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अन्ना से धोखा खाया काक्रोच से नहीं खाएं !

2014 में या उससे पहले 2013 में दिल्ली में नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल क्या बिना अन्ना के आन्दोलन के प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री बन सकते थे?… जब देश का युवा और छात्र राहुल गांधी के साथ खड़ा हुआ है अचानक एक पार्टी का पैदा हो जाना और बड़े तामझाम के साथ शनिवार 6 जून को उसके जन्तर मन्तर पर कार्यक्रम की तैयारी से अभी तक किसी के समझ में नहीं आया है कि इसके पीछे कौन है?

जयप्रकाश से लेकर वीपी सिंह का बोफोर्स पर झूठ और फिर अन्ना हजारे के नकली आन्दोलन तक किसी को पता नहीं था कि इसके पीछे कौन है और कौन इतनी सारी व्यवस्थाएं जुटा रहा है।

ऐसे ही उस समय जब देश का युवा और छात्र राहुल गांधी के साथ खड़ा हुआ है अचानक एक पार्टी का पैदा हो जाना और बड़े तामझाम के साथ शनिवार 6 जून को उसके जन्तर मन्तर पर कार्यक्रम की तैयारी से अभी तक किसी के समझ में नहीं आया है कि इसके पीछे कौन है?

लेकिन सवाल इतना मुश्किल नहीं है। जेपी के आन्दोलन और उससे पहले लोहिया के गैर कांग्रेसवाद, वीपी, अन्ना इन सबसे फायदा किस को हुआ?  क्राइम का सवाल होता है बेनिफिशरी ( लाभान्वित) कौन?

कुल मिलाकर संघ परिवार। और संघ से जनसंघ और फिर भाजपा। 2014 में या उससे पहले 2013 में दिल्ली में नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल क्या बिना अन्ना के आन्दोलन के प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री बन सकते थे? मोदी तो कभी जवाब नहीं देंगे मगर केजरीवाल चाहें तो देकर अपने सारे पापों का प्रायश्चित कर सकते हैं कि अन्ना को कौन लाया था? वे किसके इशारे पर काम करते थे? और अब 12 साल से चुप क्यों हैं?

लेकिन हां! 12 साल की आपराधिक चुप्पी जरूर है मगर इस समय इस नए तमाशे में उन्हें या उन जैसे किसी दूसरे को लाया जा सकता है।

एक चेहरा भाजपा-संघ को हमेशा चाहिए होता है जिस पर वे लोगों का विश्वास जमा सकें। कितनी अजीब बात है कि आरएसएस सौ साल का हो गया लेकिन एक चेहरा वे ऐसा नहीं कर पाए जिस पर जनता भरोसा कर ले।

लोहिया, जयप्रकाश, वीपी सिंह यह तीनों तो कांग्रेसी ही थे। और अन्ना तो एक इतने महत्वहीन आदमी थे जो रामलीला मैदान में आने से पहले और मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद कभी दिखे ही नहीं। न ही किसी ने देखने, ढूंढने की कोशिश की।

इस बार अभी तक वह चेहरा सामने नहीं आया है जिसकी दम पर राहुल का पूरा बना बनाया माहौल खराब करना है। सामने तो अभी वह शख्स भी नहीं आया जो काक्रोच जनता पार्टी का संस्थापक अध्यक्ष बताया जा रहा है। अभिजीत दीपके नाम है उसका। और वह अमेरिका से सीधा 6 जून को ही जन्तर मन्तर आएगा।

सोचिए अभी बंदा भारत नहीं आया है लेकिन उसके पता नहीं कितने इंटरव्यू हो गए हैं। उसके फोटो के जरिए उसकी पहचान दूर दूर तक करवा दी गई है। मतलब फिल्म रिलिज होने से पहले स्टार बना दिया गया है। यहां आदमी पूरी जिन्दगी समाज का देश का किसानों का मजदूरों का काम करते रह जाता है मोहल्ले के लोग भी उसे नहीं पहचानते। और इधर पूरे देश में और देश में क्या विदेशों में भी उसकी पहचान करवा दी गई है।

वीपी सिंह और अन्ना को भी इसी तरह हीरो बनाया गया था। लेकिन इसके बाद जो युवाओं का मोहभंग हुआ उसका असर अभी तक था। मगर नीट के पेपर लीक होने और बारहवीं की परीक्षा सीबीएसई में तमाम धांधलियों के बाद स्टूडेंट थोड़ा सचेत हुआ है। कुछ उसके मां बाप भी। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से मिले। और राहुल ने उनकी आवाज उठाई। शिक्षा मंत्री धर्मेंन्द्र प्रधान का इस्तीफा मांगा। देश में स्टूडेंट के पक्ष में एक माहौल बना। युवाओं की बेरोजगारी की भयानक समस्या पर भी लोगों का ध्यान गया। इस तरह जब युवाओं और छात्रों की समस्याओं पर फोकस हो रहा था तो दो घटानाएं बहुत प्रमुख हुईं।

एक इन पर से ध्यान हटाने के लिए एक टीवी एंकर ने नीट और सीबीएसई पर सवाल उठाने के बदले शिक्षकों को कौड़ी का बता दिया। खैर इसका जवाब तो देश भर के टीचरों ने बहुत अच्छा दे दिया। और लंबे समय बाद यह बात सबके सामने आई कि हमारे टीचर चाहे वह आनलाइन पढ़ा रहे हों, या कोचिंग में या क्लास में कितने जानकार और पढ़े लिखे हैं।

उन्होंने इतने तर्क के साथ गोदी मीडिया को बेकनाब कर दिया जो 12 साल में नहीं हो पाया था। गोदी मीडिया के साथ प्रधानमंत्री मोदी भी शिक्षकों और स्टूडेंट के हमलों से नहीं बच पाए कि उन्होंने आखिर इतने सालों में शिक्षा और रोजगार के लिए क्या किया है?

