सोवियत खेमा ढहने के बाद से अब तक जितना धन उत्पन्न हुआ, उतना इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था। पर यह धन बहुत ही सीमित लोगों के पास इकट्ठा हो गया है।…ऐसे में उत्पन्न धन के लाभ से वंचित समुदायों में पूंजीवाद के प्रति असंतोष बढ़ना लाजिमी है। फिलहाल, नफरत के एजेंडे में लोगों को उलझा कर शासक वर्ग विकल्प की चर्चा को मुख्यधारा से दूर रखे हुए हैं। लेकिन ऐसा करना अनिश्चित काल तक संभव नहीं होगा। तभी इस बार दावोस में जुटी हस्तियों के चेहरे से हंसी-खुशी गायब रही।
दुनिया की सबसे बड़ी एसेट मैनेजमेंट कंपनी ब्लैकरॉक के सीईओ लैरी फिंक ने दावोस में वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम (WEF)- 2026 में जुटे दुनिया भर से सबसे बड़े पूंजीपतियों से मुखातिब होकर आगाह किया कि पूंजीवाद औचित्य (legitimacy) के संकट में जूझ रहा है। फिंक अब WEF के सह-अध्यक्ष भी हैं। इस वर्ष के मुख्य संबोधन में उन्होंने कहाः
- बर्लिन की दीवार गिरने (यानी सोवियत खेमा ढहने) के बाद से अब तक जितना धन उत्पन्न हुआ, उतना इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था। लेकिन “एक स्वस्थ समाज” निर्मित करने के बजाय यह धन बहुत ही सीमित लोगों के पास इकट्ठा हो गया है।
- उन्होंने कहा कि प्रासंगिक बने रहने के लिए (पूंजीपतियों के) इस मंच को जनता का विश्वास फिर से जीतना होगा। इसे एक इको चैंबर (जहां केवल एक जैसे विचार गूंजते हों) बनने से बचना होगा।
- फिंक ने आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) को आधुनिक पूंजीवाद के लिए एक बड़ी परीक्षा बताया। चेतावनी दी कि एआई का लाभ केवल मॉडल, डेटा और इसके बुनियादी ढांचे के मालिकों तक सीमित रहा और इसने बड़े पैमाने पर ह्वाइट कॉलर कर्मियों की नौकरी खाई, तो यह भूमंडलीकरण से पैदा हुई असमानता जैसी गलती को दोहराना होगा।
ये भाषण गवाह है कि पूंजीवाद के सर्वोच्च संचालकों को अहसास है कि आम जन की निगाह में उनकी व्यवस्था तेजी से अपनी साख गंवाती जा रही है। जिस भूमंडलीकरण को सबकी समृद्धि का मंत्र बताया गया था, वह असल में चंद धनी तबकों के अति धनी बनने का जरिया साबित हुआ है।
आखिर किसी व्यवस्था की साख तब तक ही कायम रहती है, जब तक उसके सबके हित में होने की धारणा बनी रहती है। जब ऐसा नहीं होता, तो लोग उसके औचित्य पर सवाल उठाते हैं। लोग पूछते हैं कि आखिर उस व्यवस्था को जारी रखने में उनका क्या लाभ है? और फिर लोग इस पर विचार करना शुरू करते है कि उस व्यवस्था का विकल्प क्या है? लैरी फिंक की टिप्पणियां बताती हैं कि बड़े पूंजीपति इस संभावना से भयभीत हैं।
WEF के मौके पर अंतरराष्ट्रीय (मूल रूप से ब्रिटिश) गैर-सरकारी संस्था ऑक्सफेम ने फिर बढ़ती गैर-बराबरी पर अपनी रिपोर्ट जारी की। मगर इस बार इसमें एक खास पहलू शामिल है। पहले की तरह इसमें सिर्फ ऐसे आंकड़े नहीं दिए गए हैं कि कितनी संपत्ति टॉप एक प्रतिशत आबादी के पास और इकट्ठी हो गई है या कितने नए अरबपति बन गए हैं। ना ही रिपोर्ट विषमता पर काबू पाने के लिए ऐसे सिर्फ कुछ नीतिगत सुझावों तक सीमित रही है, जिन्हें लागू करने की उम्मीद सरकारों से रखी जाती है। बल्कि रिपोर्ट की भाषा से आभास हुआ कि सरकारों से ऐसे कदमों की उम्मीद अब ऑक्सफेम जैसी संस्थाओं को भी नहीं है।
