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विकास की गाथा नहीं पचा पा रही कांग्रेस

यह बड़े आश्चर्य की बात है और संभवतः पूरे विश्व में किसी और देश में ऐसा नहीं होता होगा कि देश के विपक्ष को देश का विकास पसंद नहीं आए! यह आश्चर्य भारत में प्रायः घटित होने लगा है। जब भी भारत के विकास के आंकड़े आते हैं तो विपक्ष उस पर सवाल उठाने लगता है। जब भी भारत विश्व मंच पर अपनी छाप छोड़ने वाला कोई बड़ा काम करता है तो विपक्ष को उस पर आपत्ति हो जाती है। जब भी भारत कोई बड़ी उपलब्धि हासिल करता है तो विपक्ष उसमें कमी निकालने लगता है। यह कितने दुर्भाग्य की बात है कि भारत का विपक्ष इतना गैरजिम्मेदार और सत्ता के लिए लालची हो गया है कि वह भारत के विकास के प्रयासों के विफल होने की कामना करता है। जब भी दुनिया में कोई संकट आता है तो वह चाहता है कि भारत इस संकट से तबाह हो जाए। और जब भारत हर संकट से उबर जाता है तो वह न सिर्फ निराश होता है, बल्कि प्रत्यक्ष दिख रही उपलब्धियों पर भी सवाल उठाने लगता है।

सबसे ताजा मामला आर्थिक विकास का है। अभी भारत की आर्थिक विकास का आंकड़ा जारी हुआ है। केंद्र सरकार के सांख्यिकी विभाग ने सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के आंकड़े जारी किए हैं और बताया है कि चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून के बीच भारत की विकास दर 7.8 प्रतिशत रही। भारतीय रिजर्व बैंक ने उस तिमाही में सात प्रतिशत की दर से विकास की उम्मीद जताई थी। लेकिन उसकी उम्मीद से भी बहुत ज्यादा विकास दर रही। जैसे ही यह आंकड़ा जारी हुआ वैसे ही कांग्रेस और उसके विघ्नसंतोषी अर्थशास्त्री इसमें कमी निकालने लगे।

पहले तो विपक्ष को कुछ समझ में नहीं आया कि कैसे इसकी आलोचना करें। तो उसने कृषि और माइनिंग जैसे सेक्टर में विकास दर कम रहने का मुद्दा उठा कर सरकार की आलोचना की। लेकिन जैसे ही एक रिटायर आईएएस अथिकारी ने आंकड़ों की बाजीगरी करके कहा कि विकास दर 7.8 फीसदी नहीं, बल्कि 2.6 फीसदी है वैसे ही कांग्रेस के नेता बल्लियों उछलने लगे औऱ उसी आधार पर देश के आंकड़े को गलत साबित करने में जुट गए।

वास्तविकता यह है कि केंद्र सरकार ने अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के मुताबिक पिछले कुछ दिनों में महंगाई का आकलन करने का पैमाना बदला और उसी तरह विकास दर के आकलन का पैमाना बदला। यह कितने आश्चर्य की बात है कि अभी तक 2011-12 के आधार वर्ष पर विकास दर का आकलन होता था। उस समय तक यूपीआई के जरिए भुगतान शुरू नहीं हुआ था। उस समय तक देश में वस्तु व सेवा कर यानी जीएसटी की व्यवस्था नहीं लागू हुई थी।

उस समय तक ई कॉमर्स की कंपनियां काम नहीं कर रही थीं और अगर कर भी रही थीं कि किताब आदि की बिक्री का एकाध प्लेटफॉर्म बना था। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर यानी डीबीटी की व्यवस्था भी नहीं शुरू हुई थी। कहने का आशय है कि आज से 15 साल पहले देश की जैसी अर्थव्यवस्था थी उससे अब काफी बदलाव आ चुका है। इसलिए 15 साल पहले के मानकों पर अर्थव्यवस्था का आकलन कभी भी वास्तविक तस्वीर सामने नहीं ला सकता है।

इसलिए सरकार ने विकास दर के आकलन का आधार वर्ष बदला। ध्यान रहे पहले भी एक निश्चित अंतराल पर आधार वर्ष बदला जाता था। अब प्रश्न है कि क्या बदले हुए आधार वर्ष के आधार पर जब इस वित्त वर्ष के विकास दर का आकलन किया जाएगा तो उसकी तुलना पुराने आधार वर्ष पर आधारित आंकड़ों से होगी या नए आधार वर्ष के आंकड़ों पर? वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इसी को लेकर कहा था कि सेब की तुलना संतरे से नहीं करनी चाहिए। देश के आम लोगों को समझने में हालांकि कोई समस्या नहीं है। समस्या कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों को है। नए आधार वर्ष के आधार पर वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही का जीडीपी का आंकड़ा 80 लाख करोड़ रुपए का था और 2026-27 की पहली तिमाही का आंकड़ा 88 लाख करोड़ रुपए का है।

