मोदी नेतृत्व वाली भाजपा की चुनाव जीतने (या चुनाव को मैनेज करने) की क्षमता में सेंध लगी है या नहीं, इसका आकलन करने के पर्याप्त साक्ष्य हमारे पास मौजूद नहीं हैं। लेकिन यह जरूर स्पष्ट हो गया है कि मोदी सरकार जन मानस पर वह ऑथरिटी गंवा चुकी है, जिस कारण वह चुनौती-विहीन नजर आती थी। अब उसके पास जो ऑथरिटी बची है, वह सुरक्षा तंत्र एवं पुलिस की दमनकारी क्षमता पर आधारित है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा नेतृत्व ने ज़ेन-जी के बागी मूड के आगे अपमान की घूंट पी लेना ही बेहतर समझा। 20 जुलाई को दिल्ली में संसद मार्च कर रहे नौजवानों पर पुलिस दमन के बाद कॉकरोच आंदोलन जिस तेजी से देश भर में फैला और अशांति के लक्षण दिखने लगे, उसके मद्देनजर संकट को किसी तरह संभाल लेना केंद्र सरकार की प्राथमिकता बन गई।
मोदी और अमित शाह के दौर में भाजपा की जो सोच एवं कार्यशैली रही है, उसके बीच जवाबदेही के सवाल को केंद्र में लाकर किसी मंत्री को हटवाने में किसी आंदोलन का सफल होना जरूर ही एक असाधारण उपलब्धि मानी जाएगी। यह सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि धर्मेंद्र प्रधान को मंत्री पद से हटाने पर राजी होने के लिए मोदी और भाजपा नेतृत्व को कितनी मनोवैज्ञानिक मशक्कत करनी पड़ी होगी।
ज़ेन-जी परिघटना को लेकर मोदी सरकार काफी पहले से आशंकित थी। इसीलिए कॉकरोच आंदोलन के प्रति उसने अपनी फितरत के उलट नरम रुख अपनाया। सरकार के रणनीतिकार संभवतः इस बात के प्रति जागरूक रहे कि प्रभु वर्ग के नौजवानों का दमन सत्ताधारी दल के लिए आत्मघाती हो सकता है। उन्हें अहसास था कि बाकी तबकों के आंदोलनों की तरह इसे दबाना अपनी जड़ों पर प्रहार करने जैसा होगा। सोशल मीडिया के इस्तेमाल में सक्षम और पढ़े-लिखे नौजवानों के प्रति सख्ती का बांग्लादेश एवं नेपाल में जो परिणाम हुआ, उससे संभवतः सरकार ने सबक हासिल किया है।
बीते चार साल में श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में जो हुआ, उसका साया पहले से मोदी सरकार पर रहा है। सितंबर 2025 नेपाल में ज़ेन-जी विद्रोह के तुरंत बाद मोदी सरकार ने वैसी घटनाओं के लिए तैयार रहने की जरूरत समझी थी। पिछले अक्टूबर के पहले हफ्ते में द इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में बतायाः
‘मिली जानकारी के मुताबिक नेपाल में जेन-जी विरोध प्रदर्शनों के मद्देनजर दिल्ली पुलिस आयुक्त सतीश गोलचा ने तीन इकाइयों- इंटेलीजेंस ब्रांच, ऑपरेशन्स यूनिट और दिल्ली सशस्त्र पुलिस- को अगर वैसी ही स्थिति राष्ट्रीय राजधानी में उत्पन्न हुई, तो उससे निपटने के लिए आपात योजना तैयार रखने का निर्देश दिया है। बताया जाता है कि एक बैठक में गोलचा ने दो विशेष पुलिस आयुक्तों को पुलिस के पास उपलब्ध गैर-जानलेवा हथियारों के ऑडिट के लिए एक कमेटी बनाने को कहा। उनसे कहा गया है कि ऐसे हथियारों की और जरूरत हो, तो वे सुझाव दें। वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि ये निर्देश बड़े पैमाने पर युवा संचालित, नेतृत्व-विहीन प्रदर्शनों की संभावना को ध्यान में रखते हुए दिए गए हैं, जैसाकि काठमांडू और नेपाल के अन्य हिस्सों में देखने को मिला था। ऐसे विरोध प्रदर्शन भारत में भी फैल सकते हैं या दिल्ली में वैसी जन-गोलबंदी को प्रेरित कर सकते हैं।’ (https://indianexpress.com/article/india/nepal-gen-z-protests-in-mind-delhi-police-chief-asks-units-to-prepare-contingency-plan-10288178/)
