भारत की कूटनीति अब भी व्यक्तित्व-केंद्रित और घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने वाली है; जबकि यूरोपीय संघ जैसे जटिल साझेदार के लिए संस्थागत धैर्य और निरंतरता चाहिए। ईयू से बातचीत द्विपक्षीय सौदे से आगे की चीज़ है—सत्ताईस देश, यूरोपीय आयोग और एक सघन नियामक ढाँचा इसमें शामिल है।
कूटनीति में समय का अपना वजन होता है। भारत का यूरोप की ओर हालिया झुकाव—जो भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते में दिखाई देता है—किसी लंबी रणनीतिक तैयारी की परिणति कम और हालात के दबाव में लिया गया निर्णय अधिक लगता है। इतिहास बताता है कि यूरोप लंबे समय तक भारत की रणनीतिक सोच के केंद्र में नहीं रहा। बदला इरादा नहीं, बल्कि तात्कालिकता बदली—वैश्विक झटकों और वाशिंगटन से लौटती अनिश्चितता ने उसे तेज़ कर दिया।
आज़ादी के बाद सात दशकों तक यूरोप दिल्ली की दृष्टि में हाशिये पर रहा। भारत की विदेश नीति शीतयुद्ध की त्रिकोणीय वास्तविकताओं से आकार लेती रही—सोवियत हथियार और ऊर्जा, चीन के साथ प्रतिस्पर्धा, और 1991 के बाद अमेरिका से सतर्क समीकरण। यूरोप, इसके उलट, एक पूर्व औपनिवेशिक शक्ति के रूप में देखा गया—जो अधिकारों पर उपदेश देती थी, लेकिन सब्सिडी और नियमों से अपने बाज़ार सुरक्षित रखती थी। 2004 की भारत–ईयू रणनीतिक साझेदारी ने गहराई का वादा किया, पर व्यवहार में बहुत कम बदला। शिखर बैठकें औपचारिक रहीं, 2013 में व्यापार वार्ताएँ ठहर गईं, और कारोबार बढ़ा भी तो बिना किसी रणनीतिक मोड़ के—2006 में 47 अरब यूरो से 2018 में 91 अरब यूरो तक। बड़े परिवर्तन नहीं हुए, केवल धीरे-धीरे बढ़त रही।
चीन की राह इस अंतर को साफ़ करती है। वाशिंगटन के शुरुआती समर्थन से बीजिंग तेज़ी से वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में समा गया। अमेरिकी बाज़ार खुले थे, यूरोपीय पूँजी पीछे-पीछे आई, और ईयू–चीन व्यापार 2000 के लगभग 100 अरब यूरो से आज 700 अरब यूरो से ऊपर पहुँच गया। पैमाना, गति और केंद्रीकृत निर्णय-प्रणाली—तीनों ने इस उछाल को संभव किया। भारत को ऐसा रणनीतिक संयोग कभी नहीं मिला। ब्रसेल्स में उसे संरक्षणवादी, सुधारों में धीमा और मॉस्को से भू-राजनीतिक रूप से जुड़ा माना गया। नतीजा यह कि दशकों तक ईयू व्यापार में भारत की हिस्सेदारी तीन प्रतिशत से नीचे ही रही।
हालिया आँकड़े भी इसी तस्वीर को दिखाते हैं। 2021 से 2024 के बीच भारत–ईयू वस्तु व्यापार 88 अरब यूरो से बढ़कर 120 अरब यूरो हुआ। सेवाओं का व्यापार तीन गुना होकर 66 अरब यूरो पहुँचा—जिसे आईटी और परामर्श सेवाओं ने आगे बढ़ाया। ये प्रगति सम्मानजनक है, पर क्रमिक। इसके विपरीत, यूएई, ऑस्ट्रेलिया और ईएफटीए के साथ नए समझौतों ने लागू होते ही निर्यात में तेज़ उछाल दिया। यूरोप आख़िरी बड़ा अपवाद बना—सिर्फ़ भारत की हिचक नहीं, बल्कि ब्रसेल्स की अपनी नियामक, राजनीतिक और रणनीतिक पुनर्समीक्षा के कारण भी।
