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अंधकार से उजाले की ओर

वर्तमान समय में समाज बाह्य रूप से जितना अधिक आलोकित दिख रहा है, आंतरिक रूप से उतना ही अंधकारमय होता जा रहा है। बाह्य दीपोत्सव (भौतिक प्रकाश एवं सामाजिक दिखावा) का मूल प्रेरणा जहां बाह्य जगत की मान्यता, सामाजिक प्रतिष्ठा, उपभोक्तावाद है, वहीं आंतरिक दीपोत्सव (मानसिक स्वास्थ्य एवं आत्म परिष्कार) का मूल प्रेरणा है-  अंतःकरण की शुद्धि, आत्म संतोष, शाश्वत शांति।

असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतं गमय।

बृहदारण्यक उपनिषद का यह त्रिकालाबाधित महामंत्र केवल भौतिक प्रकाश की कामना नहीं है, अपितु यह मानव चेतना के गहनतम स्तरों पर घटित होने वाले मनोवैज्ञानिक रूपातरण का महाघोष है। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से दीपावली को बाह्य दीपों की कतारों, अमावस्या की सघन कालिमा पर विजय और सामाजिक उल्लास के रूप में देखा जाता रहा है, परंतु दार्शनिक और प्राचीन भारतीय ग्रन्थों के समीचीन अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि दीपावली मूलतः एक आंतरिक दीपोत्सव है। यह अंतर्मन के विक्षेपों, अवसाद के अंधकार और मानसिक संतापों से मुक्त होकर आत्म साक्षात्कार के परम प्रकाश की ओर बढ़ने की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है।

उल्लेखनीय है कि जब तक किसी सत्य को उसके शाश्वत, सार्वभौमिक और व्यावहारिक रूप में न परखा जाए, तब तक वह केवल एक कर्मकांड बनकर रह जाता है। वर्तमान इक्कीसवीं शताब्दी में जहां मनुष्य बाह्य सुख-सुविधाओं के चरमोत्कर्ष पर है, वहीं आंतरिक धरातल पर वह अत्यधिक खोखला, एकाकी और अवसादग्रस्त हुआ है। आज का युग यदि तकनीकी उन्नति का स्वर्णकाल है, तो यह वैश्विक मानसिक स्वास्थ्य संकट का सबसे भयावह कालखंड भी है। ऐसे समय में, सनातन वांग्मय के आलोक में आंतरिक दीपोत्सव की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और मनोविज्ञान ने अभी कुछ सदियों पूर्व ही मानसिक स्वास्थ्य को एक स्वतंत्र विषय के रूप में स्वीकार किया है। इसके विपरीत भारतीय ऋषियों ने सृष्टि के उद्भव काल से ही मन को मानव अस्तित्व का केंद्रीय धुरी माना है। यजुर्वेद के 34वें अध्याय में समाहित शिवसंकल्प सूक्त संसार का प्राचीनतम मनोवैज्ञानिक ग्रंथ माना जा सकता है। इसके मंत्रों में मन की शक्ति, उसकी चंचलता और उसके कल्याणकारी होने की प्रार्थना की गई है-

यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति।

दूरङ्गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु।।

यजुर्वेद 34/1

अर्थात- जो जाग्रत अवस्था में दूर-दूर तक चला जाता है, जो सुप्तावस्था में भी उसी प्रकार वापस लौट आता है, जो समस्त इंद्रियों का प्रकाशक और अद्वितीय है, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो।

यहां शिवसंकल्प का अर्थ ही है- सकारात्मक, रचनात्मक और मानसिक विकृतियों से रहित विचार प्रक्रिया। जब मन में अशिव (नकारात्मकता, अवसाद, ईर्ष्या) का प्रवेश होता है, तभी मानसिक अंधकार का जन्म होता है।

मैत्रायणी और ब्रह्मबिंदु उपनिषद में अंकित उपनिषद वचन- “मनः एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः” अत्यंत स्पष्ट रूप से प्रतिपादित करता है कि मन ही मनुष्य के बंधन (तनाव, अवसाद, दुःख) और मोक्ष (मानसिक शांति, आनंद, मुक्ति) का एकमात्र कारण है। उपनिषदों में मन के दो रूप बताए गए हैं- अशुद्ध मन और शुद्ध मन।

