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तो सरकार ने हाथ खड़े कर दिए हैं!

हकीकत यही है कि सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में मैनुफैक्चरिंग की हिस्सेदारी बढ़ाने के प्रयास सफल नहीं हुए। ‘मेक इन इंडिया’, पीएलआई योजना, बुनियादी ढांचे में निवेश, डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक आपूर्ति-शृंखला में आए परिवर्तनों का लाभ उठाने के अवसर सामने थे, लेकिन मैनुफैक्चरिंग क्षमता, रोजगार देने की क्षमता, आपूर्ति-शृंखला की गहराई और देश में तकनीकी सेवाओं का जाल फैलाने की कोशिशें अपेक्षित स्तर पर नहीं पहुंच पाईं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या उनके मंत्री राजनीतिक कारणों से सार्वजनिक मंचों पर चाहे जो बोलते हों, मगर भारत सरकार का आंतरिक आकलन यह है कि अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर वह लाचार है। बेरोजगारी की समस्या पर सूत्र उसके हाथ से छूट चुके हैं। इस आकलन की चर्चा मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी। अनंत नागेश्वरन ने लगभग बेलाग ढंग से की है। नागेश्वरन संभवतः इस सरकार से जुड़ी अकेली शख्सियत हैं, जो जब-तब दो-टूक और विनम्रता से हकीकत बयान कर जाते हैं।

नागेश्वरन ने आईआईएम अहमदाबाद से एमबीए (मास्टर इन बिजनेस मैनेजमेंट) की डिग्री ली हुई है। बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र में काम करने का उन्हें व्यावहारिक तजुर्बा है। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि वे पारंपरिक अर्थों में अर्थशास्त्री नहीं हैं- यानी वैसे अर्थशास्त्री जिसकी सोच-दृष्टि में पूरी आबादी और समग्र आर्थिक प्रक्रियाएं होती हैं। फिर भी यह अनुमान लगाया जा सकता है कि समष्टि अर्थव्यवस्था (macro-economy) पर उनकी पकड़ होगी- यानी अर्थशास्त्र की वह शाखा जिसमें कुल उत्पादन (GDP), रोज़गार, महंगाई, निवेश, बचत, व्यापार संतुलन, और सरकारी नीतियों जैसे आम आर्थिक पहलुओं का अध्ययन किया जाता है। इसलिए वे जो कहते हैं, उन्हें गंभीरता से लिया जाना चाहिए। वैसे भी, आज वे जो कहते हैं, जो सलाह देते हैं और जिस दिशा में वे सोचते हैं, उनसे देश की आर्थिक नीतियां प्रभावित होती हैं। अतः उनकी बातों पर गौर करना लाजिमी हो जाता है।

तो आइए, गौर करें कि उन्होंने कहा क्या है। नागेश्वरन ने हाल में अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस में दो किस्तों में एक लेख लिखा। उसके कुछ ही दिन के अंदर उन्होंने समाचार एजेंसी एएनआई के साथ 113 मिनट के लंबे पॉडकास्ट में अपने विचार रखे। इन दोनों जगहों पर उन्होंने जो कहा, उससे भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में सरकार की समझ के कई महत्त्वपूर्ण संकेत मिले। मसलन, पॉडकास्ट में उन्होंने कहाः

