Naya India

किसी बहाने सही घोषणापत्र की चर्चा तो हुई

घोषणापत्र

भारत के चुनावों में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज वह होता है, जिस पर महात्मा गांधी की फोटो होती है और भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर के दस्तखत होते है। इसी तरह सबसे कम महत्वपूर्ण दस्तावेज वह होता है, जिसे घोषणापत्र कहा जाता है। इसे बनाने वाला, जारी करने वाला और पढ़ने वाला कोई भी गंभीरता से नहीं लेता है। यह हर भारतीय घरों में लाल कपड़े में लपेट कर रखी गई धार्मिक पोथियों की तरह होता है, जिसे माथे तो सभी लगाते हैं लेकिन पढ़ता कोई नहीं है। अगर गलती से कोई पढ़ भी ले उसकी बातों पर अमल नहीं करता है।

कई बार तो पार्टियों के बड़े नेताओं तक को पता नहीं होता है कि उनकी पार्टी का घोषणापत्र तैयार करने वाली समिति ने उसमें क्या क्या लिखा है या क्या क्या ऊंचे वादे किए हैं। चुनाव घोषणापत्र अगर वास्तव में महत्व का दस्तावेज होता तो इस बार के लोकसभा चुनाव में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी उसे कब का जारी कर चुकी होती। पहले चरण की 102 सीटों के लिए चुनाव प्रचार समाप्ति की ओर बढ़ रहा है। सिर्फ एक हफ्ते बचे हैं और अभी तक घोषणापत्र जारी नहीं हुआ है। ज्यादातर प्रादेशिक पार्टियों ने भी कोई घोषणापत्र जारी नहीं किया है। इसके उलट उम्मीदवारों की मदद के लिए भेजे जा रहे करोड़ों रुपए पकड़े जाने लगे हैं।

बहरहाल, कांग्रेस पार्टी ने पांच अप्रैल को अपना घोषणापत्र जारी किया और उसके बाद से किसी न किसी बहाने उसकी चर्चा हो रही है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी हर सभा में इसका जिक्र कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि कांग्रेस के घोषणापत्र पर मुस्लिम लीग की पूरी छाप है। उनकी इस बात को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने भी दोहराया है। हाल ही में कांग्रेस से निष्कासित आचार्य प्रमोद कृष्णम ने एक कदम आगे बढ़ कर कहा कि यह महात्मा गांधी का नहीं, बल्कि मोहम्मद अली जिन्ना का घोषणापत्र है।

इस तरह कांग्रेस का घोषणापत्र कांग्रेस के खिलाफ प्रचार के लिए इस्तेमाल हो रहा है। हालांकि कोई 45 पन्नों और साढ़े तीन सौ वादों वाले घोषणापत्र में प्रत्यक्ष रूप से कोई ऐसी बात नहीं है, जिसके बारे में कहा जाए कि यह मुस्लिम लीग या जिन्ना के विचारों पर आधारित है। यह मुद्दा उठाने वाले किसी नेता ने कोई खास वादा निकाल कर बताया भी नहीं है कि अमुक वादा मुस्लिम लीग की तरह का है। जेपी नड्डा ने जरूर यह कहा कि कांग्रेस ने अल्पसंख्यकों को पहनावे, खान-पान और पर्सनल लॉ की गारंटी दी है। लेकिन यह तो मुस्लिम लीग के विचार की तरह या देश का विभाजन कराने वाली बात नहीं है। जब तक देश में सबके लिए एक कानून लागू नहीं होता है तब तक सभी धर्मों को अपनी धार्मिक व पारंपरिक मान्यताओं को मानने की आजादी है।

इसलिए वह मुद्दा ही नहीं है, जो भाजपा बना रही है। असल में वह चुनाव प्रचार के बीच गर्मी लाने और रामनवमी के दो दिन बाद होने वाले पहले चरण के मतदान में मुस्लिम लीग, जिन्ना, पाकिस्तान, पीएफआई आदि का नाम लेकर ध्रुवीकरण कराने की कोशिश कर रही है। कायदे से कांग्रेस को इस जाल में नहीं फंसना चाहिए था। लेकिन चुनाव की गरमा गरमी में पार्टियां हर छोटी बड़ी बात पर प्रतिक्रिया देती हैं।

