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ईरान की शक्ति बनाम अमेरिका का खोखलापन!

आदर्श स्थिति वह होगी, जब व्यक्ति को सारी स्वतंत्रताएं एवं अधिकार एक साथ प्राप्त हों। मगर दुनिया में अब तक ऐसी कोई व्यवस्था नहीं बनी, जो यह सब सुनिश्चित कर सके। इस लिहाज से अब तक तमाम राजसत्ताएं एक किस्म की सौदेबाजी (trade-off) का उपकरण रही हैं। पलड़ा उन तबकों के हित में झुक जाता है, जिनका राजसत्ता पर नियंत्रण होता है।

गुजरे 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल के अवैध हमले से शुरू हुई जंग में ईरान ने रणनीतिक विजय हासिल कर ली है, दुनिया का शायद ही कोई गंभीर विश्लेषक अब इस बात से असहमत होगा। ऐसा नहीं होता, तो अमेरिका 39 दिन की लड़ाई के बाद ईरान की शर्तों पर युद्धविराम के लिए मजबूर नहीं होता। और दो हफ्तों की अवधि पूरी होने के बाद युद्धविराम को अनिश्चितकाल तक बढ़ाने की विवशता उसके सामने नहीं आती। प्रोफेसर रॉबर्ट ए. पेप जैसे युद्ध विशेषज्ञ इस बात का एलान कर चुके हैं कि इस लड़ाई ने ईरान को (अमेरिका, चीन, और रूस के बाद) दुनिया की चौथी बड़ी शक्ति (Great Power) के रूप स्थापित कर दिया है।

टीकाकारों का एक बहुत बड़ा हिस्सा यह देख कर अचंभित है कि जिस देश पर 47 साल से पश्चिमी देशों ने सख्त प्रतिबंध लगाए रखा और जिसके खिलाफ पूरा पश्चिम प्रचार तंत्र लगा रहा, वह ऐसी उपलब्धि कैसे हासिल कर सकता है! छवि तो यह बनाई गई थी कि ईरान धर्मांध सत्ता की गिरफ्त में है, जहां तकनीकी प्रगति या कुछ निर्मित कर सकने की क्षमता का होना तो दूर, रोजमर्रा की जिंदगी भी मुश्किल है। प्रतिबंधों से वहां रोजमर्रा की जिंदगी में दिक्कतें आईं, यह निर्विवाद है। इसके बावजूद ईरान ने दीर्घकलिक सोच के साथ अपनी रक्षा तैयारी की, अब यह भी एक सिद्ध तथ्य है। तो आखिर वह ऐसा कैसे कर पाया?

यह समझना आज संभवतः सबके लिए महत्त्वपूर्ण हो गया है। अतः इन बिंदुओं पर गौर किया जाना चाहिएः

  • बेशक, ईरान वैसी समाजवादी अर्थव्यवस्था नहीं है, जिनका विकास, प्रगति एवं जन-कल्याण को सुनिश्चित करने का रिकॉर्ड अतुलनीय रहा है। इसके बावजूद इस्लामी शासन के तहत चली अर्थव्यवस्था उस रूप में नव-उदारवादी और वित्तीयकृत भी नहीं रही है, जिसका पाठ ‘वॉशिंगटन आम-सहमति’ के तहत आईएमएफ-वर्ल्ड बैंक ने दुनिया को पढ़ाया और जिसे आज तक दुनिया के ज्यादातर देशों ने गले लगा रखा है।
  • ईरान में इस्लामी शासन के दौरान राज्य संचालित बहुत मजबूत अर्थव्यवस्था रही है।इस पर अकुशलता और भ्रष्टाचार के आरोप हैं। इसके बावजूद उस ढांचे के जरिए ईरान ने योजनाबद्ध सफलताएं हासिल की हैं। इसकी ही मिसाल अभी जारी युद्ध में देखने को मिली है।
  • ईरानी अर्थव्यवस्था में ‘कमांडिंग हाइट्स’ (अर्थव्यवस्था के बुनियादी क्षेत्रों) पर राज्य का नियंत्रण है। इन क्षेत्रों में तेल और गैस, बैंकिंग, बीमा, यूटिलिटीज (बिजली- पानी जैसी सेवाएं) और विदेशी व्यापार शामिल हैं। कुछ अनुमानों के अनुसार राज्य और उससे संबंधित संस्थाएं अर्थव्यवस्था केतकरीबन 80 प्रतिशत हिस्से को नियंत्रित करती हैं।
  • ईरान में राज्य प्राथमिक नियोक्ता (primary investor) है। वहां40 लाख से अधिक सरकारी कर्मचारी हैं। सभी सार्वजनिक उपक्रमों (SOEs) को भी शामिल किया जाए, तो यह संख्या संभवतः 80 लाख तक पहुंच जाती है। यानी तीन करोड़ से अधिक आबादी की आजीविका सार्वजनिक क्षेत्र से चलती है। तकरीबन नौ करोड़ की आबादी वाले देश के लिहाज से यह बहुत बड़ी संख्या है।

