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खम्मम के शिगूफ़े का पेच-ओ-ख़म

सकल-विपक्ष की घालमपेल ही नरेंद्र भाई की आस का तिनका है। विपक्ष जितना बिखरेगा, उतना ही वे निखरेंगे। खम्मम नरेंद्र भाई को नहीं, राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने की पेशकश थी। वह नीतीश कुमार और ममता बनर्जी के वैकल्पिक चेहरे को भी कुचलने की कोशिश थी। ग़ैर-कांग्रेसी विकल्प का कोलंबस बनी घूम रही त्रिमूर्ति का हर चेहरा मन-ही-मन जानता है कि न वह ख़ुद नरेंद्र भाई का विकल्प बन सकता है और न उस की बग़ल में मौजूद साथी। अभी ऐसा वक़्त भी नहीं आ गया है कि देश चंद्रशेखर राव, केजरीवाल या अखिलेश को नरेंद्र भाई का स्थानापन्न मान ले।

कल्वकुंटला चंद्रशेखर राव किसी के कहने से चने के झाड़ पर चढ़े हैं या ख़ुद, सो तो वे जानें, मगर उन की अश्वारोही ख़्वाहिशों में शामिल फुदकियों का डांडिया नाच देख-देख कर नरेंद्र भाई मोदी ज़रूर गदगद हो रहे होंगे। ग़ैर-कांग्रेसी विपक्ष को एक करने की गर्ज़ से राव के बुलावे पर खम्मम पहुंचे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिह मान, केरल के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव डी. राजा को बौराया देख नरेंद्र भाई की बांछें नहीं खिलेंगी तो फिर किस की खिलेंगी? 2024 में उन का विकल्प देने की तैयारियों की यह शुरुआत देख कर उन्होंने अपनी रही-सही फ़िक्र भी अब धुंए में उड़ा दी होगी।

गै़र-कांग्रेसी विपक्ष के खम्मम-समूह के घूंघट में झांक कर उस के चेहरे की असली सुंदरता का अंदाज़ लगाइए। राव की तेलंगाना राष्ट्र समिति ने साढ़े तीन महीने पहले ख़ुद-ब-ख़ुद अखिल भारतीय जामा पहन लिया। वह भारत राष्ट्र समिति बन गई। 543 सदस्यों वाली लोकसभा में उस के 9 सांसद हैं। यानी देश भर की लोकसभा सीटों में उस की हिस्सेदारी डेढ़ प्रतिशत है। यह है उस की अखिल भारतीयता। केजरीवाल और भगवंत मान की आम आदमी पार्टी का लोकसभा में एक भी सांसद नहीं है। विजयन की मार्क्सवादी पार्टी के तीन सांसद हैं। राजा की कम्युनिस्ट पार्टी के दो हैं। अखिलेश की समाजवादी पार्टी के तीन हैं। नरेंद्र भाई के खि़लाफ़ वैकल्पिक सियासत के पुरोधा बन रहे इन पांच महामनाओं के पास इस वक़्त लोकसभा में 17 सांसदों के साथ तीन प्रतिशत की हिस्सेदारी है।

चलिए, हम मान लेते हैं कि 2024 के चुनाव में राव की पहलवानी उन के गृह राज्य में ऐसा कमाल दिखाएगी कि तेलंगाना की 17 में से 15 सीटें वे जीत लेंगे। यह भी मान लेते हैं कि दिल्ली और पंजाब की 20 लोकसभा सीटों में से केजरीवाल 15 जीत जाएंगे और इतनी ही दूसरे राज्यों से समेट लाएंगे। जब मानना ही है तो यह भी मान लें कि मार्क्सवादी और कम्युनिस्ट पार्टी की सीटें भी तीन गुनी बढ़ कर 15 हो जाएंगी। अखिलेश की समाजवादी पार्टी को उत्तर प्रदेश की विधानसभा में 115 सीटें मिली हैं तो उन्हें लगता है कि लोकसभा में वे 30 सीटें ले आएंगे। यह सनक भी सिर-माथे। इतने पर भी इस चंडूखानी गणित की अधिकतम संभावना 90 सांसदों का आंकड़ा कहां पार कर पा रही है?

इन पांच राजनीतिक दलों के अलावा बाकी जो और औपचारिक-तकनीकी लिहाज़ से भारतीय जनता पार्टी के साथ नहीं हैं, उन के पास लोकसभा में इस वक़्त 143 सीटें हैं। इन में बीजू जनता दल, वाईएसआर कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी, अकाली दल, लोक जनशक्ति पार्टी, वग़ैरह सब शामिल हैं। पीनक-लहर में यह भी मान लीजिए कि मायावती, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, नीतीश कुमार, शरद पवार, सुखबीर सिंह बादल, चंद्राबाबू नायडू, जगन रेड्डी, उद्धव ठाकरे – सब के सब – नरेंद्र भाई की मूसलाधार से बचने के ख़ातिर राव-केजरीवाल-अखिलेश की छतरी तले आ जाएंगे। यह भी मान लीजिए कि लोकसभा में उन के मौजूदा सांसदों की तादाद गिरेगी नहीं, जस-की-तस रहेगी। तो ये हो गईं 233 सीटें। सरकार बनाने के लिए तक़रीबन 40 सीटों की ज़रूरत तो तब भी पड़ेगी। ग़ैर-कांग्रेसी गठबंधन को वे कहां से मिलेंगी? क्या आप को लगता है कि दक्षिण-उत्तर-पूरब-पश्चिम के राज्य राव पर ऐसे रीझ जाएंगे कि उन्हें नींद में चलने की बीमारी हो जाएगी और वे उन के घुंघरुओं की छनछन के पीछे ऐसे चल पड़ेंगे कि सब भरपाई हो जाएगी?