यही पुनर्समीक्षा निर्णायक बनी। चीन की आक्रामकता, कोविड के दौरान उजागर हुई आपूर्ति-शृंखला की कमज़ोरियाँ, और यूक्रेन युद्ध के बाद बना भू-राजनीतिक टूटाव—इन सबने यूरोप को भारत को दीर्घकालिक साझेदार के रूप में देखने को प्रेरित किया। पर गति तब आई, जब अमेरिकी व्यापार नीति में अस्थिरता लौटी। 2025 में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी के साथ भारतीय निर्यात पर शुल्क और रूसी तेल खरीद पर दंड की बातें फिर उठीं। वर्षों से अटकी ब्रसेल्स वार्ताएँ अचानक आगे बढ़ीं। अक्टूबर 2025 के चौदहवें दौर में सफलता मिली और जनवरी 2026 में समझौते की घोषणा हुई। नींव पहले से थी, पर अंतिम पत्थर दबाव में रखे गए।
यह क्रम एक गहरी चुनौती दिखाता है। भारत की कूटनीति अब भी व्यक्तित्व-केंद्रित और घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने वाली है; जबकि यूरोपीय संघ जैसे जटिल साझेदार के लिए संस्थागत धैर्य और निरंतरता चाहिए। ईयू से बातचीत द्विपक्षीय सौदे से आगे की चीज़ है—सत्ताईस देश, यूरोपीय आयोग और एक सघन नियामक ढाँचा इसमें शामिल है। 2007 में शुरू हुआ व्यापक व्यापार और निवेश समझौता पेटेंट, कृषि सब्सिडी और डेटा शासन पर वर्षों अटका रहा। प्रगति तब तेज़ हुई, जब बाहरी झटकों—चीन का उभार और अमेरिकी अनिश्चितता—ने तात्कालिकता पैदा की।
नया समझौता काग़ज़ पर महत्वाकांक्षी है—97 प्रतिशत वस्तुओं पर शुल्क हटाने, श्रम-गतिशीलता, रक्षा सहयोग और सततता के वादों के साथ। पर महत्वाकांक्षा से अमल अपने आप नहीं होता। असली परीक्षा तालमेल की है—क्या भारत कर-व्यवस्था, श्रम बाज़ार और अनुबंध प्रवर्तन में ऐसी घरेलू सुधार कर पाएगा, जो यूरोप की नियामक अपेक्षाओं के अनुरूप स्थिरता और भरोसा दें।
यदि साझेदारी को सचमुच रूपांतरणकारी बनना है, तो उसे प्रतीकवाद से आगे जाना होगा। ज़रूरत है पूरक आपूर्ति-शृंखलाओं की—भारत की सेवाएँ, दवाइयाँ और विनिर्माण क्षमता यूरोप की मशीनरी, सूक्ष्म अभियंत्रिकी और हरित तकनीक से जुड़ें। एक क्षेत्र निर्णायक संकेत देगा—ग्रीन हाइड्रोजन। साझा निवेश लक्ष्य, समान मानक और बड़े पैमाने पर उत्पादन की विश्वसनीय योजना बताएगी कि यह साझेदारी अगले औद्योगिक चरण की आधारशिला बन सकती है या नहीं।
संस्थागत गहराई यहाँ निर्णायक होगी। स्थायी कार्य-समूह, वार्षिक व्यापार व नियामक समीक्षाएँ, और सशक्त उप-राष्ट्रीय साझेदारियाँ—जैसे गुजरात–हैम्बर्ग, कर्नाटक–बवेरिया—को अनियमित शिखर बैठकों की जगह लेनी होगी। इसके बिना गति राजनीतिक चक्रों की बंधक रहेगी। भारत के आर्थिक उत्थान के लिए बहु-दिशात्मक, निरंतर रणनीति चाहिए—बाहरी झटकों से प्रेरित अस्थायी मोड़ों से आगे की।
ईयू समझौता ज़रूरी कदम है, पर इसे मंज़िल नहीं, आधार माना जाना चाहिए। यदि दिल्ली इसे प्रतिक्रियात्मक विविधीकरण का अंत समझेगी, न कि सक्रिय एकीकरण की शुरुआत, तो यूरोप शिष्ट साझेदार बना रहेगा—पर परिवर्तनकारी नहीं। सवाल यह नहीं कि समझौता बनने में कितना समय लगा; सवाल यह है कि क्या भारत इसे सार्थक बनाने को तैयार है। इतिहास हस्ताक्षर नहीं, उसके बाद आने वाले ठोस परिणामों को याद रखता है।


