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‘ग़जब रात’: अंधेरे में ज़मीर की रोशनी

इस फ़िल्म का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि इसका नायक कोई आदर्शवादी पुलिसवाला नहीं है। वह एक ऐसा आदमी है जिसे अपनी बेईमानी पर कभी शर्म नहीं आई। मगर एक रात उसे किसी अनजान की तकलीफ़ अपनी तकलीफ़ लगने लगती है। शायद इंसानियत का पहला क़दम यही होता है कि किसी दूसरे के दर्द में अपना थोड़ा-सा हिस्सा पहचान लेना। रात कितनी भी गहरी हो, सुबह होने की एक संभावना हमेशा बची रहती है।

रात की भी अपनी एक ज़ुबान होती है। दिन के उजाले में जो चेहरे अपने किरदारों के पीछे छिपे रहते हैं, रात उन्हें थोड़ा बेनक़ाब कर देती है। कुछ राज़ खुलते हैं, कुछ रिश्ते उलझते हैं और कभी-कभी इंसान को अपने ही ज़मीर से मुलाक़ात करनी पड़ती है।

हिंदी सिनेमा के मशहूर पटकथा लेखक रितेश शाह निर्देशित ‘ग़जब रात’ की कहानी भी ऐसी ही एक रात की है। एक रात, जिसमें दिल्ली की सड़कों पर अपराध की गाड़ियां दौड़ रही हैं, सत्ता के गलियारों में साज़िशें पल रही हैं और एक भ्रष्ट पुलिसवाले की ज़िंदगी में अचानक इंसानियत दस्तक देती है।

इस क्राइम थ्रिलर की सबसे दिलचस्प बात इसका केंद्रीय किरदार है। एक ऐसा पुलिसवाला, जिसके लिए वर्दी से ज़्यादा उसकी जेब की अहमियत है। जो क़ानून की रखवाली करने के बजाय उसकी कमज़ोरियों से अपना फ़ायदा निकालना जानता है। लेकिन एक रात कुछ ऐसा होता है कि उसे अपनी अब तक की पूरी ज़िंदगी और अपने फ़ैसलों पर दोबारा नज़र डालनी पड़ती है।

रितेश शाह के लिए यह फ़िल्म इसलिए भी ख़ास है कि बतौर पटकथा लेखक अपनी पहचान बनाने के बाद उन्होंने निर्देशन की दुनिया में क़दम रखा है। इस पहली निर्देशकीय पारी में उनके साथ हैं नीरज पांडेय, जो हिंदी सिनेमा में थ्रिलर की एक अलग पहचान बना चुके हैं।

मनोज बाजपेयी अभिनीत अजय निर्वित दिल्ली पुलिस का एक ऐसा अधिकारी है, जिसने भ्रष्टाचार को अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बना लिया है। उसके लिए हर कार्रवाई में कमाई की संभावना है और हर मुसीबत में कोई न कोई रास्ता निकालने की तरकीब।उसकी दुनिया में ईमानदारी कोई आदर्श नहीं, बल्कि एक ऐसी चीज़ है जिससे वह अब तक बचता आया है।लेकिन एक रात उसकी मुलाक़ात एक घायल लड़की से होती है, जिसे चलती गाड़ी से बाहर फेंक दिया गया है। अजय उसे अस्पताल पहुंचाता है। शुरुआत में यह उसकी तरफ़ से इंसानियत का एक छोटा-सा क़दम लगता है, मगर जल्द ही वह एक ऐसे आपराधिक जाल में उलझ जाता है जिसकी पहुंच सत्ता के ऊंचे दरवाज़ों तक है।

मामले में सीबीआई और एनआईए के अधिकारियों की एंट्री होती है। हर कोई कुछ जानता है, लेकिन कोई पूरी बात नहीं बताता। घायल लड़की की पहचान, उसके साथ हुई घटना और इसके पीछे छिपे लोगों की मंशा धीरे-धीरे सामने आती है। अजय के सामने पैसों और अपने ज़मीर के बीच चुनाव करने की नौबत आती है। जिस आदमी की पूरी ज़िंदगी छोटी-छोटी बेईमानियों से चलती रही हो, उसके सामने अब एक बड़ा सवाल है कि क्या वह अपनी पुरानी आदतों के साथ आगे बढ़ेगा या पहली बार अपने भीतर बचे हुए इंसान को कोई मौक़ा देगा?