  • सॉफ्टवेयर, कंप्यूटर साइंस, और एमबीए डिग्री से करियर बनने का युग अब खत्म होने जा रहा है।
  • इसलिए युवाओं को ट्रेड स्किल्स और मानव-केंद्रित पेशों पर ध्यान देना चाहिए।
  • केयर-गिविंग (बीमार या बुजुर्गों की सेवा), हॉस्पिटलिटी (अतिथि-सत्कार और सेवा आधारित उद्योग यानी रहने की सुविधा, खाने-पीने, मनोरंजन और यात्रा से जुड़ी सेवाएं), पाक कला, स्वास्थ्य देखभाल संबंधी सेवाएं, खेल-शिक्षा, परामर्श (counselling) आदि कार्य ऐसे हैं, जो आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) से प्रभावित नहीं होंगे। इन कार्यों को सीखने की ओर ध्यान देना चाहिए।
  • नागेश्वरन ने कहा- “वेल्डर, प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन या बढ़ई जैसे कार्यों को भारत में इज्जत नहीं दी जाती। उन्हें फैशनेबल नहीं माना जाता। लेकिन मेरी राय में अब ऐसी सोच बदलने की जरूरत है।”
  • नागेश्वरन ने साफ किया कि इस युग में उद्योग पूंजी-उन्मुख ही रहेंगे। उनमें बहुत कम नौकरियां पैदा होंगी। कहा- “बेरोजगारी की समस्या का समाधान पुराने तौर-तरीकों का पालन नहीं है। यह दुर्भाग्यपूर्ण, लेकिन आज की हकीकत है कि दुनिया भर में पूंजी-केंद्रित आर्थिक विकास हो रहा है। हम बड़ी आकार वाली अर्थव्यवस्था हैं। अगर हम पश्चिमी मॉडल का पालन करें, तो कुछ उद्योग अनिवार्य रूप से पूंजी-केंद्रित रहेंगे, जिनमें ज्यादा लोगों को रोजगार नहीं दिया जा सकता। लेकिन हम पीछे भी नहीं रह सकते, क्योंकि दुनिया हमें उन सामग्रियों की आपूर्ति करने नहीं जा रही है। हमें उनमें से कुछ का उत्पादन खुद करना होगा।”

तो नागेश्वरन मानते हैं कि रोजगार-केंद्रित मैनुफैक्चरिंग का ढांचा खड़ा करने में हम नाकाम हो चुके हैं और आगे ऐसा करना बेहद कठिन हो गया है। एआई के कारण अभी जो ह्वाइट कॉलर रोजगार हैं, वे भी सिकुड़ते चले जाएंगे। तो भारतीय नौजवानों के लिए प्लंबर, वेल्डर, केयर-गिवर, कारपेंटर बनने और हॉस्पिटलिटी आदि जैसे कार्यों में माहिर होने का विकल्प ही बचा है। वैसे तो हर काम की अपनी गरिमा होती है, लेकिन नागेश्वरन ये सलाह मजबूरी में दे रहे हैं। उनकी बातों का संदेश साफ हैः भले ही मजबूरी में, लेकिन भारतवासियों को चाहिए कि वे ऐसे कार्यों को इज्जत की नजर से देखें- क्योंकि और विकल्प ही क्या है!

विकल्प नहीं है, तो इसलिए कि भारत में रिसर्च एवं डेवलपमेंट (अनुसंधान और उससे नई चीजें बनाने) पर किसी का ध्यान नहीं है। अब चूंकि सार्वजनिक क्षेत्र की बात नहीं होती और इस दर्शन को सामान्यतः स्वीकार कर लिया गया है कि ‘न्यूनतम शासन करने वाली सरकार ही सर्वोत्कृष्ट है’, तो सारी बात प्राइवेट सेक्टर पर टिक जाती है। तो अपने लेख में नागेश्वरन ने इस धारणा के कारणों की पड़ताल का प्रयास किया है कि ‘भारतीय कारोबारी घरानों ने आरंभ से ही रिसर्च एंड डेवलपमेंट (आरएंडडी) में पर्याप्त निवेश नहीं किया।’

नागेश्वरन ने इस हकीकत के चार बुनियादी और एक तात्कालिक कारण की पहचान की है। उनके मुताबिकः

