nayaindia विभाजन, हिंसा और नफरत: घटनाओं का विश्लेषण
अजीत द्विवेदी

नफरत मिटाने के साझा प्रयास की जरूरत

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विभाजन

पिछले कुछ समय से देश के अलग अलग हिस्सों में ऐसी घटनाएं हो रही हैं, जो समाज में बढ़ती नफरत, हिंसा, विभाजन और गुस्से की प्रवृत्ति को परिलक्षित करती हैं। मणिपुर में चल रही जातीय हिंसा से लेकर दिल्ली से सटे मेवात में हुए सांप्रदायिक दंगे और जयपुर-मुंबई एक्सप्रेस ट्रेन में तीन लोगों की गोली मार कर हत्या करने की घटना को इस मामले में प्रतिनिधि घटना के तौर पर देख सकते हैं। ये तीनों घटनाएं देश के तीन अलग अलग भौगोलिक क्षेत्र में हुई हैं और बिल्कुल भिन्न सामाजिक परिवेश में हुई हैं।

इसलिए इन तीनों घटनाओं का किसी एक पहलू से विश्लेषण संभव नहीं है। इसमें सामाजिक व सांप्रदायिक विभाजन का पहलू है तो समाज व व्यक्तियों में बढ़ती असहिष्णुता का पहलू भी है और साथ ही कानून व्यवस्था व खुफिया तंत्र की विफलता का पहलू भी है तो राजनीतिक लाभ की मंशा का पहलू भी है।

सबसे पहले सामाजिक स्तर पर बढ़ रहे विभाजन की बात करें तो ऐसा लगता है कि भारत का समाज बड़ी तेजी से ‘हम और वे’ की विभाजन रेखा को पार करता जा रहा है। वैसे यह पुरानी धारणा है कि जो हमारी तरह नहीं हैं, उनको हमारे साथ नहीं रहना चाहिए। लेकिन इस धारणा के अपवाद के तौर पर ही भारत जैसी विविधता वाला समाज विकसित हुआ है। भारत में विविधता का सम्मान और स्वीकार कभी भी कृत्रिम नहीं रहा। वह स्वाभाविक रूप से था और भाजपा के नेता भी बड़े गर्व से कहते रहे हैं कि भारत एकमात्र देश है, जहां दुनिया के हर धर्म को फलने-फूलने की पूरी आजादी मिली है। यह भी कहा जाता है कि दुनिया में करीब 60 इस्लामिक मुल्क हैं लेकिन हिंदू बहुल भारत एकमात्र देश है, जहां इस्लाम को मानने वाले सभी 72 फिरकों से जुड़े लोग रहते हैं।

इसके बावजूद अगर कोई व्यक्ति धर्म पहचान कर एक साथ तीन लोगों की गोली मार कर हत्या कर दे तो यह बहुत चिंता की बात होती है। मणिपुर से मुंबई तक इस तरह की घटनाएं हो रही हैं। मणिपुर में हालात ऐसे बन गए हैं कि कुकी और मैती एक-दूसरे के खून के प्यासे हैं। वहां जाति पूछ कर हमले हो रहे हैं, हत्याएं हो रही हैं। इसी तरह जयपुर-मुंबई एक्सप्रेस ट्रेन में रेलवे पुलिस फोर्स के एक जवान ने एक सीनियर अधिकारी की हत्या कर दी और उसके बाद तीन मुस्लिम यात्रियों को खोज कर गोली मार दी। इस भयानक हत्याकांड को अंजाम देने के बाद उसका एक कथित वीडियो सामने आया, जिसमें वह पाकिस्तान का जिक्र कर रहा है और हिंदुस्तान में रहना है तो क्या करना होगा यह बता रहा है।

यह समाज में बढ़ती नफरत और हिंसा को प्रतीकित करने वाली घटना है। किसी खास राजनीतिक विचारधारा के अतिशय प्रचार की वजह से हो या मीडिया में एक समुदाय के खिलाफ नफरत बढ़ाने वाला कंटेंट लगातार दिखाए जाने की वजह से हो लेकिन हकीकत है कि आम आदमी के दिमाग में जहर भरा जा रहा है। एक दूसरे के प्रति नफरत बढ़ाई जा रही है। झूठी सच्ची खबरों या आधी अधूरी ऐतिहासिक बातों के सहारे उनको दूसरे समुदाय के प्रति भड़काया जा रहा है। भड़काने का यह काम लगभग सभी समुदायों की ओर से किया जा रहा है।

कहीं प्रत्यक्ष रूप से तो कहीं परोक्ष रूप से। मणिपुर और जयपुर-मुंबई एक्सप्रेस की घटना इसी का नतीजा है। सोचें, यह कितना खतरनाक है कि कहीं किसी की जाति पूछ कर उसकी हत्या कर दी जाए और कहीं किसी का धर्म देख कर उसको गोली मार दी जाए? क्या इस तरह की घटनाएं देश को अराजकता की ओर नहीं ले जाएंगी?