ऑक्सफेम ने अपनी रिपोर्ट का शीर्षक- ‘अमीरों के राज का प्रतिरोधः अरबपतियों की शक्ति से स्वतंत्रता की रक्षा’ रखा है। उसने कहा- ‘इस बात से कम लोग ही असहमत होंगे कि जब अरबपति अपने धन से किसी राजनेता को खरीदते हैं, सरकार को प्रभावित करते हैं, अखबार या सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म के मालिक बन जाते हैं या (अदालतों में) वकीलों की कतार जुटा कर दूसरे पक्ष को पराजित करते हुए यह सुनिश्चित कर देते हैं कि वे कानून के ऊपर हैं, तो उनके ऐसे कदमों से प्रगति और न्याय की संभावना कमजोर होती है। अरबपतियों की ऐसी ताकत हमारे भविष्य पर उनका नियंत्रण कायम कर देती है, और राजनीतिक स्वतंत्रता तथा हमारे अधिकारों को खोखला बना देती है।’
तो ऑक्सफेम इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि ‘आंदोलनों और संगठनों के बीच एकजुटता एवं सहयोग कायम करना अनिवार्य हो गया है। अपने अधिकारों की रक्षा, अधिक समानता आधारित दुनिया के निर्माण, तथा विषमता एवं कुलीनतंत्र (oligarchy) के खात्मे की मांग करने के लिए हमें मिल-जुल कर विश्व-व्यापी आंदोलन खड़ा करना होगा।’
गौरतलब है कि ऑक्सफेम अब निष्कर्ष पर पहुंचा है कि गैर-बराबरी बढ़ने की वजहें ढांचागत (structural) हैं। आज दुनिया की कुल दौलत में अरबपतियों की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ रही है, तो उसकी वजहें सिर्फ बाजार तक सीमित नहीं हैं। बल्कि अरबपति अब सीधे सरकारी नीतियों और फैसलों को प्रभावित कर रहे हैं, जिससे लोकतंत्र कमजोर हो रहा है।
अरबपति और बड़ी कंपनियां वैध और अवैध तरीकों से टैक्स चुकाने से बच निकलते हैं, तो जाहिर है, ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि इसमें राजनीतिक-आर्थिक ढांचे सहायक बनते हैं। कुल मिलाकर ऑक्सफैम की ताजा रिपोर्ट एक राजनीतिक मांग-पत्र की तरह है, जिसे केंद्र में रख कर उसने विश्व-व्यापी जन संघर्ष का आह्वान किया है।
यहां इस बात का उल्लेख अवश्य कर लेना चाहिए कि ऑक्सफेम पारंपरिक अर्थ में एक एनजीओ है। यह उन संस्थाओं के तंत्र का हिस्सा रहा है, जिनका मकसद पूंजीवाद को मानवीय चेहरा प्रदान करना है। अपनी छवि पर समाजवाद या साम्यवाद का साया ना पड़े, इसके लिए ऑक्सफेम जैसी संस्थाएं हमेशा सचेत रही हैं। उसे चंदा देने वाले स्रोतों के नाम पर गौर करें, तो उसमें यूएसएड, यूकेएड आदि जैसी संदिग्ध छवि वाली पश्चिमी सरकारों की एजेंसियां और बड़े कॉरपोरेट घराने भी शामिल नजर आएंगे। इसीलिए ऑक्सफेम का आर्थिक विषमता को ढांचागत समस्या कहना और उस पर नियंत्रण के लिए जन आंदोलनों से उम्मीद जोड़ना महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
ठीक उसी तरह जैसे वित्तीय पूंजीवाद की सबसे बड़ी संचालक कंपनियों में एक के सीईओ- लैरी फिंक- का यह कहना कि पूंजीवाद के सामने आज औचित्य का संकट है। यानी इस बिंदु पर आकर फिंक और ऑक्सफेम की चिंताएं जुड़ जाती हैं। दोनों यह समझते हैं कि अपने मौजूदा रूप के साथ पूंजीवाद अपनी साख कायम नहीं रख सकता। और ऐसा नहीं होने पर जनता के बहुसंख्यक हिस्सों में वैकल्पिक मॉडल्स का आकर्षण बढ़ सकता है।
औचित्य अथवा वैधता के संकट (Legitimacy Crisis) का स्पष्ट अर्थ है कि व्यवस्था के नैतिक, न्यायसंगत, और टिकाऊ होने के बारे में बहुसंख्यक जनता का भरोसा घटता जा रहा है। क्यों?