  • भारत का बड़ा घरेलू बाजार। जब उत्पादकों के पास अपने सामान बेचने के लिए देश के अंदर ही बड़ा बाजार हो, तो वे प्रतिस्पर्धा भरे विदेशी बाजार में बेचने योग्य सामग्रियों के उत्पादन के लिए प्रेरित नहीं होते। (ऐसी सामग्रियों का उत्पादन आरएंडडी के जरिए गुणवत्ता में लगातार सुधार करते हुए ही किया जा सकता है।)
  • औपनिवेशिक युग में उद्योग-धंधों के हुए विनाश का साया। भारतीय व्याणिज्यिक समुदाय परंपरागत रूप से कारखाना उत्पादन के बजाय व्यापार केंद्रित रहे। जो कुछ कारखाना उत्पादन था, उसे ब्रिटिश राज ने अपनी नीतियों और कई बार जबरिया ढंग से नष्ट कर दिया। इस बीच कुछ ही घराने मैनुफैक्चरिंग में बचे या दोबारा खड़े हुए। अगर यह क्षेत्र बड़ा होता, तो शायद प्रतिस्पर्धा के कारण आरएंडडी के महत्त्व को बेहतर समझा गया होता।
  • समय से पहले वित्तीयकरण। नागेश्वरन ने लिखा है- “जो तीसरा पहलू है, संभव है कि वह इस मामले में सबसे निर्णायक साबित हुआ हो। इस पहलू की दूसरे देशों के ठोस अनुभवों से भी पुष्टि होती है। भारत में औद्योगिक विकास का जो स्तर था, उसके मद्देनजर भारतीय कॉरपोरेट सेक्टर जरूरत से काफी पहले वित्तीयकरण की तरफ चला गया- यानी उसने उत्पादक निवेशक पर वित्तीय मुनाफे को प्राथमिकता देनी शुरू कर दी। ये बात बेहद अहम साबित हुई।”

उन्होंने लिखा- “अन्य जगहों की तरह भारतीय कारोबारी घराने भी प्रमुख रूप से पारिवार केंद्रित हैं। पारिवारिक कंपनियां अक्सर जाने-पहचाने रास्ते पर चलती हैं। संस्थापक में कुछ बनाने की भूख होती है, दूसरी पीढ़ी उसे ठोस आधार प्रदान करती है, और तीसरी पीढ़ी के आते-आते ऐसा करते रहने की जरूरत का अहसास खत्म हो जाता है….. वित्तीय बाजारों ने तीसरी पीढ़ी को मैनुफैक्चरिंग एवं आरएंडडी जैसे श्रमसाध्य प्रयास के बिना ही असाधारण मुनाफा कमाने का विकल्प प्रदान किया हुआ है।”

  • लोकतंत्र और अनिश्चितता। नागेश्वरन के मुताबिक बड़े विकासशील देशों में दीर्घकालिक भविष्य के लिहाज से चुनावी लोकतंत्र ढांचागत अनिश्चितिता पैदा करता है। ये अनिश्चय आरएंडडी पर खर्च करने को लेकर निजी क्षेत्र को हतोत्साहित किए रहता है।

इन वजहों का जिक्र करने के बाद नागेश्वरन ने प्राइवेट सेक्टर के बचाव में भी एक कारण का उल्लेख किया है। उनके मुताबिक गुजरे “15 साल आम यादाश्त में सबसे अधिक उथल-पुथल भरे” रहे हैं। इस कारण भी भारतीय निजी क्षेत्र दीर्घकालिक सोच के तहत अनुसंधान पर खर्च से बचता रहा है।

तो सार यह कि भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार की निगाह में पर्याप्त आरएंडडी के अभाव के कारण एआई के युग में खुशहाल जिंदगी देने वाले रोजगार पैदा होने की संभावना बेहद सीमित हो गई है। अर्थव्यवस्था के अत्यधिक वित्तीयकरण तथा पूंजी-केंद्रित उत्पादन के तकाजे की वजह से इन हालात के बदलने की कोई संभावना भी नहीं है। अतः उचित यही है कि भारत के नौजवान ऊंचे सपने ना देखें और भारतीय समाज प्लम्बिग, वेल्डिंग, इलेक्ट्रिकल वर्क, केयर-गिविंग आदि जैसे कार्यों को सम्मान से देखना शुरू करे, क्योंकि अब यही अवसर नई पीढ़ी के सामने हैं!