अपनी इस अर्थव्यवस्था के कारण ईरान वह आंतरिक शक्ति निर्मित कर पाया, जिसने दुनिया की कथित सबसे बड़ी सैन्य महाशक्ति की सीमाओं को आज दुनिया के सामने बेनकाब कर दिया है। इसलिए यह वाजिब है कि ये आर्थिक मॉडल अब दुनिया में चर्चा और आकर्षण का विषय बनेगा।

दरअसल, यह सिर्फ संयोग नहीं है कि गुजरे अनेक वर्षों से- और विशेषकर डॉनल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका ने जिन देशों को अपना प्रमुख निशाना बनाया है, वे सभी वो हैं, जिन्होंने ‘एक-ध्रुवीय दुनिया’ और नव-उदारवाद के दौर में उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण की नीतियों का अंध-अनुकरण नहीं किया। वेनेजुएला और क्यूबा इसके दो उत्कृष्ट उदाहरण हैं। चीन उसकी सबसे बड़ी मिसाल है। इन उदाहरणों से यह प्रश्न प्रासंगिक हुआ है कि क्या अमेरिका का मौजूदा युद्ध असल में उस आर्थिक या विकास मॉडल के खिलाफ है, जो देशों को आत्म-निर्भर बनाता है, और जिसकी वजह से संबंधित देश अपनी संप्रभुता जता पाने में सक्षम बनते हैं?

इस नजरिए से देखें, तो कहा जा सकता है कि पश्चिम की सबसे प्रमुख चिंता संभवतः यह नहीं है कि वह चीन से आर्थिक, तकनीकी, या सैन्य रूप से पिछड़ता जा रहा है। बल्कि उसकी चिंता यह सवाल है कि चीन की ‘जीत’ आखिर किस “बात” को मान्यता प्रदान करेगी? साठ साल से सख्त प्रतिबंधों के बीच विभिन्न क्षेत्रों में अपनी अभूतपूर्व सफलताओं के साथ क्यूबा और दो दशक में अपनी जनता के जीवन स्तर में उल्लेखनीय सुधार के साथ वेनेजुएला भी उसी “बात” की पुष्टि करते दिख रहे थे।

ये बात हैः सामूहिक सोच, जिसमें व्यक्ति को सामाजिक हितों से अपेक्षाकृत कम प्राथमिकता दी जाती है। दर-हकीकत, जब अमेरिकी राजनेता या कारोबारी कहते हैं कि वे “चीन के वर्चस्व वाली दुनिया में नहीं रहना चाहते”, तो उसके पीछे छिपी उनकी बेचैनी का एक विशेष अर्थ होता है। “चीन” से उनका अर्थ ऐसी व्यवस्था से होता है, जिसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता (जिसका व्यावहारिक अर्थ पूंजी या पूंजीपति की स्वतंत्रता होता है) को सामूहिकता या सामाजिक समन्वय की भावना से समझौता करना होता है। एक ऐसी व्यवस्था, जो पूंजी, श्रम और योजना के बीच खास तालमेल से चलती है। अतीत में अनेक देशों ने अपने ऐसे प्रयोग को समाजवाद कहा, चीन इसे ‘चीनी प्रकृति का समाजवाद’ (Socialism with Chinese characteristic) कहता है।