इस आधार पर यह वास्तविक आंकड़ा है कि देश की विकास दर 7.8 फीसदी रही है। इस पर खुश होने और देश की प्रगति को स्वीकार करने की बजाय कांग्रेस देश को बदनाम करने वाली ताकतों की ओर से फैलाई जा रही बातों का प्रचार कर रही है। वैसे भी बात सिर्फ विकास दर की नहीं है। महंगाई की दर नियंत्रण में है, वित्तीय घाटा काबू में है और ब्याज दरें भी नियंत्रण में हैं। यानी अर्थव्यवस्था की बुनियाद मानक पूरी तरह से ठीक हैं।

यह अनायास नहीं है कि भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने कहा कि दुनिया के कई देश भारत और अमेरिका की दोस्ती से जलते हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अगर किसी नेता से मिलना चाहते हैं तो उसमें सबसे ऊपर नाम भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का है। यह दुनिया में भारत की बढ़ती ताकत का संकेत है। इसी वजह से दुनिया के बहुत से देश, बहुत सी संस्थाएं और सनातन विरोधी ताकतें भारत को पीछे खींचना चाहती हैं। वे भारत की हर उपलब्धि पर प्रश्नचिन्ह लगा कर देश की जनता को गुमराह करने का प्रयास करती हैं। उन्हीं ताकतों ने भारत की विकास गाथा को कमजोर करने का प्रयास किया है और भारत की हर उपलब्धि को कमतर बताने की कोशिश की है।

असल में भारत विरोधी ताकतों को इस बात का आश्चर्य है कि एक के बाद एक वैश्विक घटनाओं के बावजूद भारत में विकास की रफ्तार कम नहीं हो रही है। पहले कोरोना की महामारी आई, जिसका भारत ने सफलता के साथ मुकाबला किया। उसके तुरंत बाद रूस और यूक्रेन में युद्ध छिड़ गया। अभी वह युद्ध चल ही रहा था कि अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर हमला बोल दिया। अभी रूस और यूक्रेन का युद्ध भी चल रहा है और ईरान व अमेरिका की लड़ाई भी चल रही है। जब ईरान और अमेरिका का युद्ध शुरू हुआ तो विपक्षी पार्टियां मानने लगी थीं कि अब तो भारत की हालत बहुत खराब होगी। उनको लग रहा था कि भारत अब कहां से अपने ईंधन की व्यवस्था करेगा, कैसे देश के घरों में चुल्हा जलेगा, कैसे फैक्टरियों में से धुआं निकलेगा, ट्रेनें और विमान कैसे चलेंगे लेकिन उनकी मंशा पूरी नहीं हुई।

इतने बड़े वैश्विक संकट में भी भारत आराम से चलता रहा। लोगों को थोड़ी बहुत समस्या हुई भी तो लोगों ने देश के प्रधानमंत्री पर भरोसा किया। प्रधानमंत्री ने इस संकट के बहाने भारत की ईंधन आपूर्ति की व्यवस्था में विविधिता लाने का सफल प्रयास किया। आज भारत सबसे ज्यादा अमेरिका, वेनेजुएला और अफ्रीकी देशों ने कच्चा तेल और एलपीजी आयात कर रहा है। अब खाड़ी के देशों पर भारत की निर्भरता कम हो रही है। इसी तरह अमेरिकी पाबंदी के बावजूद भारत रूस से कच्चा तेल खरीदता रहा। भारत ने दो टूक शब्दों में कह दिया कि वह अपनी ईंधन सुरक्षा के लिए कोई भी फैसला करने को स्वतंत्र है।

इतना ही नहीं इतने बड़े वैश्विक आर्थिक संकट में भी भारत का विदेशी मुद्रा भंडार भरा है और जन कल्याण की सारी योजनाएं पहले जैसी चल रही हैं। कोई भी योजना न तो बंद की गई और न उनकी राशि में कटौती की गई। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर की योजनाएं भी चलती रहीं। सरकार ने ईंधन और रासायनिक खाद की उपलब्धता सुनिश्चित की, उस पर सब्सिडी जारी रखी और उसकी कीमतों को नियंत्रण में रखा। तभी चाहे देश की ईंधन सुरक्षा का मामला हो या खाद्यान्न सुरक्षा का मामला हो या किसानों के हितों की रक्षा का मामला हो, सरकार ने सब सुनिश्चित किया। संकट प्रबंधन के साथ साथ भारत सरकार ने भारत को आत्मनिर्भर बनाने और मेड इन इंडिया उत्पादों को पूरी दुनिया में पहुंचाने के लिए दुनिया के अनेक देशों के साथ मुक्त व्यापार संधि के प्रयास जारी रखे हैं।

अनेक देशों के साथ भारत ने मुक्त व्यापार संधि कर ली है और अमेरिका, कनाडा सहित कई देशों के साथ संधि की वार्ता निर्णायक चरण में है। इन सब प्रयासों का परिणाम भी आगे के आर्थिक विकास के आंकड़ों में दिखेगा। विपक्ष को इसके लिए तैयार रहना चाहिए। भारत जिस रफ्तार से प्रगति कर रहा है उसे देखते हुए यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि कयामत की भविष्यवाणी करने वाले हर बार की तरह गलत साबित होंगे। (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

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