यहीं फ़िल्म एक दिलचस्प नैतिक सवाल खड़ा करती है कि क्या बेईमान आदमी के भीतर भी कोई ईमानदार कोना बचा रह सकता है? क्या इंसान को बदलने के लिए किसी बड़ी घटना की ज़रूरत होती है, या कभी-कभी किसी अनजान की तकलीफ़ ही हमारे भीतर सोई हुई इंसानियत को जगा देती है?

रितेश शाह हिंदी सिनेमा के उन लेखकों में हैं जिनकी पटकथाओं ने मनोरंजन के साथ सामाजिक सवालों को भी जगह दी है। ‘कहानी’, ‘पिंक’, ‘एयरलिफ्ट’, ‘रेड’ और ‘बाटला हाउस’ जैसी फ़िल्मों से उनका लेखकीय जुड़ाव रहा है। उनकी कहानियों में अक्सर एक ऐसा सामाजिक या नैतिक प्रश्न होता है जो दर्शक को फ़िल्म ख़त्म होने के बाद भी सोचने पर मजबूर करता है। ‘ग़ज़ब रात’ में भी उनकी कोशिश एक ऐसी दुनिया रचने की है जहां हर किरदार के अपने स्वार्थ हैं, अपनी मजबूरियां हैं और अपने छिपे हुए इरादे।

निर्देशन की पहली पारी में रितेश का सबसे अच्छा पक्ष यह है कि वह कहानी को अनावश्यक भावुकता से बचाते हैं। दिल्ली की रात, पुलिस महकमे की अंदरूनी दुनिया, अलग-अलग एजेंसियों के बीच का टकराव और लगातार बदलते घटनाक्रम एक बेचैन माहौल बनाते हैं।

हालांकि, लेखक के रूप में जिस कसावट और बारीकी की उम्मीद उनसे रहती है, निर्देशन में वह हर जगह दिखाई नहीं देती। कुछ दृश्यों में तनाव पैदा होता है, लेकिन वह देर तक ठहर नहीं पाता। कुछ किरदारों की परतें खुलने से पहले ही कहानी आगे बढ़ जाती है। पहली फ़िल्म के निर्देशक के तौर पर रितेश के भीतर संभावनाएं साफ़ दिखाई देती हैं। अब देखना यह होगा कि वह अपनी लेखकीय समझ को आने वाली फ़िल्मों में कितनी मज़बूत सिनेमाई भाषा दे पाते हैं।

मनोज बाजपेयी को पर्दे पर देखना हमेशा दिलचस्प होता है। उनके अभिनय की ख़ासियत यह है कि वह अपने किरदार को निभाते नहीं, उसके भीतर रहने लगते हैं। अजय निर्वित का किरदार भी ऐसा ही है। एक भ्रष्ट पुलिसवाला, जो अपनी चालाकियों पर ख़ुद भी मुस्कुराता है। जिसे मालूम है कि किससे कैसे बात करनी है, कहां थोड़ा झुकना है और कहां अपनी वर्दी का रौब दिखाना है।

मनोज ने इस किरदार में एक ऐसी सहजता पैदा की है जो उसे विश्वसनीय बनाती है। उनके चेहरे के बदलते भाव, संवादों के बीच की ख़ामोशी और परिस्थितियों के अनुसार बदलता हुआ उनका व्यवहार कई दृश्यों को ख़ास बना देता है। वह कहीं भी अपने अभिनय का प्रदर्शन करने की कोशिश नहीं करते। उनकी आंखों में कभी लालच दिखाई देता है, कभी डर और कभी एक ऐसी बेचैनी, जिसे वह ख़ुद भी पूरी तरह समझ नहीं पा रहे। मनोज के किरदार की सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि दर्शक अजय की बेईमानी से असहमत होते हुए भी उसकी अगली चाल जानना चाहता है।