आज दुनिया देख यह रही है कि वह व्यवस्था कैसे उस आर्थिक ढांचे से बेहतर प्रदर्शन कर रही है, जिसमें व्यक्ति (पूंजीपति) और कॉरपोरेट की प्रधानता बनी रहती है। आरंभिक दशकों में प्रगति एवं जन-केंद्रित विकास के कीर्तिमान स्थापित करने के बाद सोवियत संघ अपने आखिरी दशकों में उभरी कई आर्थिक चुनौतियों का प्रभावी हल नहीं ढूंढ सका। इससे पश्चिमी पूंजीवाद को अपनी श्रेष्ठता प्रचारित करने का मौका मिला था। लेकिन चीन ने बाजार और राजकीय नियोजन आधारित अपने विशेष प्रयोग से ऐसा ढांचा कायम किया है, जो उस श्रेष्ठता की धारणा को तोड़ रहा है।

पश्चिमी पूंजीवाद इन तीन मूलभूत मान्यताओं पर खड़ा रहा हैः

  • व्यक्ति सशक्तीकरण से सामाजिक ताकत बढ़ती है
  • मुक्त बाजार आधारित अर्थव्यवस्था राज्य नियोजित बाजार से बेहतर प्रदर्शन करती है, और
  • व्यक्ति के राजनीतिक अधिकार उसके सामाजिक-आर्थिक अधिकारों से अधिक महत्त्वपूर्ण हैँ

अब लंबे तजुर्बे के आधार पर हम कह सकने की स्थिति में हैं कि इस पश्चिमी सोच का स्वाभाविक परिणाम Winner Takes it All (जीतने वाला सब कुछ ले जाता है) के रूप में आता है, जिसे पूंजीवादी व्यवस्था में गलत नहीं माना जाता। इस होड़ में जो पिछड़ गए, वहां इसकी चिंता नहीं की जाती। जिनके श्रम के मूल्य को चुरा लिया गया, उनके बारे में सोचने की आवश्यकता वहां महसूस नहीं की जाती।

‘इतिहास के अंत’ की घोषणा के दौर में वॉशिंगटन और नव-उदारवाद के अन्य केंद्रीय स्थलों में यह समझा गया कि चूंकि सारी दुनिया में अब यही सिस्टम चलेगा, इसलिए पीछे छूटे तथा श्रम चोरी के शिकार लोगों की चिंता को अंतिम रूप से दफनाया जा सकता है। तब समझा गया था कि ऐसी व्यवस्थाओं के दिन अब गिने-चुने हैं, जो अपनी वैधता (legitimacy) आम जन के जीवन स्तर में सुधार से प्राप्त करती हैं।

कुछ जुमले उस दौर में हावी रही सोच की कहानी बयान करते हैं। मसलन,

  • समाज नाम की कोई चीज नहीं होती- सिर्फ व्यक्ति और परिवार होते हैं (तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर ने 1987 में एक इंटरव्यू के दौरान ये कहा था।)
  • इसके पहले थैचर ये नारा उछाल चुकी थीं कि मुक्त बाज़ार, निजीकरण और कठोर आर्थिक सुधारों के अलावा अब कोई विकल्प नहीं है। (थैचर का ये नारा TINA- there is no alternative के रूप में चर्चित हुआ। इसके जरिए संदेश दिया गया कि समाजवाद जैसे विकल्प विफल हो चुके हैं।)
  • सरकार किसी समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि सरकार ही समस्या है (जनवरी, 1981 में अमेरिका के राष्ट्रपति पद की शपथ लेते समय रोनाल्ड रेगन ने कहा था)
  • उपरोक्त सोच को ही मान्य बनाने की कोशिश में 1991 में तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ। मनमोहन सिंह ने फ्रेंच राजनीतिक विचारक विक्टर ह्यूगो के इस कथन का उल्लेख किया कि ‘जिस विचार का समय आ गया हो, उसे रोका नहीं जा सकता।’

