आज तक़रीबन 60 अरब रुपए का मूल्य रखने वाली साढ़े 9 एकड़ ज़मीन में बने इंडिया हैबिटेट सेंटर में आवास, पर्यावरण और शहरी नियोजन के उद्देश्य ताक में। ले देकर ‘द ऑल अमेरिकन डिनर’, ओरिएंट एक्सप्रेस, द डाइन डेन, डेल्ही ओ डेल्ही, इतालवी और लेबनानी भोजन परोसने वाले ‘मेड’, चीनी और थाई भोजन के लिए मशहूर ‘ईस्ट’ रेस्टोरेंट और स्पा, सोना-बाथ, स्टीम रूम, जिम और रूफटाप स्विमिंग पूल जैसी दुकानों का धंधा फला-फूला हुआ है! ऐसे क्लब देश भर के हर प्रदेश में और हर प्रमुख शहर में लहर-लहर लहरा रहे हैं।…
जिमखाना क्लब के बहाने – 5
आवास, पर्यावरण और शहरी नियोजन से जुड़ी अलग-अलग संस्थाओं को एक साथ लाने के मक़सद से इंडिया हैबिटेट सेंटर (आईएचसी) बनाने का फ़ैसला 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने लिया था। उसी साल मई के महीने में इस के लिए भूमि आवंटित की गई। राजीव चाहते थे कि आईएचसी सिर्फ़ सरकारी अफ़सरों का नहीं, बल्कि पर्यावरणविदों, लेखकों, कलाकारों, शोधार्थियों, सामाजिक विकास के काम में लगे लोगों और आम नागरिकों का समन्वित कार्यस्थल बने। 33 साल पहले 1993 में, जब पी. वी. नरसिंहराव प्रधानमंत्री थे, आईएचसी बन कर तैयार हुआ।
आईएचसी की स्थापना के पीछे राजीव गांधी की विचार-दृष्टि के मद्देनज़र उस के परिसर में आवास एवं शहरी विकास निगम (हुडको), इमारत निर्माण सामग्री और प्रौद्योगिकी संवर्द्धन परिषद (बीएमटीपीसी), राष्ट्रीय ग्रामीण विकास और पंचायती राज संस्थान, राष्ट्रीय आवास बैंक (एनएचबी), द एनर्जी एंड रिसोर्सेज़ इंस्टीट्यूट (टेरी), ग्रीन बिल्डिग्स को रेटिंग देने वाली परिषद, अखिल भारतीय आवास विकास एसोसिएशन और वैज्ञानिक और अनुसंधान विभाग के तहत आने वाले कंसल्टेंसी डेवलपमेंट सेंटर जैसे अपने-अपने क्षेत्र के महारथी संस्थानों को दफ़्तरों के लिए जगह दी गई। संयुक्त राष्ट्रसंघ की मानव बस्तियों और सतत शहरी विकास से जुड़ी वैश्विक संस्था को भी कार्यालय के लिए इस परिसर में स्थान आवंटित किया गया। राजीव के बाद डा. मनमोहन सिंह ने बतौर प्रधानमंत्री आईएचसी को विकसित करने में बहुत दिलचस्पी ली। उन्होंने ख़ुद इस का अध्यक्ष पद भी संभाला।
तो इस पृष्ठभूमि को देखते हुए आईएचसी के क्षितिज पर जो लालिमा आज नज़र आनी चाहिए, क्या आप को दिखाई दे रही है? मुझे तो नहीं याद, अगर आप को हो तो बताइएगा, कि पिछले एक दशक में कौन-सा बड़ा अंतरराष्ट्रीय सेमिनार आईएचसी में हुआ है? टेरी का नियमित सालाना आयोजन ‘वर्ल्ड सस्टेनेबल डेवलपमेंट समिट’ यहां हुआ करता था। इस साल उसे भी ताज पैलेस होटल में स्थानांतरित कर दिया गया। आईएचसी परिसर में दफ़्तरों पर कब्जा जमाए बैठी ज़्यादातर संस्थाओं के कामकाज के बारे में क्या कोई चर्चा कभी आप के कानों में पड़ती है? हो सकता है कि वे तमाम संस्थान बड़े-बड़े आधारभूत-यज्ञों में व्यस्त हों, मगर आईएचसी को उन की वज़ह से नहीं, उस की खान-पान सुविधाओं के कारण आज क्यों ज़्यादा जाना जाता है?