तभी मल्लिकार्जुन खड़गे से लेकर जयराम रमेश तक प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा की बातों पर जवाब दे रहे हैं और इस बहाने कांग्रेस के घोषणापत्र की खूब चर्चा हो रही है। यह अलग बात है कि कांग्रेस ने नारी न्याय से लेकर किसान व युवा न्याय और पर्यावरण न्याय तक का वादा किया है, 25 गारंटियां दी हैं और साढ़े तीन वादे किए हैं लेकिन उनकी चर्चा कम हो रही है। फिर भी हो सकता है कि आने वाले दिनों में चर्चा इस ओर लौटे।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि चुनाव घोषणापत्र में पार्टियां जितनी ऊंची और आदर्शवादी बातें करती हैं अगर उन पर अमल हो जाए तो देश की सारी समस्याएं खत्म हो जाएं। पिछले 75 साल में अलग अलग पार्टियों की ओर से जारी घोषणापत्र को उठा कर देखा जाए तो उन्हें देख कर हैरानी होगी कि इतनी बड़ी बड़ी घोषणाएं करने वाली पार्टियों वाला देश गरीब और पिछड़ा कैसे रह गया? देश में कैसे बेरोजगारी रह गई?

महिलाओं का उत्थान क्यों नहीं हुआ? दलित व आदिवासी समाज आगे क्यों नहीं बढ़ पाया? हर पार्टी के घोषणापत्र में ये समूह सबसे ऊपर जगह पाते हैं। इनके विकास और उत्थान की कसमें सारी पार्टियां खाती हैं। लेकिन जिसकी सरकार बनती है वह घोषणापत्र को लाल कपड़े में लपेट कर रख देता है और देश चलाने की राजनीतिक, कूटनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मजबूरियों के नाम पर उलटे सीधे फैसले करता है। उसे घोषणापत्र की याद फिर पांच साल बाद ही आती है।

तभी पिछले कुछ दिनों से यह अभियान चल रहा है कि चुनाव घोषणापत्र को कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाया जाए। यानी कानून बना कर ऐसा प्रावधान किया जाए कि अगर कोई पार्टी सत्ता में आती है और अपने घोषणापत्र में किए गए वादों को लागू नहीं करती है तो उसे अदालत में घसीटा जा सके और उसके ऊपर कानूनी कार्रवाई की जा सके।

हालांकि इस बारे में कोई ठोस पहल नहीं हुई है लेकिन अगर पहल हो और ऐसा कानून बन भी जाए तो इसकी गारंटी नहीं होगी कि पार्टियां इसके तहत जिम्मेदार ठहराई जाएंगी। वैसे भी तमाम नीतियों में बारीक अक्षरों में ऐसी बातें लिखी होती हैं, जिनसे बचाव का रास्ता निकलता है। कंपनियां भी अपना उत्पाद बेचने के लिए बड़े बड़े वादे करती हैं लेकिन साथ में स्टार मार्क लगा कर शर्तें लागू भी लिख देती हैं। उसी तरह अगर किसी समय घोषणापत्र को कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाया गया तो पार्टियां भी शर्तें लागू लिखने लगेंगी।

बहरहाल, विवाद पैदा करने के लिए ही सही लेकिन कांग्रेस के घोषणापत्र का मुद्दा बना है। पहले चरण के मतदान से पहले भाजपा का भी घोषणापत्र आएगा और उम्मीद करनी चाहिए कि उस पर भी चर्चा होगी। अगर किसी तरह से पार्टियों के घोषणापत्र की चर्चा होने लगे। जनता इतनी जागरुक हो जाए कि वह घोषणापत्र में किए गए वादों के लिए पार्टियों को जवाबदेह बनाए और उनसे सवाल पूछे तो निश्चित रूप से इससे देश का लोकतंत्र मजबूत होगा और देश भी विकास के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ेगा।

मुश्किल यह है कि लोकतंत्र में देश के लोगों की दिलचस्पी सिर्फ चुनाव भर के लिए होती है। उसके बाद वे अपने जीवन के जद्दोजहद में लग जाते हैं। उन्हें ध्यान ही नहीं रहता है कि उनका वोट लेने के लिए पार्टियों ने कुछ वादे किए थे और कुछ घोषणाएं की थीं। जिस दिन आम लोग पार्टियों के घोषणापत्र को गंभीरता से लेना और उस पर चर्चा करना शुरू करेंगे उसी दिन से लोगों के जीवन स्तर के सुधरने और विकास की रफ्तार तेज हो जाएगी।

यह भी पढ़ें:

चुनाव क्या सिर्फ औपचारिकता?

क्या सैनी से भाजपा के हित सधेगें?

Exit mobile version