हां, उसके भीतर होने वाले नैतिक परिवर्तन को पटकथा थोड़ा और वक़्त दे सकती थी। जिस आदमी ने बरसों से अपने ज़मीर को सुविधानुसार इस्तेमाल किया हो, उसका अचानक किसी दूसरे की तकलीफ़ के लिए खड़ा हो जाना एक बड़ा भावनात्मक मोड़ है। इसे और गहराई से विकसित किया जा सकता था। फिर भी मनोज बाजपेयी इस किरदार को अपनी अभिनय क्षमता से एक अलग पहचान देते हैं।

दिव्या दत्ता सुनीता चौधरी के किरदार में हैं। सत्ता, प्रभाव और सार्वजनिक छवि के बीच अपने हितों को साधने वाली इस दुनिया में उनका किरदार कहानी की एक अहम कड़ी है। दिव्या की अभिनय क्षमता से परिचित दर्शकों को उनसे हमेशा कुछ नया देखने की उम्मीद रहती है। यहाँ भी वह अपनी शानदार मौजूदगी दर्ज कराती हैं।

नुसरत भरूचा रोज़ी के किरदार में दिखाई देती हैं। मनोज के साथ उनके दृश्य कहानी में एक निजी और मानवीय पहलू जोड़ते हैं। हालांकि उनके किरदार को थोड़ा और विस्तार दिया जाता तो फ़िल्म की भावनात्मक परत मज़बूत हो सकती थी।

साक़िब सलीम और अक्षय ओबेरॉय क्रमशः करण गिल और नवीन माधोक के रूप में कहानी के जाँच-पड़ताल वाले हिस्से को आगे बढ़ाते हैं। दोनों के बीच का टकराव रहस्य को बनाए रखने में मदद करता है। श्रद्धा दास नेहा प्रभु के रूप में नज़र आती हैं। कीकू शारदा अपने परिचित हास्य अंदाज़ से इतर एक अलग रंग में दिखाई देते हैं।

राजीव गुप्ता की बात अलग से होनी चाहिए। वह उन कलाकारों में हैं जिनकी स्क्रीन पर मौजूदगी किसी दृश्य को सहजता से विश्वसनीय बना देती है। पुलिस अधिकारी प्रवीण राणा के किरदार में उनका स्वाभाविक अभिनय और संवादों की अदायगी कहानी को ज़मीन से जोड़े रखती है। राजीव उन अभिनेताओं में हैं जो बिना किसी अतिरिक्त शोर-शराबे के अपने किरदार की जगह बना लेते हैं। उनके अभिनय में एक ऐसी सहजता है जो दर्शक का ध्यान अपनी ओर खींचती है, लेकिन किरदार की स्वाभाविकता को कभी कम नहीं होने देती। ऐसे कलाकारों को पर्दे पर और अधिक महत्त्वपूर्ण भूमिकाओं में देखने की इच्छा होती है।

अदिति शर्मा और मेघना अग्रवाल सहित अन्य सहयोगी कलाकार भी कहानी की दुनिया को पूरा करने में योगदान देते हैं।इतने सारे अच्छे कलाकारों की मौजूदगी फ़िल्म को एक बड़ा कैनवास देती है, लेकिन हर किरदार को अपनी पूरी कहानी कहने का मौक़ा नहीं मिलता।

नीरज पांडेय का नाम आते ही ‘अ वेडनेसडे!’, ‘स्पेशल 26’ और ‘बेबी’ जैसी फ़िल्में याद आती हैं। उनकी कहानियों में अक्सर व्यवस्था की कमज़ोरियां, सत्ता के समीकरण और आम आदमी की असाधारण परिस्थितियों से मुठभेड़ दिखाई देती है। ‘ग़जब रात’ भी इसी रचनात्मक संसार का हिस्सा लगती है।

