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सब तरफ सन्नाटा है

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सोशल मीडिया में लगभग सन्नाटा है। यूट्यूब चैनल्स पर भी कोई खास शोर-शराबा नहीं है। मीडिया समूहों ने अपने चैनलों पर झारखंड विधानसभा के लिए पहले चरण के मतदान के बाद ओपिनियन पोल्स प्रसारित किए लेकिन किसी ने उन पर ध्यान नहीं दिया और न किसी ने उनको गंभीरता से लिया। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों के आधार पर कोई भी पार्टी जीत का दावा भी नहीं कर रही है। मीडिया समूह खुद ही अपने सर्वेक्षण को लेकर भरोसे में नहीं हैं। सबसे दिलचस्प यह है कि लोकसभा चुनाव के समय तक जो ओपिनियन और एक्जिट पोल में जो बड़े नाम माने जाते थे वे तस्वीर से बाहर हो गए हैं। असल में लोकसभा चुनाव और उसके बाद हरियाणा विधानसभा चुनाव ने तमाम सर्वे एजेंसियों, मीडिया समूहों, सोशल मीडिया के योद्धाओं और यूट्यूब चैनल्स के पक्षपाती व अपेक्षाकृत निष्पक्ष पत्रकारों को भी गलत साबित कर दिया। किसी को समझ में नहीं आया कि आखिर क्या हुआ।

चार महीने में दूसरी बार ज्यादातर मीडिया समूह, सर्वे एजेंसियां और सोशल मीडिया के राजनीतिक विश्लेषक गलत साबित हुए। गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव में ज्यादातर मीडिया समूहों और सर्वे एजेंसियों ने भाजपा की जीत की भविष्यवाणी की थी। कई समूह तो ऐसे थे, जिन्होंने एक्जिट पोल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘अबकी बार चार सौ पार’ के नारे को साकार होता देखा था। भाजपा को तीन सौ से चार या उससे भी ज्यादा सीटें मिलने की भविष्यवाणी की जा रही थी। हालांकि ‘नया इंडिया’ के इसी ‘गपशप’ कॉलम में चार जून के नतीजों से ठीक पहले वाले शनिवार यानी एक जून को संभावित नतीजों की टेबल छपी थी, जिसमें भाजपा को 235 सीटें  मिलने का अनुमान लगाया गया था। ओपिनियन और एक्जिट पोल सब गलत साबित हुए। विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ ने 204 सीटें जीत ली और भाजपा 240 सीट पर रह गई। उसके बाद हुए हरियाणा और जम्मू कश्मीर के चुनाव में तमाम सर्वे एजेंसियों और मीडिया समूहों ने सावधानी बरती। फिर भी सब गलत साबित हुए। लगभग सभी सर्वेक्षणों में कांग्रेस को जीतते हुए दिखाया गया था। लेकिन सारी अटकलों को गलत साबित करते हुए भाजपा तीसरी बार जीत गई। उसके बाद दो तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिली। एक प्रतिक्रिया में कांग्रेस पर जोरदार हमला हुआ। राहुल गांधी के करीबी नेताओं पर टिकट बेचने और 10 तरह की गड़बड़ी के आरोप लगे। दूसरी प्रतिक्रिया ईवीएम के जरिए भाजपा के जीत जाने की थी।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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