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सौदे की ताक़त खोई, फिर भी कह रहे ‘जीत हमारी’ !

नई दिल्ली आज जिस बदलाव को ऐतिहासिक रीसेटबता रही है, उसका असली मतलब सीमित है। अमेरिका ने भारतीय निर्यात पर टैरिफ़ 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने पर सहमति दी है। यह राहत है, लेकिन बहुत छोटी। खासकर तब, जब 2019 से पहले भारत को शून्य शुल्क का लाभ मिलता था। इतना ही नहीं भारत ने कई अहम क्षेत्रों में बाज़ार खोलने का वादा किया हैकृषि, चिकित्सा उपकरण, डिजिटल व्यापार और ऊर्जा।

सतीश झा

कभी भारत अपनी व्यापार कूटनीति को लेकर आत्मविश्वास से भरा दिखाई देता था। बड़ा घरेलू बाज़ार, विशाल जनसंख्या और बढ़ती विनिर्माण महत्वाकांक्षा—इन सबको भारत अपनी सौदेबाज़ी की ताक़त मानता रहा। कुछ समय तक यह रणनीति काम भी आई।

तभी अमेरिका की जनरलाइज़्ड सिस्टम ऑफ़ प्रेफ़रेंसेज़ (GSP) योजना के तहत भारत के 3,500 से अधिक उत्पाद अमेरिकी बाज़ार में बिना शुल्क के प्रवेश करते थे। इससे भारत के कपडा, इंजीनियरिंग सामान, चमड़ा, रत्न-आभूषण और छोटे उद्योगों को बड़ा सहारा मिला। 2018 में भारत ने इस व्यवस्था के तहत लगभग 6.3 अरब डॉलर का निर्यात किया था।

लेकिन 2019 में यह लाभ अचानक खत्म हो गया। अमेरिका ने भारत से GSP का दर्जा वापस ले लिया। वजह बताई गई—अमेरिकी डेयरी उत्पादों, चिकित्सा उपकरणों और डिजिटल सेवाओं को भारतीय बाज़ार में पर्याप्त पहुँच न मिलना। यह नुकसान टाला जा सकता था। लेकिन भारत ने अपनी रणनीतिक अहमियत को ज़्यादा आँका और यह मान लिया कि अमेरिका दबाव नहीं बनाएगा। यह आकलन गलत साबित हुआ।

पाँच साल बाद भी भारत वह स्थिति वापस हासिल नहीं कर सका। इसके बावजूद नई दिल्ली आज जिस बदलाव को “ऐतिहासिक रीसेट” बता रही है, उसका असली मतलब सीमित है। अमेरिका ने भारतीय निर्यात पर टैरिफ़ 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने पर सहमति दी है। यह राहत है, लेकिन बहुत छोटी। खासकर तब, जब पहले भारत को शून्य शुल्क का लाभ मिलता था।

इसके बदले भारत ने कई अहम क्षेत्रों में बाज़ार खोलने का वादा किया है—कृषि, चिकित्सा उपकरण, डिजिटल व्यापार और ऊर्जा। साथ ही भारत ने संकेत दिया है कि वह रियायती रूसी तेल आयात को धीरे-धीरे कम करेगा, जिसने 2022 के बाद घरेलू ईंधन कीमतों को नियंत्रित रखने में बड़ी भूमिका निभाई थी।

कूटनीतिक तौर पर यह सौदा सकारात्मक दिखाया जा रहा है, लेकिन आर्थिक असर उतना सहज नहीं है। जिन श्रम-प्रधान उद्योगों को GSP से सबसे ज़्यादा फायदा हुआ था, वही आज सबसे अधिक दबाव में हैं। निर्यात से होने वाला मुनाफ़ा घटा है, नए ऑर्डर कम हैं और निवेशक असमंजस में हैं। MSME क्षेत्र, जो विनिर्माण रोज़गार का लगभग 45 प्रतिशत देता है, बढ़ती लागत और कम कीमत तय करने की क्षमता से जूझ रहा है।