सो, गै़र-कांग्रेसी विकल्प का जाप करना आसान है, मगर उस की तस्बीह फिरा कर नरेंद्र भाई के विकल्प को आकार देना असंभव है। राहुल गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा को कितना ही अराजनीतिक रखा हो, भारत की भावी राजनीति पर उस का असर तो पड़ना ही है। ठीक है कि इस पदयात्रा से उपजी ऊर्जा से कांग्रेस को 2024 में अकेले 272 सीटों पर जीत नहीं मिल रही है, लेकिन मेरा निजी आकलन कहता है कि आज चुनाव हो जाएं तो कांग्रेस को 128 से कम सीटें नहीं मिलेंगी। अपने द्वारपालों की महीन साज़िशों के बावजूद अगर इन सर्दियों की यही गुनगुनाहट राहुल अगले साल की गर्मियों तक बनाए रख सके तो अपने मौजूदा सहयोगी दलों के साथ वे नरेंद्र भाई की नाक में दम तो कर देंगे। और, सकल-विपक्ष अगर कहीं एक हो गया तो मोशा-सरकार की विदाई तय समझिए।

इस खतरे को टालने के लिए ही ग़ैर-कांग्रेसी विकल्प का प्रायोजित शिगूफ़ा शुरू हुआ है। नरेंद्र भाई जानते हैं कि 2024 में तक़रीबन एक दर्जन राज्य ऐसे होंगे, जहां वे सारी मशक्क़त के बावजूद भाजपा की मौजूदा स्थिति कायम नहीं रख पाएंगे। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली और पश्चिम बंगाल में सौ के आसपास सीटों का नुक़सान होने की आशंकाओं से संघ-कुनबा चिंतित है। इसी के चलते दक्षिणी राज्यों में पैर-पसारू आयोजनों की सरकारी झड़ी केंद्र सरकार ने अभी से लगा दी है। तमिल संगमम उसी की एक झलक थी। आने वाले महीनों में तेलंगाना, आंध्र, केरल और कर्नाटक के मद्देनज़र भी ऐसे समागम आप देखेंगे।

भाजपा और संघ द्वारा पिछले तीन महीनों में कराए गए आकलनों के संकेत हैं कि डेढ़ साल बीतते-बीतते भाजपा उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 61 सीटें जीतने की स्थिति में नहीं रहेगी। गुजरात की सभी सीटों पर भी वह ताल ठोक कर नहीं जीत पाएगी और उसे कम-से-कम आधा दर्जन सीटें गंवानी पड़ सकती हैं। बिहार में उस की सीटें आधी से भी कम रह जाएंगी। राजस्थान, हरियाणा, कर्नाटक और महाराष्ट्र में भी उस के सांसदों की संख्या आज से आधी ही रह जाएगी। झारखंड, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ पश्चिम बंगाल में भी उस का कद आधा रह जाने के संकेत हैं। भाजपा इस समय लोकसभा में 235 का आंकड़ा पार करने की हालत में नहीं है। उस के सहयोगी दलों के पास अभी 27 सांसद हैं। उन में से 7 भी दोबारा चुन कर आने की स्थिति में नहीं हैं। ये हालात अगर कायम रहे तो नरेंद्र भाई के तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने की राह बहुत ऊबड़-खाबड़ हो जाएगी।

ऐसे में सकल-विपक्ष की घालमपेल ही नरेंद्र भाई की आस का तिनका है। विपक्ष जितना बिखरेगा, उतना ही वे निखरेंगे। खम्मम नरेंद्र भाई को नहीं, राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने की पेशकश थी। वह नीतीश कुमार और ममता बनर्जी के वैकल्पिक चेहरे को भी कुचलने की कोशिश थी। ग़ैर-कांग्रेसी विकल्प का कोलंबस बनी घूम रही त्रिमूर्ति का हर चेहरा मन-ही-मन जानता है कि न वह ख़ुद नरेंद्र भाई का विकल्प बन सकता है और न उस की बग़ल में मौजूद साथी। अभी ऐसा वक़्त भी नहीं आ गया है कि देश चंद्रशेखर राव, केजरीवाल या अखिलेश को नरेंद्र भाई का स्थानापन्न मान ले।

ऐसा नहीं है कि भारत जोड़ो यात्रा ने राहुल के लिए नरेंद्र भाई के मायावी संसार से निपटना बाएं हाथ का खेल बना दिया है, लेकिन इस से उनके सामाजिक-राजनीतिक क़द में सचमुच बहुत इज़ाफ़ा हुआ है। जनमानस में यह धारणा मजबूत हुई कि ऐसा नहीं है कि नरेंद्र मोदी के अलावा कोई है ही नहीं। पांच महीनों में राहुल की संवेदना, समझ और सदाशयता को देखने वाले उन्हें पांच साल देने का मन न बना लें, इसलिए खम्मम धारावाहिक आरंभ हुआ है। देखें, वह कितने एपीसोड पूरे करता है? (लेखक न्यज़-व्यूज़ इंडिया और ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर के संपादक हैं।)

By पंकज शर्मा

हिंदी के वरिष्ठतम पत्रकार। नवभारत टाइम्स में बतौर विशेष संवाददाता का लंबा अनुभव। जाफ़ना के जंगलों से भी नवभारत टाइम्स के लिए रपटें भेजीं और हंगरी के बुदापेश्त से भी।अस्सी के दशक में दूरदर्शन के कार्यक्रमों की लगातार एंकरिंग। नब्बे के दशक में टेलीविज़न के कई कार्यक्रम और फ़िल्में बनाईं। फिलहाल ‘न्यूज़ व्यूज़ इंडिया’ और ‘ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर’ के कर्ता-धर्ता।

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