अशुद्ध मन- जो कामनाओं, वासनाओं और आसक्तियों से कलुषित है। आधुनिक मनोविज्ञान में इसे ही न्यूरोटिक या असंतुलित मानसिक अवस्था कहा जाता है।

शुद्ध मन- जो कामनाओं से रहित, शांत और सत्वगुण से ओतप्रोत है। यही पूर्ण मानसिक स्वास्थ्य की अवस्था है।

श्रीमद्भगवद्गीता और सांख्य दर्शन में प्रकृति के तीन गुणों-सत्व, रजस और तमस, का विस्तृत विवेचन मिलता है। मानसिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से, अवसाद, चिंता और अन्य मनोवैज्ञानिक व्याधियां मूलतः रजस और तमस के असंतुलन का परिणाम हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के सोलहवें अध्याय में मन के उन शत्रुओं को रेखांकित किया है, जो मनुष्य को अवसाद के गहन अंधकार में धकेलते हैं:

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।

कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ।।

-गीता 16/21

ये तीन विकार केवल नैतिक पतन के कारण नहीं हैं, बल्कि ये सीधे तौर पर न्यूरोकेमिकल असंतुलन उत्पन्न करते हैं। जब काम (अत्यधिक इच्छा) पूरी नहीं होती, तो क्रोध का जन्म होता है। क्रोध से सम्मोह (भ्रम) पैदा होता है, जिससे स्मृति नष्ट होती है और अंततः बुद्धि का नाश होता है (स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति)। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी मानता है कि अनवरत तनाव और क्रोध से शरीर में कोर्टिसोल नामक स्ट्रेस हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है, जो हमारे हिप्पोकैम्पस (मस्तिष्क का वह हिस्सा जो स्मृति और भावनाओं को नियंत्रित करता है) को संकुचित कर देता है।

महर्षि चरक ने चरक संहिता में स्पष्ट किया है कि शारीरिक रोगों की भांति मानसिक रोगों के भी विशिष्ट कारण होते हैं। उनके अनुसार, जब व्यक्ति की धी (बुद्धि), धृति (धैर्य) और स्मृति (याददाश्त) भ्रष्ट हो जाती है, तो वह प्रज्ञापराध करता है। यही प्रज्ञापराध समस्त मानसिक और शारीरिक व्याधियों की जड़ है।

वर्तमान समय में समाज बाह्य रूप से जितना अधिक आलोकित दिख रहा है, आंतरिक रूप से उतना ही अंधकारमय होता जा रहा है। बाह्य दीपोत्सव (भौतिक प्रकाश एवं सामाजिक दिखावा) का मूल प्रेरणा जहां बाह्य जगत की मान्यता, सामाजिक प्रतिष्ठा, उपभोक्तावाद है, वहीं आंतरिक दीपोत्सव (मानसिक स्वास्थ्य एवं आत्म परिष्कार) का मूल प्रेरणा है-

अंतःकरण की शुद्धि, आत्म संतोष, शाश्वत शांति।

बाह्य दीपोत्सव में प्रयुक्त साधन हैं- कृत्रिम लाइटें, मोमबत्तियां, भौतिक वस्तुएं, सोशल मीडिया तो आंतरिक दीपोत्सव की ध्यान, प्राणायाम, स्वाध्याय, विवेक-बुद्धि रूपी घृत हैं।

बाह्य दीपोत्सव का मनोवैज्ञानिक प्रभाव क्षणिक आह्लाद, जिसके पश्चात पुनः शून्यता और अवसाद संभव है, तो आंतरिक दीपोत्सव का, स्थायी मानसिक स्थिरता, समत्व भाव, आनंद की अनुभूति।

बाह्य दीपोत्सव में प्राचीन ग्रंथों का अधिष्ठान लौकिक उत्सव, सामाजिक समरसता (स्कंद पुराण) के रूप में होत्या है, तो आंतरिक दीपोत्सव में योग दर्शन (चित्तवृत्ति निरोध), उपनिषद् (आत्मज्ञान) का।

बाह्य दीपोत्सव की अंतिम परिणति अमावस्या की रात्रि का तात्कालिक अवसान के साथ होआ जाता है, वहीं आंतरिक दीपोत्सव का मूल अज्ञान और मोह जनित आंतरिक तमस का आत्यंतिक उन्मूलन होता है।