क्या यह सवाल नहीं उठना चाहिए कि, भले ही इन में से कुछ के नाम अब बदल गए हैं, क्या द ऑल अमेरिकन डिनर, ओरिएंट एक्सप्रेस, द डाइन डेन, डेल्ही ओ डेल्ही, इतालवी और लेबनानी भोजन परोसने वाले ‘मेड’, चीनी और थाई भोजन के लिए मशहूर ‘ईस्ट’, हैबिटेट हब और हैबिटेरिया की रसरंजन-क्रियाएं आईएचसी का मुखपृष्ठ बनना चाहिए? क्या यह समीक्षा नहीं होनी चाहिए कि आएचसी की कला दीर्घा में किस स्तर की कला प्रदर्शनियां लगती हैं? उस के खुले थिएटर में कौन-से नाटक मंचित होते हैं, कौन-से संगीत कार्यक्रम आयोजित होते हैं, कौन-से शास्त्रीय नृत्य होते हैं, कौन-से कविता पाठ होते हैं और कितने उभरते कलाकारों को मंच उपलब्ध कराने का काम आईएचसी ने किया है? उस के जिम, स्विमिंग पूल और इनडोर खेल सुविधाओं का उपयोग कौन कर रहे हैं?
आईएचसी का काम अपने सदस्यों को स्पा, सोना-बाथ, स्टीम रूम, जिम और रूफटाप स्विमिंग पूल की सुविधाएं देना होना चाहिए या नहीं – आप ही बताइए। पूछने वालों को यह पूछने का हक़ है कि उस के सदस्यों और मेहमानों के लिए हैबिटेट रेसीडेंसी के सस्ती दरों पर मिलने वाले 48 कमरों, सुइट और अपार्टमेंट्स की ज़रूरत क्यों है? क्या इन के उपयोग के बारे में कभी कोई समीक्षा की गई है? कला दीर्घा का किराया तो 20 हज़ार रुपए प्रतिदिन है, मुक्ताकाशी थिएटर का किराया 15 हज़ार रुपए रोज़ है, संगोष्ठी कक्ष और सम्मेलन कक्ष के किराए 15 से 25 हज़ार रुपए प्रति शिफ्ट हैं, मगर आधुनिक सज्जाओं वाला डबल अपार्टमेंट 7 हज़ार रुपए प्रतिदिन में मिल जाता है। इन विरोधाभासों के लिए तो राजीव गांधी की सरकार ने ने आईएचसी को आज तक़रीबन 60 अरब रुपए का मूल्य रखने वाली साढ़े 9 एकड़ ज़मीन आवंटित नहीं की होगी! सालाना क़रीब एक अरब रुपए की सकल-कमाई करने वाले और लाभरहित आधार पर संचालित होने वाले किसी भी संस्थान को अपने बुनियादी लक्ष्यों से संबंधित कामकाज की सालाना समीक्षा रपट सार्वजनिक करनी चाहिए या नहीं?