इसका एक दूसरा पहलू भी है। चलती ट्रेन में चार लोगों को गोली मारने वाले के बारे में कहा जा रहा है कि वह मानसिक रूप से अस्थिर था और पहले भी उसकी शिकायत मिली थी। लेकिन चार लोगों की हत्या के बाद वह जिन तर्कों से अपने कुकृत्य को जस्टिफाई कर रहा था वह बेहद चिंताजनक है। सोचें, आज हर जगह नागरिक के जीवन में सुरक्षा एजेंसियों का दखल है। रेलवे स्टेशनों से लेकर हवाईअड्डों तक और सड़क से लेकर बाजार तक हर जगह सुरक्षाकर्मी अत्याधुनिक हथियार लेकर खड़े होते हैं। किसी को क्या पता कि उसके दिमाग में क्या चल रहा है? वह किस विचारधारा से जुड़ा है और मीडिया में दिखाई गई किस खबर से उद्वेलित है?

अगर किसी तनाव या दबाव के क्षण में वह गोलियां चलाने लगे तो क्या होगा? एक खबर के मुताबिक पिछले पांच साल में केंद्रीय अर्ध सैनिक बलों से जुड़े छह सौ से ज्यादा जवानों ने खुदकुशी की है। कई जवानों ने अपने सहकर्मियों की हत्या करके अपने आप को गोली मारी। यह एक अलग तरह के दबाव का नतीजा है, जो पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवान झेलते हैं। सो, सरकार को तत्काल इस दिशा में सोचना चाहिए। सुरक्षा बलों को डिरैडिकलाइज करने का उपाय होना चाहिए तो साथ ही उनके निजी तनावों और दबावों को दूर करने के भी उपाय होने चाहिए। बेहतर प्रशिक्षण और नौकरी की स्थितियों को बेहतर करके ऐसा किया जा सकता है।

जिस समय जयपुर-मुंबई एक्सप्रेस में चार लोगों को गोली मारने की घटना हुई उस समय राजधानी दिल्ली से सटे मेवात और गुरुग्राम में सांप्रदायिक हिंसा की आग लगी थी। यह पंक्ति लिखे जाने तक छह लोगों की मौत हो चुकी है और सैकड़ों लोग घायल हुए हैं। सैकड़ों गाड़ियां जला दी गईं और दर्जनों दुकानें जल कर खाक हो गईं। यह अनायास हुई हिंसा नहीं थी और न इसका विस्तार मामूली था। राजधानी दिल्ली के पूर्वी और दक्षिणी हिस्से में एक बड़ा इलाका इसकी चपेट में आया। इसकी आंच राजस्थान और उत्तर प्रदेश तक पहुंची। इसमें एक पहलू राजनीतिक है लेकिन उससे ज्यादा बड़ा और अहम पहलू पुलिस, प्रशासन व खुफिया तंत्र की विफलता का है।

विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल की ओर से ब्रज मंडल यात्रा हर साल निकाली जाती है और कभी भी दंगा नहीं होता है। इस बार यात्रा से पहले दो हत्याओं के आरोपी मोनू मानेसर को लेकर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें उसके यात्रा में शामिल होने का दावा किया गया। सोचें, दो मुस्लिम नौजवानों की हत्या के मामले में पुलिस उसे कई महीने से तलाश रही है और वह पकड़ा नहीं गया। और जब उसके यात्रा में शामिल होने का वीडियो आया तब भी सुरक्षा एजेंसियां हाथ पर हाथ धरे बैठी रहीं।

तभी सवाल है कि जब उसके यात्रा में शामिल होने का वीडियो वायरल हुआ और नूंह चौराहे पर मुस्लिम समाज के लोग इकट्ठा होने लगे तो क्या पुलिस और प्रशासन को अतिरिक्त तैयारियां नहीं करनी चाहिए थी? क्या खुफिया विभाग को सूचना नहीं मिली कि नूंह चौराहे पर मुस्लिम समुदाय के लोग इकट्ठा हो रहे हैं तो दूसरी ओर यात्रा में शामिल कुछ लोग भी हथियार वगैरह लेकर निकलने वाले हैं? क्या इन्हें रोका नहीं जा सकता था? क्या मोनू मानेसर को लेकर पहले ही स्थिति स्पष्ट नहीं की जा सकती थी? लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया गया और नतीजा यह हुआ कि दंगा भड़क गया, जिसमें कितनी जानें चली गईं, कितने घर तबाह हो गए और कितने लोगों का रोजगार छीन गया।

सवाल है कि नफरत की जो आंधी चली है उसे रोका जा सकता है? राहुल गांधी मोहब्बत की दुकान खोल कर बैठे हैं लेकिन यह अकेले राहुल गांधी या अकेले किसी एक पार्टी या एक राजनीतिक गठबंधन से संभव नहीं है कि वह इस आंधी का रुख मोड़ सके। इसके लिए साझा प्रयास की जरूरत होगी। सभी राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और नागरिकों को सामूहिक रूप से प्रयास करना होगा। जिस दिन ट्रेन में गोली मारने की घटना हुई और गुरुग्राम में हिंसा हुई उसी दिन प्रधानमंत्री मोदी ने एनडीए के सांसदों से मुलाकात में कहा कि उनको मुस्लिमों के साथ रक्षाबंधन बनाना चाहिए। यह बहुत अच्छी बात है। इस तरह की सामाजिक पहल अगर प्रधानमंत्री के स्तर पर खुद होती है तो समाज में बड़ा मैसेज जाएगा।

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By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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