आम लोगों पर इसका असर सीधे पड़ता है। मुंबई का ऑटो चालक या बिहार का छोटा दुकानदार टैरिफ़ नहीं समझता, लेकिन महँगा ईंधन, बढ़ता किराया और रोज़मर्रा की महँगाई ज़रूर महसूस करता है। सस्ते इलेक्ट्रॉनिक सामान से मिलने वाला सीमित लाभ, भोजन, परिवहन और ऊर्जा की बढ़ती लागत में दब जाता है।

यूरोप के साथ स्थिति भी बहुत अलग नहीं है। 2026 में यूरोपीय संघ ने भारत के GSP लाभ निलंबित कर दिए, जिससे भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते की बातचीत तेज़ हुई। इससे दवाइयों, आईटी सेवाओं और उन्नत विनिर्माण को लाभ मिलने की उम्मीद है। लेकिन बदले में जिन रियायतों की मांग है—ऑटोमोबाइल, कृषि, डेटा और सरकारी ख़रीद—वे भारत के कमज़ोर क्षेत्रों को समय से पहले वैश्विक प्रतिस्पर्धा के सामने खड़ा कर सकती हैं।

समस्या उदारीकरण नहीं है, असंतुलन है। जब बाज़ार खोलने की रफ़्तार घरेलू तैयारी से तेज़ होती है, तो असमानता बढ़ती है और राजनीतिक विरोध गहराता है। यह सब ऐसे समय हो रहा है, जब सरकार की वित्तीय स्थिति पहले से दबाव में है। सीमा शुल्क से होने वाली आय घटेगी, जबकि तेल आयात महँगा होने से चालू खाते पर दबाव बढ़ेगा। इससे बुनियादी ढाँचे, सामाजिक सुरक्षा और औद्योगिक नीति के लिए संसाधन सीमित होते जाएंगे।

यह तर्क वैश्वीकरण से पीछे हटने का नहीं है। बदलती वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में भारत को बड़ा मौका मिल सकता है। लेकिन इसके लिए सही क्रम ज़रूरी है—पहले घरेलू क्षमता, फिर बाज़ार खोलना; पहले प्रतिस्पर्धा, फिर रियायत। दक्षिण कोरिया, ताइवान और वियतनाम ने यही रास्ता अपनाया। भारत एक साथ बहुत सारे बदलाव करने की कोशिश कर रहा है, जो जोखिम भरा है।

असल मुद्दा सौदे की ताक़त का है। कुछ साल पहले भारत बेहतर स्थिति में बातचीत कर रहा था। आज वह ज़्यादा रियायतें दे रहा है और कम हासिल कर रहा है। ऊर्जा के मामले में उसकी स्वतंत्रता सिमट रही है और टैरिफ़ में छोटी कटौती को बड़ी जीत बताया जा रहा है, जबकि निर्यातक अब भी पिछड़े हालात में हैं। यह रणनीतिक उदारीकरण नहीं, बल्कि सौदे की ताक़त में कमी है।

भू-राजनीति में भारत की भूमिका अहम है, लेकिन सिर्फ़ रणनीतिक अहमियत से आर्थिक फायदा नहीं मिलता। अगर बातचीत मज़बूत न हो, तो रणनीतिक साझेदारी आर्थिक नुकसान में बदल सकती है। इतिहास बताता है कि जो देश ऐसा करते हैं, उन्हें लंबे समय में फायदा नहीं होता।

भारत को अपनी व्यापार नीति को दोबारा संतुलित करना होगा। समझौते ऐसे हों, जो घरेलू उद्योग को मज़बूत करें, न कि उसे समय से पहले जोखिम में डालें। तकनीक, कौशल और उद्योग को साथ लेकर चलना होगा। व्यापार कूटनीति को ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी नीति और रोज़गार बदलाव से जोड़ना होगा।

अच्छे व्यापार समझौते देश की स्वतंत्रता बढ़ाते हैं। खराब समझौते उसे सीमित कर देते हैं। आज भारत दूसरे रास्ते के क़रीब दिखता है। इससे बाहर निकलने के लिए सिर्फ़ सुर्ख़ियाँ नहीं, बल्कि धैर्य, अनुशासन और स्पष्ट रणनीति चाहिए। तभी भारत अपने आकार को वास्तविक ताक़त में और महत्वाकांक्षा को टिकाऊ समृद्धि में बदल पाएगा।

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