जो बारहवीं की परीक्षा देश भर के तमाम बोर्डों और सेन्ट्रल के बोर्डों से हमेशा बिना किसी विवाद के होती रही है वह अचानक समस्याओं से कैसे घिर गई? इसी तरह मेडिकल में प्रवेश की परीक्षा के पेपर लीक कैसे हो रहे हैं? दूसरी तमाम प्रवेश परिक्षाएं और नौकरी की परिक्षाओं के भी पेपर लीक की शिकायतें क्यों आ रही हैं?

प्रधानमंत्री ने न इसका जवाब दिया न अपने शिक्षा मंत्री को हटाया। पता नहीं कैसे सोच रहे हैं कि यह मामला भी टल जाएगा। गोदी मीडिया के जरिए जो कोशिश की थी उससे तो मामला खत्म नहीं हुआ।  इसलिए शायद अब इस दूसरी कोशिश जन्तर मन्तर की सभा पर निगाहें हैं।

यह दूसरी प्रमुख घटना है। देश के साथ एक और बड़े धोखे की तैयारी। अभी तक सारे आन्दोलन जो बताए ऊपर लोहिया, जयप्रकाश, वीपी, अन्ना सब कांग्रेस को हटाने के लिए थे।

काक्रोच पार्टी का यह पहला होगा जब कांग्रेस सत्ता में नहीं है। तो क्या यह मोदी को हटाने के लिए होगा? अभी तक किसी संकेत से ऐसा नहीं लग रहा है। गोदी मीडिया पूरी तरह काक्रोच जनता पार्टी का साथ दे रही है। अगर यह आन्दोलन मोदी के खिलाफ होता तो क्या गोदी मीडिया इसका समर्थन करती?

इसकी पहली प्रेस कान्फ्रेंस कान्स्टिटयूशन क्लब में हुई। बता दें कि यहां जगह किसी संसद सदस्य के नाम पर ही मिलती है। अब यह मालूम करना पड़ेगा कि किसने इस जगह के लिए अपने नाम से बुकिंग करवाई?  अन्ना हजारे के सारे कार्यक्रमों के पीछे आरएसएस के लोग होते थे। इतने बड़े वकील मगर बहुत भोले होकर कह रहे थे प्रशांत भूषण की बाद में हमें मालूम पड़ा कि आंदोलन के सारे संसाधन संघ जुटाता था। जबकि जानने वालों को यह बात पहले से मालूम थी। और हमने तो खूब लिखा भी था। युवा लड़के लड़कियां सब पागल हो रहे थे। आफिस में हमसे कहते थे सर अन्ना के लिए एक बार तो अच्छा अच्छा लिख दो।

खैर हम तो बहुत पहले से कह रहे हैं कि लोहिया से लेकर जेपी, वीपी, अन्ना सारे आन्दोलन नकारात्मक थे। युवाओं को बेवकूफ बनाने के लिए। लोहिया के बारे में तो सुनते थे। उस समय छोटे थे। बाद में पढ़ा भी। मगर जेपी से लेकर तो सब खुद देखा। जेपी का विरोध तो उस समय के हमारे सारे कालेज के साथियों को मालूम है। कालेज में नीरज को जेपी के समर्थन में कविता नहीं पढ़ने दी थी। आज तो सब मान गए हैं कि इन लोगों ने केवल भाजपा को फायदा पहुंचाने के लिए यह सारे आन्दोलन किए थे।

हमारे यहां लोग तमाशों, भावुक बातों से बहुत जल्दी प्रभावित हो जाते हैं। 6 जून शनिवार को बड़ा तमाशा होगा। अगर देश उससे बच गया तो कुछ गंभीर बातों वास्तविक समस्याओं पर बात हो सकेगी। नहीं तो असली मुद्दो से फिर ध्यान बट जाएगा।

दो दिन बाद 8 जून को इंडिया गठबंधन की बड़ी मीटिंग दिल्ली में हो रही है। बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे इसमें होंगे। 2024 के लोकसभा चुनाव में इसी विपक्षी एकता की वजह से मोदी 240 पर रूक गए थे। पिछले दो चुनावों 2014 और 2019 में अपनी दम पर जो बहुमत मिल रहा था वह नहीं मिल पाया था। लेकिन 2014 के बाद वह एकता फिर नहीं दिखी। लेकिन बंगाल में जिस तरह टीएमसी टूटी है उसके बाद विपक्ष के सारे दलों को अपनी चिंता होने लगी है। राहुल जिस तरह हिम्मत से मोदी का मुकाबला कर रहे हैं उससे उनकी हिम्मत थोड़ी बंधी हुई है।

विपक्ष को देखना है कि 6 तारीख का प्रभाव उसकी 8 तारीख की मीटिंग पर नहीं पड़े। जनता के वास्तविक मुद्दों पर विपक्ष डटा रहे। और जैसा राहुल कह रहे हैं कि मोदी अब रहने वाले नहीं है एक साल में चले जाएंगे उस पर ही ध्यान केन्द्रित करके इस नए आन्दोलन को अपने समानान्तर नहीं खड़ा होने दें।

By शकील अख़्तर

स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स के पूर्व राजनीतिक संपादक और ब्यूरो चीफ। कोई 45 वर्षों का पत्रकारिता अनुभव। सन् 1990 से 2000 के कश्मीर के मुश्किल भरे दस वर्षों में कश्मीर के रहते हुए घाटी को कवर किया।

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