उल्लेखनीय है कि रेगन और थैचर नव-उदारवाद के प्रतीक चेहरे रहे हैं। मगर उनके कथनों के जरिए जिन नीतियों को मान्य बनाने के प्रयास हुए, आज वे लहू-लुहान खड़ी हैं। TINA के नारे को सच मान कर मुक्त बाजार की राह पर चले देश उत्पादन, रोजगार और उपभोग के मोर्चों पर कठिन समस्याओं से जूझते नजर आते हैँ। अभूतपूर्व आर्थिक विषमता और श्रमिक वर्ग के गिरते जीवन स्तर से ना सिर्फ वहां सामाजिक अशांति का माहौल है, बल्कि वह राजनीतिक लोकतंत्र एवं व्यक्ति की राजनीतिक स्वतंत्रताएं भी खतरे में पड़ी हुई हैं, जबकि इनको ही ये देश अपनी विशेषता बताते थे।

उनके बरक्स नियोजन, सार्वजनिक क्षेत्र, और सरकार की महत्त्वपूर्ण आर्थिक भूमिका के साथ चले गिने-चुने देश हैं, जिनसे विकास एवं प्रगति के पैमानों पर मुकाबला करने में अमेरिका और यूरोप के धनी देश भी खुद को अक्षम पा रहे हैं। अमेरिका की सारी सैन्य आक्रामकता के पीछे दरअसल यही अक्षमता और इस कारण दुनिया पर वर्चस्व टूटने का भाव है।

पश्चिम ने एक-ध्रुवीयता के दौर में दुनिया को लोकतंत्र बनाम तनाशाही (democracy v/s authoritarianism) के द्वि-विकल्पों (Binary Choice) में बांटने का नजरिया फैलाया। जो देश पूंजी को नियंत्रित कर आर्थिक एवं सामाजिक न्याय के लक्ष्यों को हासिल करने के मकसद से अपनी अर्थव्यवस्था को नियोजित करने की राह पर चले, उन्हें authoritarian (तानाशाही व्यवस्था) बताया गया। पूंजी की राह मुक्त करने वाली व्यवस्थाओं को लोकतंत्र कहा गया। बिना इस सवाल में गए कि ऐसी व्यवस्थाओं में आखिर आबादी का कितना हिस्सा सचमुच संविधान में लिखित राजनीतिक अधिकारों का उपभोग करने योग्य होता है?

इसीलिए आज जब झांग वेई वेई जैसे चीनी विचारक लोकतंत्र बनाम तानाशाही की binary को फर्जी और शासक वर्ग के हित में गढ़ी गई धारणा बताते हैं, तो उनकी बात ध्यान देने योग्य लगती है। उनकी इस बात में भी दम नजर आता है कि असल binary सुशासन (good governance) और कुशासन (bad governance) के बीच है। सुशासन से अर्थ उस शासन व्यवस्था से है, जिसके केंद्र में आम मेहनतकश आवाम के हित हों। कुशासन वो व्यवस्था है, जिसमें नियोजन एवं संगठन का अभाव हो- इसलिए वो व्यवस्था समग्र सामाजिक एवं मानव विकास सुनिश्चित करने में विफल रहती है।

विकास और स्वतंत्रता एक दूसरे से जुड़े तकाजे हैं, इस बात की विस्तृत व्याख्या अर्थशास्त्री एवं विचारक अमर्त्य सेन कर चुके हैं। विकास वह है, जो व्यक्तियों की अ-स्वतंत्रताओं (un-freedoms) को क्रमिक रूप से हटाए। गुजरी एक सदी के अनुभव के आधार पर अब कहा जा सकता है कि भूख, मौसम की मार, अशिक्षा, सार्वजनिक सेवाओं का अभाव आदि ऐसी अ-स्वतंत्रताओं हैं, जिनके रहते वोट देने या अभिव्यक्ति के अधिकार बेमायने हो जाते हैं।