बहरहाल, अब उन बातों पर ध्यान दीजिए, जो नागेश्वरन कह सकते थे, लेकिन उन्होंने नहीं कहाः

  • मुख्य आर्थिक सलाहकार कह सकते थे कि भारत सरकार एआई दौर की जरूरतों के मुताबिक इंजीनियर तैयार करने वाले संस्थान और कॉलेज खोलेगी, जहां देश की सभी प्रतिभाओं को तराशा जाएगा, भले वे किसी आर्थिक पृष्ठभूमि से आते हों।
  • भारत सरकार आरएंडडी पर अपने बजट में भारी बढ़ोतरी करेगी, ताकि जो खाई रह गई, उसे अगले कुछ दशकों के दौरान योजनाबद्ध ढंग से भरा जा सके।
  • श्रम-केंद्रित कारखानों को बढ़ावा देने के लिए देश के अंदर मांग निर्मित करने की ठोस एवं योजनाबद्ध रणनीति अपनाई जाएगी। नागेश्वरन ने भारत के बड़े बाजार का जिक्र किया है, लेकिन असल में ये बाजार 15 से 20 करोड़ उपभोक्ताओं से अधिक का नहीं है। सामान्य क्रय शक्ति वाली जनसंख्या को भी जोड़ लिया जाए, तो इसका विस्तार 25 से 30 करोड़ से ज्यादा उपभोक्ताओं तक नहीं जाता। तो 140 करोड़ आबादी वाले देश में क्रय शक्ति बढ़ा कर उपभोक्ता बाजार के कितने विस्तार की गुंजाइश है, उसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है।
  • स्कूली से लेकर उच्च शिक्षा, प्राथमिक से लेकर तृतीय स्तर की चिकित्सा, आम परिवहन, बेहतर गुणवत्ता वाले इन्फ्राक्चर, सबको पौष्टिक खाद्य सुरक्षा उपलब्ध कराने और कृषि आधारित उद्योगों का जाल बिछाने की जिम्मेदारी राज्य अपने ऊपर ले, तो घरेलू बाजार का उत्तरोत्तर विस्तार एक ठोस संभावना बन जाएगा।
  • नव-उदारवादी सोच में ढला कोई दिमाग तुरंत यह पूछेगा कि इसके लिए धन कहां से आएगा? तो सीधा जवाब है कि कर व्यवस्था को प्रगतिशील बनाया जाए। रेंट अर्थव्यवस्था और वित्तीय संपत्तियों से होने वाले मुनाफे पर अधिक टैक्स लगे। साथ ही वेल्थ और उत्तराधिकार कर को लागू कर समाज को अधिक न्यायपूर्ण बनाने की राजनीतिक संकल्प शक्ति दिखाई जाए।

मगर इसके लिए एक सबसे वैसे राज्य की जरूरत होगी, जो सिर्फ सुरक्षा की मशीनरी नहीं, बल्कि वास्तविक अर्थ में शक्तिशाली हो- जो पूंजी, वर्गीय हितों, और निहित स्वार्थों को नियंत्रित रखने में सक्षम हो। साथ ही जो राष्ट्र-निर्माण के ऊंचे सपने से प्रेरित हो। हकीकत यह है कि आज भारतीय राज्य की हैसियत ऐसी नहीं है।

दरअसल, जिन वजहों का उल्लेख नागेश्वरन ने किया है, वे बीमारी के लक्षण भर हैं। बीमारी हैः भारतीय राज्य का पूंजी के आगे समर्पण, जिससे एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग का उस पर संपूर्ण नियंत्रण बन गया है।