- थॉमस पिकेटी जैसे (पूंजीवाद को सीधे चुनौती ना देने वाले) अर्थशास्त्रियों ने अपने शोध से दिखाया है कि इस दौर में प्रतिस्पर्धा, आविष्कार और मेहनत से लोग या कंपनियां आगे नहीं बढ़ रहे हैं। बल्कि पूंजीवाद ने रेंटियर रूप ग्रहण कर लिया है। पूंजी या संपत्ति पर रेंट अथवा रिटर्न की दर आर्थिक विकास की दर से अधिक हो चुकी है। नतीजतन, जिसके पास जितना पैसा है, वह उतनी अधिक रफ्तार से और धनी हो रहा है। इससे असमानता बढ़ी है, जो सामाजिक गतिशीलता को रोकते हुए समाज में विभाजन पैदा कर रही है।
- 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट इस बात का प्रमुख उदाहरण है कि कैसे अनियंत्रित बाजार और जोखिम भरे वित्तीय व्यवहार पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को अस्थिर कर सकते हैं। 2008 की मंदी का आम लोगों के रोजगार और बचत पर गहरा प्रभाव पड़ा, जबकि वित्तीय संस्थाओं और बड़ी कंपनियों को सरकारी सहायता (बेलआउट) से बचा लिया गया। इससे व्यवस्था के प्रति आम लोगों में जो नाराजगी पैदा हुई, वह गुजरते वक्त के साथ बढ़ती चली जा रही है।
- पूंजीवाद की “अधिकतम मुनाफा” कमाने की प्रकृति के श्रमिक वर्ग के शोषण और जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारण हैं, यह बात अब सामान्य लोगों के भी समझ में आने लगी है। अनियंत्रित उपभोग और उत्पादन पर आधारित इस मॉडल के कारण धरती की क्षमताओं से आगे जाकर प्रकृति का दोहन किया जा रहा है। स्पष्टतः ये व्यवस्था जलवायु के नजरिए से भी टिकाऊ नहीं रह गई है।
- भूमंडलीकरण और मुनाफे के लिए आधुनिक टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल की वजह से स्थायी रोजगार का चलन कम हुआ है। गिग इकोनॉमी, ठेका प्रथा आदि के कारण श्रमिकों की मजदूरी, सुरक्षा, और सम्मान पर दबाव बढ़ा है। इससे श्रमिक वर्ग में असुरक्षा और असंतोष पनपने के संकेत चारों ओर से मिल रहे हैं।
- जैसाकि ऑक्सफेम ने भी कहा है, पूंजीपति वर्ग अपनी आर्थिक शक्ति का इस्तेमाल राजनीतिक प्रक्रियाओं को नियंत्रित या प्रभावित करने के लिए कर रहा है। बड़ी कंपनियां और धनपति लॉबिंग, चुनावी फंडिंग और मीडिया नियंत्रण के जरिए राजसत्ता को प्रभावित कर रहे हैं। ये परिघटना लोकतंत्र की मूल भावना के लिए चुनौती बन गई है।
ये वो वजहें हैं, जिनसे पूंजीवाद के औचित्य पर सवाल गहराए हैं। मगर संकट इतना भर ही नहीं है। असल मुद्दा इस बात की पुष्टि हो जाना है कि पूंजीपतियों के धन संग्रहण की प्रवृत्ति वो कारण है, जिससे उत्पन्न धन के लाभ से समाज के बहुसंख्यक हिस्सें वंचित अवस्था में रहते हैं। इस कारण उनकी उपभोग क्षमता घटती है, जिससे बाजार में मांग गिरती है। नतीजतन, पूंजी के निवेश की गुंजाइश घटती है। इस कारण मुनाफे की दर गिरती चली जाती है। इसकी भरपाई के लिए पूंजीपति संसाधनों का और अधिक संग्रहण करते हैं। जाहिर है, ऐसा दूसरे तबकों को वंचित करते हुए ही किया जाता है। यह एक दुश्चक्र बन जाता है। आज दुनिया उसी अवस्था में पहुंची हुई है।
एक दौर में उदारीकरण, निजीकरण एवं भूमंडलीकरण- यानी नव-उदारवादी की नीतियों को बढ़ावा देकर पूंजीपतियों के मुनाफे में लगातार वृद्धि को सुनिश्चित किया गया। लेकिन उन नीतियों का परिणाम 2008 में बाजार ढहने और उसके बाद शुरू हुई लंबी मंदी (long depression) के रूप में सामने आया, जिससे दुनिया आज तक उबर नहीं पाई है। तो आखिरकार पूंजीवाद के केंद्र पर स्थित देशों- खासकर उनके नेता अमेरिका ने “नियम-आधारित” उस व्यवस्था को दरकिनार करना शुरू किया, जिसे उसके नेतृत्व में ही लागू किया गया था। अब वो दौर है, जब अमेरिकी ‘शासक वर्ग’ अपने मुनाफे को सुनिश्चित करने के लिए खुलेआम युद्ध पर उतर आए हैं। इस क्रम में वे प्रतिस्पर्धी, सहयोगी, साथी आदि सबका भेद भूल गए हैं।
मगर उनका यह तरीका पूंजीवाद की साख में और कीलें ठोक रहा है। इसकी चुभन का अहसास दावोस पर छाया रहा। स्लोवेनिया के प्रधानमंत्री रॉबर्ट फीको ने अपने भाषण में जिक्र किया कि दावोस में हर कोई चिंतित और उदास नजर आ रहा है, कोई भी खुश नहीं आता। बहरहाल, बड़ा सवाल है कि साख और वैधता के गहराते प्रश्नों से अवगत नेता क्या पूंजीवाद को इस संकट से निकाल पाएंगे?
