प्रदेश के पश्चिमी हिस्से में आठ सीटों पर शुक्रवार को मतदान हुआ। इसमें से सात सीटें भाजपा की हैं। सिर्फ एक अमरोहा की सीट पिछली बार बसपा ने जीती थी। तब वह सपा के साथ तालमेल करके लड़ रही थी। इस बार बसपा ने अलग लड़ कर त्रिकोणात्मक मुकाबला बनाया है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के साथ लड़ने से ऐसा माना जा रहा है कि मुस्लिम मतदाताओं का कंफ्यूजन खत्म हुआ है। तभी माना जा रहा है कि ढेर सारे मुस्लिम उम्मीदवार उतारने के बावजूद मायावती मुस्लिम वोट नहीं तोड़ पाई हैं। लेकिन उनके उम्मीदवारों को दलित वोट मिला है। इससे कई सीटों पर मुकाबला दिलचस्प होने की खबर है। गाजियाबाद और गौतमबुद्ध नगर जैसी दिल्ली से सटी सीटों को छोड़ दें तो बाकी जगह अच्छी टक्कर होने की खबर है। इन क्षेत्रों में भाजपा और बसपा का नुकसान विपक्ष का फायदा होगा।
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राजस्थान की बची हुई 13 सीटों पर शुक्रवार को दूसरे चरण में मतदान हुआ। लगातार दो बार से भाजपा राजस्थान की सभी सीटें जीत रही है। 2014 में उसने सभी 25 सीटें जीती थीं, जबकि 2019 में उसने 24 सीट जीती और एक सीट उसके सहयोगी हनुमान बेनिवाल के खाते में गई थी। इस बार बेनिवाल उनको छोड़ कर कांग्रेस के सहयोगी बन गए हैं। पहले चरण में उनकी सीट पर मतदान हुआ था। पहले चरण में 12 में से छह से सात सीट पर कांटे की टक्कर थी तो दूसरे चरण की 13 में से चार से पांच सीटों पर कड़ा मुकाबला बताया जा रहा है।
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तभी यदि भाजपा सभी सीटें जीतने की हैट्रिक नहीं बना पाती है तो वह विपक्षी पार्टियों की बड़ी जीत होगी। राजस्थान की ही तरह मध्यप्रदेश में जिन छह सीटों पर मतदान हुआ है वो सभी सीटें भाजपा ने जीती थीं। भाजपा ने 2019 में 29 में से 28 और 2014 में 27 सीटें जीती थीं। वहां भी उसे हैट्रिक लगानी है। लेकिन वह आसान नहीं दिख रहा है। दूसरे चरण में खजुराहो सीट पर मतदान हुआ, जहां कांग्रेस ने सपा के लिए सीट छोड़ी थी। पर सपा प्रत्याशी का नामांकन तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया गया। इसके राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। दमोह में प्रहलाद पटेल सांसद थे, जिनकी टिकट कट गई है। उनको पहले ही विधानसभा का चुनाव लड़ा दिया गया था। उनकी जगह उमा भारती के भतीजे राहुल लोधी को टिकट दी गई। जाहिर है कि भाजपा ने आंतरिक झगड़ा और भितरघात की संभावना को खत्म करने के लिए ऐसा किया। लेकिन चाहे राजस्थान हो या मध्य प्रदेश राष्ट्रीय मुद्दे और राष्ट्रीय नेतृत्व की बजाय स्थानीय मुद्दों और उम्मीदवारों को लेकर चर्चा करते रहे और उसी आधार पर उन्होंने मतदान किया है ऐसा होना भाजपा के लिए नतीजों तक चिंताजनक रहेगा।
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