गौरतलब है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की कुछ खासियतें हैँ। भारत के पास सॉफ्टवेयर सेवाएं, फार्मास्यूटिकल्स (दवा उद्योग), ऑटो-पार्ट्स (वाहनों के पुर्जे) उद्योग के कुछ हिस्से, वित्तीय सेवाएं, अंग्रेजी बोलने वाली आबादी, उद्यमी, वैश्विक प्रवासी नेटवर्क, पूंजी बाजार और भू-राजनीति की अनुकूल परिस्थितियां मौजूद रही हैं। इसलिए भारत के बारे में यह सवाल कभी नहीं रहा कि उसमें विकास की क्षमता है या नहीं। क्षमता तो स्पष्ट रूप से मौजूद है।

फिर भी हकीकत यही है कि सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में मैनुफैक्चरिंग की हिस्सेदारी बढ़ाने के प्रयास सफल नहीं हुए। ‘मेक इन इंडिया’, पीएलआई योजना, बुनियादी ढांचे में निवेश, डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक आपूर्ति-शृंखला में आए परिवर्तनों का लाभ उठाने के अवसर सामने थे, लेकिन मैनुफैक्चरिंग क्षमता, रोजगार देने की क्षमता, आपूर्ति-शृंखला की गहराई और देश में तकनीकी सेवाओं का जाल फैलाने की कोशिशें अपेक्षित स्तर पर नहीं पहुंच पाईं।

यह भी याद करने की जरूरत है कि भारत में औद्योगिक नीति तय और लागू करने के साधनों की कमी नहीं रही है। नेहरू-युग की नियोजन प्रणाली, घरेलू उत्पादों को आयात से संरक्षण, लाइसेंसिंग, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम और घरेलू उद्योग-धंधों को नीतिगत संरक्षण देने से लेकर मोदी युग के ‘मेक इन इंडिया’, उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI), इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण और डिजिटल गवर्नेंस आदि में सरकारी हस्तक्षेप की अनेक मिसालें हैं।

इसके बावजूद आज सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार भारतीय नौजवानों को ट्रेड स्किल्स और मानव-केंद्रित पेशों को अपनाने की सलाह क्यों दे रहे हैं? इस प्रश्न का उत्तर भारतीय राज्य-पूंजी-समाज के ढांचागत त्रिकोण में छिपा हुआ है। इस त्रिकोण के बीच भारतीय राज्य की विकास एवं प्रगति को परिभाषित करने तथा उसके अनुरूप पूंजी को नियोजित एवं निर्देशित करने की उसकी क्षमता आरंभ से सीमित बनी रही। चार दशक बाद राज्य ने अपनी ये क्षमता भी पूंजी के आगे समर्पित कर दी। जबकि पिछले सौ साल का इतिहास गवाह है कि चाहे समाजवादी व्यवस्थाएं हों या पूंजीवादी- जहां भी तीव्र एवं व्यापक आधार वाला विकास हुआ, उसमें राज्य की अग्रणी भूमिका रही है।

राज्य यह भूमिका कैसे हासिल करे, इसका उत्तर राजनीति के स्वरूप में छिपा होता है। फिलहाल, जो राजनीति मुख्यधारा में है, उसमें जो हो सकता है, वही हमारे सामने है। भारत को अगर इससे ऊंची महत्त्वाकांक्षा रखनी है, ऊंचे सपने देखने हैं, तो यहां के लोगों को आखिरकार वैसी राजनीति की ओर जाना होगा, जो राज्य पर जन-शक्ति का नियंत्रण बना सके- ऐसी शक्ति जो पूंजी को नियंत्रित, निर्देशित, और नियोजित करने में सक्षम हो।

By सत्येन्द्र रंजन

वरिष्ठ पत्रकार। जनसत्ता में संपादकीय जिम्मेवारी सहित टीवी चैनल आदि का कोई साढ़े तीन दशक का अनुभव। विभिन्न विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता के शिक्षण और नया इंडिया में नियमित लेखन।

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