एक मिथक प्रचलित है कि पूंजीवाद संकट से घिरता है, लेकिन वह कुछ ऐसा आविष्कार करता है, जिससे वह संकट से निकल जाता है। इस धारणा में बहुत से लोगों का ऐसा यकीन है कि पूंजीवाद के संकट की चर्चा सुनते ही वे इसे कम्युनिस्टों का ‘घिसा-पिटा’ जुमला बता देते हैं। इस क्रम में अक्सर यह भी कह दिया जाता है कि पूंजीवाद तो चलता ही जा रहा है, जबकि उसके विकल्प के रूप में उभरा समाजवाद ढह चुका है (यानी सोवियत खेमा बिखर गया और चीन ने कथित रूप से अपना रास्ता बदल लिया)।
मगर ये मुद्दा तू तू- मैं मैं का नहीं है। यह गंभीर विवेचना का विषय है। पूंजीवाद के सामने सिर्फ एक बार ऐसी चुनौती आई, जिससे उसके सामने कुछ नया गढ़ने की मजबूरी बनी। यह चुनौती 1917 में रूस में बोल्शेविक क्रांति से पेश आई। इसके जवाब में पूंजीवाद ने सोशल डेमोक्रेसी का आविष्कार किया। पूंजीवाद के गढ़ देशों ने यह संदेश देने के लिए कि बिना क्रांति के भी श्रमिक वर्ग सहित सबका भला किया जा सकता है, कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को जन्म दिया। इसके तहत इस मार्क्सवादी समझ को चुनौती देने के प्रयास किया गया कि असल में राज्य शासक वर्ग के हित साधने का उपकरण है, जिस पर नियंत्रण किए बिना श्रमिक वर्ग के हितों की रक्षा नहीं हो सकती। इसके बदले यह सोच फैलाई गई कि राज्य की भूमिका सभी सामाजिक वर्गों के हितों में तालमेल बैठाते हुए ऐसी नीतियों पर अमल सुनिश्चित करना है, जिससे सबका भला हो।
लेकिन राज्य की ये भूमिका तभी तक कायम रही, जब तक कम्युनिज्म का खतरा पूंजीपतियों के सिर पर मंडराता रहा। जब उन्हें अहसास हुआ कि ये खतरा टल गया है, तो श्रमिक वर्गों को दी गई रियायतें उन्होंने क्रमिक रूप से वापस ले लीं। नतीजा अनियंत्रित पूंजीवाद है, जिसके औचित्य के संकट की बात आज हो रही है।
इस सिलसिले में दो बातें ध्यान में रखनी चाहिए। तब पूंजीवाद उपरोक्त समाधान निकाल पाया था, तो इसलिए कि पूंजीवादी देशों के पास उपनिवेशवाद एवं नव-साम्राज्यवाद से पूरी दुनिया से अतिरिक्त मूल्य के संग्रहण की सुविधा थी। उपनिवेशवाद के प्रत्यक्ष खात्मे के साथ अनेक पूंजीवादी देशों के हाथ से वो सुविधा निकल गई। अमेरिका के पास ‘असमान विनिमय’ (unequal exchange) के जरिए वह सुविधा अब भी है, लेकिन चीन का उदय उसकी इस क्षमता को तेजी से सीमित कर रहा है।
दूसरी बात यह कि आधुनिक तकनीक के विकास-क्रम में पूंजीवाद लगातार अग्रणी बना रहा था। औद्योगिक क्रांति के पहले तीन चरण में उसकी अग्रणी भूमिका रही। मगर चौथे चरण की तकनीकों- आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, रोबोटिक्स, क्वांटम कंप्यूटिंग, बायोटेक, ग्रीन एनर्जी- आदि में कई में चीन अग्रणी हो चुका है। जिनमें वह अग्रणी नहीं है, वह अमेरिका से लगभग बराबरी के स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर रहा है।
इन दोनों पहलुओं के कारण पूंजीवाद के गढ़ देशों की चुनौतियां बढ़ गई हैँ। इसलिए इस बार के संकट का समाधान ढूंढ लेना उसके लिए आसान नहीं है। ऐसे में उत्पन्न धन के लाभ से वंचित समुदायों में पूंजीवाद के प्रति असंतोष बढ़ना लाजिमी है। फिलहाल, नफरत के एजेंडे में लोगों को उलझा कर शासक वर्ग विकल्प की चर्चा को मुख्यधारा से दूर रखे हुए हैं। लेकिन ऐसा करना अनिश्चित काल तक संभव नहीं होगा। इसीलिए इस बार दावोस में जुटी हस्तियों के चेहरे से हंसी-खुशी गायब रही।