इस फ़िल्म की दिलचस्पी सिर्फ़ अपराध की गुत्थी सुलझाने में नहीं, बल्कि उन लोगों के इरादों को समझने में है जो इस गुत्थी के अलग-अलग सिरों पर खड़े हैं।

फ़िल्म का एक अच्छा विचार यह भी है कि भ्रष्टाचार हमेशा किसी बड़े घोटाले से शुरू नहीं होता। कई बार वह एक छोटे-से समझौते से शुरू होकर पूरी व्यवस्था का स्वभाव बन जाता है। अजय निर्वित इसी व्यवस्था का हिस्सा है। वह उसका शिकार भी है और उसका लाभार्थी भी। इसीलिए उसका संघर्ष दिलचस्प बनता है लेकिन पटकथा के स्तर पर फ़िल्म कुछ जगह अपनी ही रफ़्तार की शिकार हो जाती है। घटनाएं तेज़ी से आगे बढ़ती हैं, नए किरदार आते हैं, नए रहस्य खुलते हैं, लेकिन हर खुलासा दर्शक को उतना चौंका नहीं पाता जितनी उम्मीद की जाती है।

थ्रिलर में रहस्य ज़रूरी है, मगर रहस्य से भी ज़्यादा ज़रूरी है उसकी विश्वसनीयता। दर्शक को चौंकाना आसान है, उसे चौंकने के बाद यक़ीन दिलाना मुश्किल। ‘ग़जब रात’ इस फ़र्क़ को हर जगह साध नहीं पाती।

अरविंद सिंह की सिनेमैटोग्राफी दिल्ली की रात को कहानी का एक सक्रिय हिस्सा बनाता है। शहर की सड़कों, अस्पतालों और पुलिसिया माहौल में एक तरह की बेचैनी बनी रहती है। प्रवीण काथिकुलोथ की एडिटिंग घटनाओं को गति देता है, हालांकि कुछ दृश्यों में और कसावट की गुंजाइश थी। संजय चौधरी का बैकग्राउंड स्कोर रहस्य और तनाव को बढ़ाता है। राजेश चौधरी का प्रोडक्शन डिज़ाइन और अब्बास अली मुगल का एक्शन निर्देशन भी फ़िल्म के संसार को विश्वसनीय बनाने में योगदान देते हैं।

एक ऐसे पटकथा लेखक का निर्देशन में आना, जिसने हिंदी सिनेमा को ‘कहानी’, ‘पिंक’, ‘एयरलिफ्ट’ और ‘रेड’ जैसी फ़िल्मों से अपनी लेखकीय समझ का परिचय दिया है, अपने आप में उत्सुकता जगाता है। बतौर निर्देशक उनकी पहली फ़िल्म में कुछ कमियां ज़रूर हैं, लेकिन उससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है उनकी कहानी कहने की समझ, विषयों के प्रति उनकी संवेदनशीलता और एक अलग सिनेमाई दुनिया रचने की कोशिश।

मेरे लिए इस फ़िल्म का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि इसका नायक कोई आदर्शवादी पुलिसवाला नहीं है। वह एक ऐसा आदमी है जिसे अपनी बेईमानी पर कभी शर्म नहीं आई। मगर एक रात उसे किसी अनजान की तकलीफ़ अपनी तकलीफ़ लगने लगती है। शायद इंसानियत का पहला क़दम यही होता है कि किसी दूसरे के दर्द में अपना थोड़ा-सा हिस्सा पहचान लेना।

रात कितनी भी गहरी हो, सुबह होने की एक संभावना हमेशा बची रहती है। बस, कभी-कभी उस सुबह तक पहुंचने के लिए आदमी को अपने भीतर का अंधेरा पार करना पड़ता है।

नेटफ़्लिक्स पर है। देख लीजिएगा।(पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)

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