आवास और शहरी विकास मंत्रालय के सचिव आईएचसी के पदेन-अध्यक्ष होते हैं। इस वक़्त गुजरात काडर के आईएएस अधिकारी यह ज़िम्मेदारी संभाल रहे हैं। प्रबंधन समिति में हुडको, टेरी, एनएचबी, सार्वजनिक निगमों वग़ैरह के अधिकारी होते हैं। आईएचसी के निदेशक की नियुक्ति उस की गवर्निंग काउंसिल करती है। निदेशक को काफी मोटी तनख़्वाह, आतिथ्य और मनोरंजन भत्ता, लुटियन दिल्ली में रहने के लिए बंगला, जाने-आने के लिए ड्राइवर वाली गाड़ी, चिकित्सा सुविधाएं, हवाई यात्रा, रहने के लिए प्रीमियम होटल वग़ैरह सारा कुछ मिलता है। आजकल के. जी. सुरेश आईएचसी के निदेशक हैं। वे मूलतः पत्रकार हैं। मैं जब नवभारत टाइम्स में विशेष संवाददाता था तो वे समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया के संवाददाता थे। उस के बाद कुछ साल उन्होंने एक निजी कॉर्पोरेट कंपनी और विवेकानंद फाउंडेशन के साथ काम किया। फिर 2014 में दूरदर्शन में सलाहकार संपादक बन गए। 2016 में उन्हें भारतीय जनसंचार संस्थान का महानिदेशक बनाया गया। वहां से कार्यकाल ख़त्म होने के बाद 2020 में भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति बने। पिछले साल अप्रैल में उन्हें इंडिया हैबिटेट सेंटर की ज़िम्मेदारी दे दी गई। निदेशक का कार्यकाल 5 साल का होता है।
तो यह है दास्तान-ए-आईएचसी। लेकिन एक आईएचसी की ही क्यों बात करना? देश की राजधानी में ऐसे एक-से-बढ़कर-एक क्लब हैं, जो सरकारी ज़मीनों पर लहलहा रहे हैं। वे लहलहा रहे हैं तो उन के साथ बहुत-से लोगों के गाल गुलाबी हैं और पांचों उंगलियां घी में हैं। इंडिया गेट से सटा साढ़े 8 एकड़ का नेशनल स्पोटर्स क्लब आॅफ इंडिया (एनएससीआई) और संसद भवन की दीवार से लगा 5 एकड़ का चेम्सफोर्ड क्लब भी सरकार की दी हुई ज़मीन पर बना हुआ है। बेशकीमती राजनयिक इलाके चाणक्यपुरी में साढ़े 4 एकड़ का सिविल सर्विसेज़ आॅफिसर्स इंस्टीट्यूट (सीएसओई) और कस्तूरबा गांधी मार्ग पर इंडिया गेट को स्पर्श करता पुराना सीएसओआई क्लब भी सरकारी भूमि पर वर्ज़िश कर रहे हैं। रेलवे की ज़मीन पर भी दिल्ली में कम-से-कम तीन क्लब बने हुए हैं। सरदार पटेल मार्ग पर 3 एकड़ भूमि पर, नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास पंचकुइयां मार्ग पर सवा एकड़ ज़मीन पर और तिलक ब्रिज पर डेढ़ एकड़ ज़मीन पर।
ऐसे क्लब देश भर के हर प्रदेश में और हर प्रमुख शहर में लहर-लहर लहरा रहे हैं। उन में से हर एक की बावड़ी में मीठे-खारे पानी के किस्से-कहानियां हैं। इतनी कि रातें बीतती जाएं और वे ख़त्म होने का नाम ही न लें। सो, कितना तो मैं सुनाऊं और कितना आप सुन पाएंगे? ये पांच दिनों से तो मैं इन केलिभवनों को ऊपर-ऊपर से छू-छू कर गुज़रा हूं। उन के अधोलोक की अगर विस्तार से आप को सैर कराऊं तो महीनों निकल जाएंगे। आपाधापी की दुनिया में न इतना वक़्त आप के पास है, न मेरे पास। सो, कल इस श्रंखला की अंतिम किश्त और पढ़ लीजिएगा। क्योंकि और भी दुःख हैं ज़माने में इन सब के सिवा। ‘तू है तो दरख़्शां है हयात’ का दौर अब चला गया। दशकों से चलते-चलते हम उस मोड़ पर आ गए हैं कि न कुछ निगलते बन रहा है, न कुछ उगलते। सो, हर हफ्ते इस मोड़ का किस्सा भी तो लिखना है।