दिल्ली पुलिस की इस बैठक से पहले लद्दाख के लेह में पूर्ण राज्य का दर्जा और लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में डालने की मांग को लेकर चल रहा आंदोलन (24 सितंबर को) हिंसक रूप ले चुका था। उस आंदोलन में भी सबसे ज्यादा भागीदारी युवा समूहों की ही थी। इस कारण लद्दाख के आंदोलन को भी मीडिया चर्चाओं में ज़ेन-जी परिघटना से जोड़ा गया था।
केंद्र ऐसी आशंकाओं से चिंतित है, इसके संकेत पिछले 31 अक्टूबर को ‘राष्ट्रीय एकता दिवस’ पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल के एक भाषण से भी मिला। तब डोवाल ने कामकाज के नरेंद्र मोदी सरकार के रिकॉर्ड की विस्तार से चर्चा की। दावा किया कि मोदी सरकार ने भारत का चेहरा बदल दिया है। उसने जन-केंद्रित नीतियां अपनाई हैं, भ्रष्टाचार पर लगाम लगाया है, पारदर्शी प्रशासन दिया है, और जन-कल्याण की योजनाओं को प्रभावी बनाया है। लेकिन डोवाल ने कहा-
‘इतना कुछ करने के बाद भी मोदी सरकार के कामकाज को लेकर नकारात्मक धारणाएं बनी हैँ। इस सिलसिले में उन्होंने कई वैश्विक सूचकांकों का जिक्र किया। कहा कि भारत की वैश्विक रैंकिंग कई क्षेत्रों में कमजोर है, जो भारत की वास्तविक क्षमताओं और उपलब्धियों को प्रतिबिंबित नहीं करती। हमारी रैंकिंग वे संस्थाएं तय करती हैं, जो भारत की जमीनी सच्चाई को नहीं समझतीं। भारत में कुछ पत्रकार या बुद्धिजीवी सरकार को लेकर नकारात्मक राय जताते हैं, जो बातें ग्लोबल रैंकिंग करने वाली संस्थाओं तक पहुंच जाती हैं। फिर वे जो संस्थाएं रैंकिंग बनाती हैं, उनसे नकारात्मक धारणाएं बनती हैं।’
डोवाल ने इसी क्रम में श्रीलंका, नेपाल, और बांग्लादेश की घटनाओं का उल्लेख किया। उन्होंने इन देशों में अ-संवैधानिक ढंग से हुए सत्ता परिवर्तन को “खराब शासन” (poor governance) का परिणाम बताया। फिर कहा कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद के काल में 37 देशों में से 28 का पतन या विखंडन खराब शासन के कारण हुआ है। और उसमें उन्होंने ये महत्त्वपूर्ण बात जोड़ी कि कोई भी शक्ति उस राष्ट्र की रक्षा नहीं कर सकती, जहां लोग शासन में विश्वास खो देते हैं।
(https://www.youtube.com/watch?si=Eb0Djec9QzdXKfis&v=VM4PPwkcZDo&feature=youtu.be))
तो केंद्र के नीतिकार इससे वाकिफ हैं कि (“अच्छा काम करने के बावजूद”) नरेंद्र मोदी सरकार के बारे में नकारात्मक धारणाएं मौजूद हैं और इसके हानिकारक परिणाम हो सकते हैं। कॉकरोच आंदोलन के दौरान युवा वर्ग का गुस्सा जिस तरह पहले सोशल मीडिया और फिर सड़कों पर पसरा, उसका संदेश साफ था कि उस तबके में बनीं “नकारात्मक धारणाएं” अब सरकार को भारी पड़ने लगी हैं। क्यों, इसे समझने के लिए एक ऐसे किशोर की कल्पना कीजिए जो 18 वर्ष का हुआ या होने वाला है। जब मोदी सत्ता में आए, तब वह केवल छह साल का था। दरअसल, जो युवा 24-25 साल के हैं, वे भी तब 10-12 के ऐसे किशोर थे, जिनके दिमाग की खिड़कियां अभी खुलनी शुरू ही हुई थीं।
यह पीढ़ी नरेंद्र मोदी के नारों और जुमलों को सुनते हुए बड़ी हुई है। उसने “नया भारत”, “विकसित भारत”, “अमृत काल” आदि के महिमामंडन के अलावा और कुछ अपने जीवन में नहीं देखा-सुना। अब चूंकि वह पीढ़ी बड़ी हो गई है और करियर की चुनौतियां उसके सामने है, तो वह उन बड़ी बातों का परीक्षण अपने सामने मौजूद हकीकतों से कर रही है।
यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि इस पीढ़ी की नजर में भाजपा या मोदी ‘लुटियन्स गैंग’ के चैलेंजर नहीं हैं। बल्कि वे खुद ‘ऐस्टैबलिशमेंट’ हैं और ज़ेन-जी आज की समस्याओं के लिए उनकी जवाबदेही तय करना चाहती है। एक समय मोदी ने पहले की समस्याओं के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया और चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस एवं अन्य गैर-भाजपा दलों को निशाने पर लिया। ये बात उस पीढ़ी के बहुत बड़े हिस्से के बीच कारगर रही, जिन्होंने उन पार्टियों के शासन को देखा था और मोदी को एक मौका देना चाहते थे। लेकिन ज़ेन-जी ने सिर्फ मोदी का शासनकाल देखा है, इसलिए आज की समस्याओं के लिए नेहरू या कांग्रेस को दोषी बता कर उसे बहकाना संभव नहीं रह गया है।
आज हकीकत यह है कि
मोदी सरकार की आर्थिक नीतियां शिक्षित भारतीय युवाओं की बहुसंख्या को रोज़गार देने में असमर्थ हैं।
तेज विकास, औद्योगिक सुधार, और “विकसित भारत” जैसे नारों या वादों के बावजूद उच्च डिग्रीधारी नौजवानों के लिए सम्मानजनक नौकरियों की भारी किल्लत है। 25 वर्ष से कम आयु के ग्रैजुएट्स की बेरोजगारी दर 40 प्रतिशत तक पहुंचती दिखी है।
जीडीपी में तेज वृद्धि दर की बातें उन युवाओं को अब नहीं लुभातीं, जिनके लिए यह वृद्धि दर बेहतर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने में विफल साबित हुआ है।
अब सूचना तकनीक उद्योग भी अपनी चमक खोने लगा है, जो कभी मध्यम वर्गीय युवाओं के लिए आगे बढ़ने का सबसे भरोसेमंद माध्यम था। जून 2026 में भारत में आईटी क्षेत्र में नई नियुक्तियों में तीन प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई, जबकि टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज ने उसके पहले 12,000 से अधिक कर्मचारियों को निकाल दिया था। कुल सूरत यह है कि नए अवसर उच्च कुशल श्रमिकों की एक छोटी संख्या तक सीमित हैं, जबकि सामान्य स्नातकों के लिए एंट्री लेवल के पद प्रभावित हो रहे हैं।
इसके साथ ही विदेशी रोज़गार के अवसर भी सिकुड़ने लगे हैं। पश्चिमी देशों में आव्रजन विरोधी फैली भावना और पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण इन अवसरों में तेजी से गिरावट आई है। खासकर अमेरिका में बदली नीतियों ने भारतीय मध्य वर्गीय युवा को सपनों को बुरी तरह प्रभावित किया है। नतीजा यह है कि जिस आर्थिक विकास का ढिंढोरा मोदी और भाजपा ने पीटा, वह युवाओं के लिए आगे बढ़ने के नए अवसरों निर्मित करने में विफल साबित हो रहा है।
इस बीच ध्वस्त होते परीक्षा के सिस्टम ने उस सीढ़ी को संदिग्ध बना दिया है, जिसके जरिए छात्र आगे बढ़ने की तैयारी करते थे। इसीलिए लीक हुए प्रश्न पत्रों को लेकर भड़का गुस्सा केवल परीक्षार्थियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अवसर का इंतजार कर रहे हर सामान्य युवा को इसने प्रभावित किया है
तो हाल यह है कि आर्थिक विकास के मोदी के वादे जहां साख खो रहे हैं, वहीं जवाबदेही से बचने की उनकी सरकार की प्रवृत्ति ने लोगों में आक्रोश भड़काया है। इस बीच चुनावों की विश्वसनीयता को लेकर बढ़े संदेह ने भाजपा सरकार के सियासी रुतबे की चमक धुंधली की है। राजनीति-शास्त्री अगर ‘Win Elections, Lose Authority’ जैसे शीर्षक से लेख लिखने लगें, तो चुनाव और उसके परिणाम की सर्व-स्वीकार्यता के बीच चौड़ी हो रही खाई का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।
कॉकरोच जनता पार्टी का उदय इसी पृष्ठभूमि का परिणाम रहा। इसके प्रतिरोध के दौरान जुटी ज़ेन-जी ने अपने नारों, रील्स और सोशल मीडिया पोस्ट से ठीक उस जगह पर चोट की है, जो राजनीति में मोदी के वर्चस्व का आधार रही है। यह पहलू है नैरेटिव कंट्रोल की उनकी क्षमता। ज़ेन-जी के प्रहार से मोदी के नैरेटिव्स फिलहाल क्षत-विक्षत अवस्था में नजर आने लगे हैं।
