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तेल खरीद में अमेरिका माईबाप

रुबियो के साथ बैठक के बाद और साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा कि रुबियो के लिए अमेरिका फर्स्ट है तो उनके लिए भारत फर्स्ट है। अच्छी बात है लेकिन भारत क्यों अमेरिका के कहने से तेल खरीद रहा है या खरीदना बंद कर रहा है? जयशंकर और दूसरे तमाम लोग कहते हैं कि भारत अपनी ऊर्जा जरुरत के हिसाब से रूस से तेल खरीदने का फैसला करता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि पहले जहां 40 फीसदी तेल खरीदा जा रहा था वहां अब 30 फीसदी खरीदा जा रहा है। वह भी अमेरिका की ओर से छूट दिए जाने के बाद। अगर ऐसा नहीं होता तो भारत को अमेरिका से अनुरोध नहीं करना पड़ता कि वह रूस से तेल खरीद पर दी गई छूट को आगे बढ़ाए। दुनिया के मजबूत देश, भले वे विश्वगुरू नहीं हों इस तरह दूसरे देश की कृपा से अपने सौदे नहीं करते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने पर पाबंदी लगाई तो तत्काल भारत ने तेल खरीदना कम कर दिया। यह बात अमेरिका के दौरे पर गए भाजपा नेता राम माधव ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कही। उसके बाद विवाद हुआ तो कहा उन्होंने गलत कह दिया था। लेकिन यह गलत नहीं वास्तविकता है।

सोचें, अमेरिका ने 2019 में ईरान से तेल खरीद पर पाबंदी लगाई तो भारत ने पूरी तरह से तेल खरीदना बंद कर दिया, जबकि ईरान रुपए में भुगतान लेता था और उसके यहां से तेल आने में तीन से चार दिन का समय लगता था। लेकिन अमेरिकी पाबंदी के बाद भारत ने तेल खरीद बंद कर दी। ऐसा ही रूस के मामले में हुआ। अमेरिका ने पाबंदी लगाई तो भारत ने रुस से तेल खरीदना कम कर दिया। बंद इसलिए नहीं हुआ क्योंकि यूरोप को भी भारत से रिफाइन किए गए तेल की जरुरत थी। दूसरी ओर चीन ने ईरान पर लगाई कई अमेरिकी पाबंदियों को नहीं माना। पाबंदी के बावजूद ईरान का 90 फीसदी कच्चा तेल चीन को जाता रहा। चीन ने पाबंदी के बावजूद रूस से भी तेल खरीदता रहा। उसने अमेरिकी पाबंदी नहीं मानी तो अमेरिका ने उसका क्या कर लिया?

उलटे राष्ट्रपति ट्रंप ने बीजिंग जाकर शी जिनपिंग की लल्लोचप्पो की। असल में यह ट्रंप की डिप्लोमेसी है। जो उनके सामने तन कर खड़ा होता है और दुश्मनी दिखाता है उसके सामने वे झुक जाते हैं और जो उनकी बात मानता है, दोस्ती दिखाता है उस पर हमले करते हैं। चीन, रूस, उत्तर कोरिया आदि ट्रंप की बात नहीं मानते हैं तो ट्रंप उनसे दोस्ती करने को व्याकुल रहते हैं और भारत उनकी बात मानता है तो भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को झुकाने, अपमानित करने और आर्थिक नुकसान पहुंचाने का कोई मौका नहीं चूकते हैं। बहरहाल, भारत कुछ भी कहे और विश्वगुरू होने का कितना भी दावा करे, वास्तविकता यह है कि कभी अमेरिका तो कभी चीन और कभी रूस के हिसाब से भारत की विदेश नीति और विदेशी व्यापार नीति चल रही है।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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