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कोई काम बचा ही नहीं!

असल में यही वह एप्रोच है, जिसकी वजह से कहा जाता है कि सब काम हो गए। पिछले 12 साल में हर क्षेत्र की योजनाएं शुरू कर दी गईं, नारे गढ़ दिए गए, अभियान चला दिए गए और कह दिया गया कि काम पूरा हो गया। देश में स्वच्छता अभियान शुरू हुआ। महात्मा गांधी का चश्मा उसका लोगो बना। इस अभियान को सफल घोषित कर दिया गया लेकिन हकीकत यह है कि राजधानी दिल्ली में हर दिन सैकड़ों टन कचरा नहीं उठता है। 45 डिग्री सेल्सियस की गर्मी में भी दिल्ली की हवा प्रदूषित हुई और ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान यानी ग्रैप के पहले चरण की पाबंदियां लागू की गईं तो ऐसा सिर्फ धूल और कचरे की वजह से हुआ। इसी तरह घर घर शौचालय का अभियान चला और एक दिन दावा किया गया कि देश खुले में शौच से मुक्त हो गया। इसकी हकीकत हर व्यक्ति अपनी आंखों से देखता है। ऐसे ही बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का अभियान शुरू हुआ और जिस हरियाणा में इस अभियान को शुरू किया गया वही पर लड़कियों का लिंगानुपात और खराब हो गया। बेटी को बचाने का यह हाल है और पढ़ाने का हाल सबको पता है।

डिजिटल इंडिया का अभियान शुरू हुआ, जिसे बहुत महान अभियान के रूप में रेखांकित किया जाता है। इसकी उपलब्धि यह है कि भारत में दुनिया में सबसे ज्यादा डिजिटल ट्रांजेक्शन होता है। यूपीआई डिजिटल इंडिया की सबसे बड़ी उपलब्धि है। सोचें, दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के नए और एडवांस दौर में पहुंच गई है तो भारत की उपलब्धि डिजिटल ट्रांजेक्शन है! यह कोई नहीं कहता है कि आबादी 140 करोड़ है और देश में सबसे ज्यादा मोबाइल फोन यूजर हैं तो डिजिटल ट्रांजेक्शन भी ज्यादा होगा ही। परंतु करोड़ों, अरबों डिजिटल ट्रांजेक्शन के बावजूद देश की अर्थव्यवस्था तो चार ट्रिलियन डॉलर पर ही अटकी है! दावा किया गया कि भारत ने जापान और इंगलैंड को पीछे छोड़ दिया और भारत तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ रहा है। लेकिन डॉलर के मुकाबले रुपया ऐसे गिरा कि भारत छठे नंबर पर आ गया।

भारत में स्मार्ट सिटी की योजना शुरू हुई और इसका खूब प्रचार हुआ। लेकिन कितने स्मार्ट शहर बने यह हर आदमी अपने आसपास देख सकता है। आयुष्मान भारत योजना शुरू की गई, जिसमें पांच लाख रुपए तक के इलाज की बीमा की व्यवस्था की गई। योजना घोषित होने और इसके सफल हो जाने के दावे के बावजूद भारत सरकार का अपना आंकड़ा है कि 2021 के मुकाबले 2024 में चिकित्सा सहायता के बगैर मरने वालों की संख्या दोगुने से ज्यादा हो गई है। सोचें, सबको स्वास्थ्य सुरक्षा देने के लिए इतनी बड़ी योजना बनी है और बिना इलाज के मरने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है!

असल में पिछले 12 साल में कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है, जिसके लिए योजना शुरू नहीं हुई। सरकार में आते ही एक के बाद एक योजनाओं की घोषणा हुई। उन योजनाओं पर कितना अमल हुआ इस पर बात करने की जरुरत नहीं है। योजना घोषित कर दी गई। उसका प्रचार कर दिया गया। अब जैसे ही कोई किसी कमी की ओर ध्यान दिलाया है तो तुरंत उससे जुड़ी योजना का नाम लेकर बता दिया जाता कि अमुक योजना चल रही है, जिस पर इतने करोड़ रुपए खर्च हुए हैं और इससे इतने लोगों को लाभ हुआ है। यह मान लिया गया है कि देश में सारे काम हो गए हैं क्योंकि सारे कामों के लिए कोई न कोई योजना घोषित कर दी गई है और इसलिए अब कुछ करने की जरुरत नहीं है। इसी के सहारे भारत अब विकसित हो जाएगा। 2047 तक भारत को विकसित बनाने का लक्ष्य तय कर दिया गया है लेकिन यह नहीं बताया गया है कि भारत विकसित होगा तो अभी के मुकाबले कैसे और कितना बदला हुआ होगा। ध्यान रहे विकसित भारत एक सब्जेक्टिव धारणा है। इसके लिए ऑब्जेक्टिव लक्ष्य कोई नहीं तय किया गया है। तभी हैरानी हो रही है कि अभी ही भारत को विकसित क्यों नहीं घोषित कर दिया जा रहा है?

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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