‘कॉकरोच पार्टी’ ने दिखाया है कि आज के दौर में बिखरी हुई सत्ता-विरोधी भावना को सशक्त सत्ता विरोधी शक्ति में परिवर्तित करने के लिए किसी संगठन की आवश्यकता नहीं है। एक सक्रिय सोशल नेटवर्क के जरिए भी उस सरकार को झुकाया जा सकता है, जो अब तक जवाबदेही को ठेंगे पर रखती आई है।
मोदी सरकार के रणनीतिकारों ने इस आंदोलन की ताकत को समझा। उन्होंने इसके असंगठित प्रसार और नेतृत्व-विहीन प्रतिरोध के बढ़ते दायरे में निहित खतरे को भांपा। उन्होंने झुककर संकट टाल देने की रणनीति अपनाई, जो फिलहाल कारगर रही है। लेकिन इससे उन समस्याओं का समाधान नहीं हुआ है, जिनकी वजह से असंतोष और आक्रोश फैला है। दरअसल, कहा यह जा सकता है कि पुरानी समस्याएं अभी अनसुलझी हैं, जबकि नए जोखिम अब उभर कर सामने आ चुके हैं। इसीलिए उग्र प्रतिरोध की संभावनाएं लगातार बनी हुई हैं।
इस खतरे को भाजपा समर्थक दक्षिणपंथी खेमे में भी बखूबी समझा जा रहा है। स्वराज्य वेबसाइट मोदी काल में भाजपा की इस हद तक समर्थक रही है कि कई बार उस पर दुष्प्रचार करने के आरोप भी लगे हैं। इसके स्तंभकार आर. जगनाथन भी दक्षिणपंथ के पुराने के पैरोकार हैं। इसलिए दक्षिणपंथी खेमे में चल रहे विमर्श की झलक पाने के लिए उनकी बातों पर ध्यान देना उचित होगा। जगनाथन का निष्कर्ष तो यह है कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से ‘मोदी सरकार को केवल कुछ हफ्तों की मोहलत मिली है, महीनों की नहीं। असली और कठिन परीक्षा अभी बाकी है।’
- उनका मुख्य तर्क है कि कॉकरोच विरोध प्रदर्शन वास्तव में NEET परीक्षा के पेपर लीक को लेकर था ही नहीं। यह शासन और प्रशासन के हर अंग से बेहतर व्यवस्था की मांग थी। यह मांग ज़ेन जी की तरफ से आई- एक ऐसी पीढ़ी जिसकी शिकायत है कि सत्ता में बैठे लोग उनकी बात नहीं सुनते।
- और यह गुस्सा केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं रहेगा। एथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल से परेशान वाहन मालिक ‘E20 जनता पार्टी’ के गठन की पहल कर चुके हैं। इसके बाद किसान और अन्य समूह भी जुड़ सकते हैं।
- चेतावनी यह है कि इसकी ज़द में सिर्फ प्रधानमंत्री या उनका मंत्रिमंडल ही नहीं, बल्कि हर कोई आ रहा है। राज्य सरकारें, नगर निगम, नौकरशाही, अदालतें- इनमें से कोई भी जो नागरिकों को बेहतर सेवाएं नहीं दे रहा है और वे सभी बेनकाब हो चुके हैं। अगर एक पेपर लीक पर इस तरह का जनाक्रोश भड़क सकता है, तो कचरा, ट्रैफ़िक और बदहाल अस्पताल को लेकर भी ऐसा हो सकता हैं। (https://swarajyamag.com/politics/on-probation-why-modi-30-should-prepare-for-a-million-mutinies-now)
इन बातों का सार है कि ‘अच्छे दिन’, ‘न्यू इंडिया’ या ‘विकसित भारत’ जैसे जुमलों से लोगों को बहकाने का दौर गुजर चुका है। मोदी सरकार- खास कर नई पीढ़ी का- भरोसा इस हद तक खो चुकी है कि उसकी बड़ी चुनावी जीतें भी उसे नैतिक बल या राजनीतिक आभा मंडल प्रदान करने में अब नाकाम होने लगी हैं। यह कहने का ये मतलब नहीं है कि मोदी सरकार के दिन गिने-चुने रह गए हैं। मोदी नेतृत्व वाली भाजपा की चुनाव जीतने (या चुनाव को मैनेज करने) की क्षमता में सेंध लगी है या नहीं, इसका आकलन करने के पर्याप्त साक्ष्य हमारे पास मौजूद नहीं हैं। लेकिन यह जरूर स्पष्ट हो गया है कि मोदी सरकार जन मानस पर वह ऑथरिटी गंवा चुकी है, जिस कारण वह चुनौती-विहीन नजर आती थी। अब उसके पास जो ऑथरिटी बची है, वह सुरक्षा तंत्र एवं पुलिस की दमनकारी क्षमता पर आधारित है। मगर मुश्किल यह है कि ज़ेन-जी ने इस बात का उदाहरण भी पेश कर दिया है कि भय के माहौल में भी कैसे बेखौफ़ हुआ जा सकता है!
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