आदर्श स्थिति वह होगी, जब व्यक्ति को सारी स्वतंत्रताएं एवं अधिकार एक साथ प्राप्त हों। मगर दुनिया में अब तक ऐसी कोई व्यवस्था नहीं बनी, जो यह सब सुनिश्चित कर सके। इस लिहाज से अब तक तमाम राजसत्ताएं एक किस्म की सौदेबाजी (trade-off) का उपकरण रही हैं। पलड़ा उन तबकों के हित में झुक जाता है, जिनका राजसत्ता पर नियंत्रण होता है। जहां राजसत्ता श्रमिक वर्ग की प्रतिनिधि शक्तियों के हाथ में आई, स्वाभाविक रूप से वहां मूलभूत अ-स्वतंत्रताओं को दूर करने को प्राथमिकता दी गई।

जहां राजसत्ता पर पूंजीपति और अभिजात्य वर्ग हावी हैं, वहां राजनीतिक अधिकारों को बहुसंख्यक जनता के हितों की अनदेखी की ढाल बनाया गया है। इस क्रम में नया यह हुआ है कि ताजा वस्तुगत हालात के बीच पूंजी नियंत्रित राजसत्ताएं राजनीतिक अधिकारों को भी संकुचित करती जा रही हैं। मजहब, राष्ट्रीयता, नस्ल और जाति की पहचान पर राजनीति को संगठित करने और नफरत को प्रमुख हथियार बनाने में मिली सफलता के कारण वे ऐसा करने में सफल हुई हैं।

बहरहाल, ऊपर कही गई बातें नई नहीं हैँ। सोवियत संघ जब मौजूद था, अधिकारों के संदर्भ में उपरोक्त तर्क दुनिया की बहुत बड़ी आबादी के बीच स्वीकार्य थे। लेकिन एक-ध्रुवीयता के दौर में इन बातों को हाशिये पर डालने की कोशिश हुई। लेकिन चीन, क्यूबा, वियतनाम, उत्तर कोरिया आदि की सफलताओं ने अब बात फिर पलट दी है। वेनेजुएला और लैटिन अमेरिका के कई अन्य देशों में ‘समाजवाद की दिशा में यात्रा’ (Movement towards Socialism) और कथित ‘21वीं सदी के समाजवाद’ के प्रयोगों ने एक नया विमर्श खड़ा किया है।

ईरान का संबंध ऐसे प्रयोगों से नहीं है। अधिक से अधिक वह उस dirigiste सिस्टम की मिसाल है, जैसी अर्थव्यवस्था आजादी के तुरंत बाद भारत में भी अपनाई गई थी। उस दौर में भारत ने भी विकास के मोर्चे पर महत्त्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कीं। ईरान ने मर्जी या मजबूरी से उस अर्थव्यवस्था को आज तक अपनाए रखा है। इसीलिए अमेरिका-इजराइल के खिलाफ उसकी सफलता का संदेश व्यापक महत्त्व का हो जाता है। इसका दायरा फौजी मोर्चे से आगे जाता हुआ अर्थ-जगत तक पहुंचता है। ठीक उसी तरह, जैसे दुनिया के सबसे धनी देश की बहु-आयामी विफलताओं ने उसकी नीतिगत प्राथमिकताओं पर रोशनी डाल रखी है। इससे लोगों को नजर आया है कि पूंजी के निर्बाध मुनाफे को तरजीह देना किसी देश को किस हद तक खोखला कर देता है!

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By सत्येन्द्र रंजन

वरिष्ठ पत्रकार। जनसत्ता में संपादकीय जिम्मेवारी सहित टीवी चैनल आदि का कोई साढ़े तीन दशक का अनुभव। विभिन्न विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता के शिक्षण और नया इंडिया में नियमित लेखन।

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