महर्षि पतंजलि का योग सूत्र मानसिक स्वास्थ्य को अक्षुण्ण रखने का सबसे व्यावहारिक और वैज्ञानिक मार्गदर्शक है। योग दर्शन का दूसरा ही सूत्र है-योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।

चित्त की वृत्तियों (मन के उतार-चढ़ाव, विचारों के भंवर) का शांत होना ही योग है, और यही परम मानसिक स्वास्थ्य है। पतंजलि ने नौ प्रकार के चित्त विक्षेपों की पहचान की है, जिन्हें आधुनिक भाषा में मानसिक रोग कहा जा सकता है-

व्याधि (शारीरिक रोग), स्त्यान (मानसिक अकर्मण्यता), संशय (अनिर्णय की स्थिति), प्रमाद (लापरवाही), आलस्य, अविरति (विषयासक्ति), भ्रान्तिदर्शन (मतिभ्रम), अलब्धभूमिकत्व (एकाग्रता न मिल पाना), और अनवस्थितत्व (स्थिर न रह पाना)।

इन विक्षेपों के कारण मनुष्य के भीतर चार सह भुवः (सहगामी दुःख) उत्पन्न होते हैं-

दुःख (मानसिक या शारीरिक संताप), दौर्मनस्य (इच्छा पूरी न होने पर मन का खिन्न होना), अङ्गमेजयत्व (शारीरिक कंपन या घबराहट) और श्वासप्रश्वास (अनियंत्रित सांसें या पैनिक अटैक) ।

इन मानसिक दुखों से मुक्ति और चित्त को प्रसन्न (चित्तप्रसादनम्) करने के लिए पतंजलि ने एक अद्भुत सामाजिक-मनोवैज्ञानिक सूत्र दिया है-

मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां

भावनातश्चित्तप्रसादनम्।।

-योगसूत्र 1/33

अर्थात- सुखियों के प्रति मैत्री (दोस्ती) का भाव रखने से ईर्ष्या का नाश होता है। दुखियों के प्रति करुणा (दया) रखने से अहंकार गलता है। पुण्यात्माओं को देखकर मुदिता (प्रसन्नता) का भाव रखने से द्वेष समाप्त होता है। अपकारियों या पापियों के प्रति उपेक्षा (उदासीनता) का भाव रखने से क्रोध और प्रतिशोध की अग्नि शांत होती है।

यह सूत्र मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने के लिए किसी भी आधुनिक कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी से कहीं अधिक व्यावहारिक और अचूक है।

 

दीपावली के इस पावन प्रसंग में, जब हम आंतरिक दीपोत्सव की बात करते हैं, तो हमें पारंपरिक दीपक के घटकों को आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक रूपकों में समझना होगा।

मृत्तिका पात्र (मिट्टी का दीया) हमारा स्थूल शरीर और अंतःकरण है। जब तक यह शरीर स्वस्थ और पवित्र नहीं होगा, तब तक इसमें ज्ञान की लौ नहीं जल सकती।

घृत या तैल (घी या तेल) हमारी श्रद्धा, भक्ति और सत्वगुण का प्रतीक है। जैसे बिना तेल के दीपक नहीं जल सकता, वैसे ही बिना सकारात्मक भावनाओं और श्रद्धा के मन का अंधकार दूर नहीं हो सकता।

वर्तिका (बत्ती) हमारी एकाग्र चेतना और सुसुम्णा नाड़ी का प्रतीक है। यह ऊर्ध्वगामी होनी चाहिए, अर्थात् हमारी ऊर्जा निम्न विकारों से ऊपर उठकर उच्च चेतना की ओर बढ़े।

अग्नि (लौ) विवेक-बुद्धि और आत्मज्ञान है। यही वह प्रकाश है जो संशय, मोह और अज्ञान रूपी तमस को भस्म करता है।

जब ये चारों घटक सही अनुपात में मिलते हैं, तब आंतरिक दीपोत्सव घटित होता है। शंकराचार्य ने अपने विवेकचूडामणि में कहा है कि आत्म-ज्ञान रूपी दीपक के जलते ही करोड़ों जन्मों का संचित अंधकार क्षणमात्र में विलीन हो जाता है।

