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राहुल गांधी का ‘सत्याग्रह’

क्या राहुल गांधी के पास समाधान है? सत्ता पक्ष ने आवाम के मसलों को नजरअंदाज किया है, तो विपक्ष ने उनके हल की नीतियां तैयार करने में कितनी मशक्कत की है, और उसका नतीजा क्या रहा है?

राहुल गांधी की “देश भर में अपने हक के लिए लड़ रहे” लोगों के संघर्षों को एक मंच पर लाने की पहल सराहनीय है। इसके लिए उन्होंने वेबसाइट लॉन्च की है, और कहा है- “आपकी कहानी नक्शे पर आएगी। आप देखेंगे कि आपकी तरह और कौन-कौन लड़ रहा है। और मैं जो कर सकता हूं, करुंगा- संसद में, सड़क पर, खत लिखकर, जहां भी मेरी ज़रूरत हो वहां आपके साथ खड़े होकर- नेता विपक्ष के रूप में ये मेरी ज़िम्मेदारी है।” कहा जा सकता है कि ये नई भूमिका लेकर गांधी ने नेता विपक्ष के कर्त्तव्य दायरे का विस्तार किया है।

उनकी इस पहल ने बहुत-से संघर्षरत लोगों को आकर्षित किया, यह इससे जाहिर है कि तीन दिन के अंदर 30 हजार से ज्यादा ऐसी कहानियां वेबसाइट पर दर्ज कराई गईं। जिस देश में बहुसंख्यक लोग बुनियादी सुविधाओं से वंचित और औपचारिक व्यवस्था से बाहर हों, वहां महरूमियत और जद्दोजहद की कहानियों का चौतरफा बिखरी होना लाजिमी ही है। सामान्यतः सत्ताधारी दलों की कोशिश इन कथाओं की अनदेखी करते हुए ऐसे कथानक प्रचारित करने की होती है, जिससे लोग अपनी मुसीबतों को भूल कर विकास एवं प्रगति के हवाई दावों में यकीन कर सकें। वर्तमान सत्ताधारी दल ने ऐसा करने में अपनी खास महारत दिखाई है।

इसीलिए जन संघर्षों की कहानियों को चर्चा के केंद्र में लाने की नेता विपक्ष की कोशिश विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण मालूम पड़ी है। लेकिन यह तस्वीर का सिर्फ एक पक्ष है। दूसरा पहलू समाधान की नीतियों से जुड़ा है। ‘सत्याग्रह’ पर सबसे ज्यादा शिक्षा, भ्रष्टाचार, जातिगत भेदभाव और स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव से संबंधित मामले दर्ज कराए गए हैं। मुद्दा है कि क्या राहुल गांधी या उनकी पार्टी के पास इन समस्याओं का नीतिगत समाधान है? अगर सत्ता पक्ष आवाम के मसलों को नजरअंदाज कर रहा है, तो विपक्ष ने उनके हल की नीतियां और कार्यक्रम तैयार करने में कितनी मशक्कत की है, और उसका नतीजा क्या रहा है? इन प्रश्नों पर गांधी भरोसा जीत पाएं, तो बेशक लोगों को उनमें सार्थक विकल्प नजर आएगा। वरना, ये पहल एक सियासी हथकंडा बन कर रह जाएगी।

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By NI Editorial

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