आज के समय में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति कितनी चिंताजनक है, इसे केवल दार्शनिक दावों से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों से समझना होगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्टों के अनुसार, वर्तमान में विश्व का हर आठवां व्यक्ति किसी न किसी मानसिक विकार से ग्रसित है। भारत में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका विज्ञान संस्थान के सर्वेक्षण बताते हैं कि लगभग 15% भारतीय वयस्कों को किसी न केवल मानसिक स्वास्थ्य सहायता की आवश्यकता है, बल्कि अवसाद के कारण आत्महत्या की प्रवृत्तियों में भी भयानक वृद्धि हुई है। आधुनिक तंत्रिका विज्ञान अब यह स्वीकार कर रहा है कि प्राचीन भारतीय ऋषियों द्वारा प्रतिपादित ध्यान, मंत्र जप और प्राणायाम की विधियां मस्तिष्क की संरचना को बदल सकती हैं। इस प्रक्रिया को न्यूरोप्लास्टिसिटी कहते हैं। जब हम आंतरिक दीपोत्सव की साधना, जैसे- त्राटक, माइंडफुलनेस या विपश्यना करते हैं, तो मस्तिष्क का एमीगडाला, जो भय और तनाव को नियंत्रित करता है, शांत हो जाता है, और प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स, जो निर्णय क्षमता, शांति और आनंद के लिए उत्तरदायी है, अधिक सक्रिय हो जाता है। यह प्राचीन अध्यात्म और आधुनिक विज्ञान का एक अत्यंत सुंदर समन्वय है।

मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि वह सोचता है कि बाहर के दीये जलाकर वह अपने भीतर के अंधेरे को छिपा सकता है। यह एक कटु परंतु शाश्वत सत्य है कि जब तक भीतर का मानस-पटल अशांत है, तब तक महल की चकाचौंध भी फीकी और बोझिल प्रतीत होगी। राम का अयोध्या आगमन और दीप जलाना वास्तव में इस बात का प्रतीक है कि जब विवेक रूपी राम हमारे हृदय सिंहासन पर पुनः आरूढ़ होते हैं, तभी हमारी दसों इंद्रियां (अयोध्या) प्रकाशमान होती हैं। इसके विपरीत, जब तक अहंकार और वासना रूपी रावण का राज रहेगा, तब तक अंतःकरण में लंका जैसा दहन और अशांति ही व्याप्त रहेगी। दीपावली का वास्तविक संदेश यही है कि हम प्रतिवर्ष अपने भीतर झांकें, कचरे को साफ करें, और आत्म-निरीक्षण के द्वारा एक नया दीपक प्रज्वलित करें।

अंधकार से उजाले की ओर की यह यात्रा किसी काल्पनिक लोक की यात्रा नहीं है, यह अत्यंत व्यावहारिक और हमारे दैनिक जीवन से जुड़ी है। इस दीपावली पर जब हम अपने घरों को दीपों से सजाएं, तो साथ ही अपने मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने के लिए इस आंतरिक दीपोत्सव की त्रिसूत्रीय योजना को भी जीवन में उतारें- स्वाध्याय, प्राण संयम और समत्व भाव।

प्रतिदिन कुछ समय प्राचीन ग्रंथों, जैसे- भगवद्गीता, उपनिषद् या योगसूत्र के अध्ययन में लगाएं। यह हमारे विचारों को रिप्रोग्राम करने और मानसिक कूड़े को हटाने का अचूक साधन है।

प्राण संयम, अर्थात श्वास की गति का हमारे विचारों से सीधा संबंध है। नियमित अनुलोम-विलोम और भ्रामरी प्राणायाम करने से चित्त के विक्षेप शांत होते हैं और अवसाद का तमस दूर होता है।

जीवन के लाभ-हानि, सुख-दुःख में गीता के समत्व योग (समत्वं योग उच्यते) को धारण करें। यह मानसिक लचीलापन ही हमें अवसाद के गहरे गर्त में गिरने से बचाता है।

आइए, इस दीपोत्सव पर हम केवल देहरी पर ही नहीं, बल्कि अपने अंतस के सूने कोनों में भी एक दीया जलाएं। ऐसा दीया जो कभी न बुझे, जो हमें हर परिस्थिति में शांत, स्थिर और आनंदित रखे।

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By अशोक 'प्रवृद्ध'

सनातन धर्मं और वैद-पुराण ग्रंथों के गंभीर अध्ययनकर्ता और लेखक। धर्मं-कर्म, तीज-त्यौहार, लोकपरंपराओं पर लिखने की धुन में नया इंडिया में लगातार बहुत लेखन।

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