यह देश बहुत बड़ा और विविध शक्तियों, दुर्बलताओं वाला है। किसी के लिए भी अपने मंसूबे से इसे हाँक सकना एक संदिग्ध गणित है।… स्वत: स्पष्ट हो रहा है भाजपा के लिए चाल, चरित्र, हिन्दुत्व, संस्कृति, विवेकानन्द, आदि बस लोगों को लुभाने की बातें थीं। वह सब इस्तेमाल हो चुकने पर जब उन जुमलों में रस नहीं बचा, तो निचोड़े जा चुके ईख की भाँति विवेकाननद और शिवाजी को फेंक कर अम्बेडकर और फुले का पल्ला पकड़ लिया गया। क्या किसी अन्य राजनीतिक दल ने ऐसा विश्वासघात किया है?
क्या भाजपा इसी भरोसे है कि विपक्ष का चेहरा राहुल के रहने से उस की गद्दी सुरक्षित है? जबकि भाजपा नेताओं की साख गिरती जा रही है।
नवीनतम घटना हरदीप पुरी का एप्सटीन के साथ संबंध खुलना है। स्वयं अमेरिकी सरकार के न्यायिक विभाग ने वे फोटो और दस्तावेज सार्वजनिक किए थे, जिस में एक फोटो में पुरी एप्सटीन के साथ अकेले बातचीत कर रहे हैं। जबकि पहले पुरी ने सार्वजनिक कहा था कि एप्सटीन से उन्होंने कभी अलग से भेंट नहीं की। यह फोटो इधर फिर मीडिया में घुमाई गई, जब अमेरिकी विदेश मंत्री रूबियो भारत में बिजनेस दौरे पर थे। उन्होंने दिल्ली आकर प्रधानमंत्री से मिलने की औपचारिकता भी नहीं निभाई। वे सीधे मुंबई गये और अपना काम कर चले गये।
इस पूरे घटनाक्रम से ऐसा संदेश मिला मानो अमेरिकी सत्ताधारी भारतीय सत्ताधारियों को अपनी मुट्ठी में समझते हैं। पिछले साल 15 अक्तूबर राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा भारतीय नेता के बारे में यह कहना कि ‘मैं उन का कैरियर खत्म नहीं करना चाहता’ भी इस आशंका से मेल खाता है। यह कि अमेरिकी सरकार के पास ऐसी जानकारियाँ हैं, जो भारत को असहज कर सकती हैं। यदि यह बात नहीं है, तो भारत तरह-तरह के अमेरिकी दबाव को क्यों चुप सह रहा है?
यही नहीं, यहाँ भी एप्सटीन पर पुरी की सफाई गलत साबित होने पर भी वे सरकार में कैसे बने हुए हैं? उसी तरह, अंकिता भंडारी हत्याकांड के भी संदिग्ध आरोपी को ऐसा ऊँचा पद क्यों दे दिया गया जिस से उस पर पुलिस जाँच ही बंद हो जाए? वह आरोपी कोई बहुत बड़ी हस्ती भी नहीं जिस का राजनीतिक महत्व था। तब उस पर ऐसी असामान्य कृपा क्यों की गई?
यह सब अकेली घटनाएं नहीं जिस से सरकार और संघ-भाजपा की साख गिर रही है। गत जनवरी यूजीसी गाइडलाइन्स के बाद से सामान्य वर्ग के लोगों में भाजपा सत्ता द्वारा जाति-द्वेष फैलाने की बात बैठ रही है। सरकार द्वारा पक्के हिन्दू-द्वेषियों को नीति-विचार निर्माण में ऊँचे पद दिए गये हैं। इन कारणों से अब मोदी के पिछले जातिगत बयानों, फैसलों, ‘एससी-एसटी एक्ट’ पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश पलटने, आदि को भी नया अर्थ मिला है।
यह सब भाजपा के पुराने समर्थकों पर चोट ही नहीं, विश्वासघात भी महसूस किया जा रहा है। इस फैल रही भावना को सँभालने के लिए भाजपा नेताओं, मंत्रियों के पास विपक्ष को नीचा दिखाने की कोशिशों के सिवा कुछ विशेष नहीं दिख रहा। इस से भाजपा नेताओं की हनक निरंतर गिर रही है।
इसीलिए उन का ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ और ‘माँ-बेटे को जेल पहुँचाने’ का जुमला भी लुप्त हो गया है। अब अपने नेता की महानता बताने में कैबिनेट मंत्री और मुख्यमंत्री ही नियमित ट्वीट और बयान दे रहे हैं। क्योंकि आम समर्थक प्रचारकों में भारी उदासीनता है।
अतः प्रश्न — इस हाल में भाजपा बिना नेता बदले अगला लोक सभा चुनाव लड़ने का खतरा मोल लेगी? नेता बदलने से उस के साथ जुड़ी तमाम नकारात्मकता काफी-कुछ चली जाती है। जबकि फीके पड़ते नेता के बने रहने की जिद के साथ, विपक्षी की कितनी भी निन्दा करें तब भी उसे लाभ ही मिलेगा। राजनीतिक हवा जब बिगड़ती है तो वह किसी को गिराने उठाने में नीर-क्षीर विवेक नहीं करती!
भाजपा ने बरसों से अपना पूरा राजनीतिक अभियान राहुल गाँधी की हँसी उड़ाने पर टिकाये रखा है। इस में 2002-04 वाली भूल दुहराई जा रही है, जब वह सोनिया गाँधी का भी मजाक उड़ाती थी, कि जब तक कांग्रेस नेता सोनिया हैं तब तक भाजपा को चिन्ता की जरूरत नहीं। लेकिन उसी सोनिया ने वाजपेई को चित कर दिया था, और लगातार दस साल सत्ता पर नियंत्रण रखा।
अब फिर कुछ वैसा ही दौर है। भाजपा के कोर समर्थकों की खासी संख्या क्षुब्ध, उदासीन हो चुकी है। ऊपर से उन्हें मानो कोंच-कोंच कर अपमानित किया जा रहा है। संघ-भाजपा नेताओं ने वैसे विचार और मुद्राएं अपना ली है, जिन का विरोध करते हुए ही पहले अपने कोर समर्थक बनाए थे। पर अब गत तेरह साल की नीतिगत उपलब्धि बताने के बजाए केवल विपक्ष को नीचा कहकर अपने को बेहतर बताना, जबकि उसी विपक्ष के हर दागी, बदनाम को भी अपनी पार्टी में लेने को तत्पर रहना — यह सब नीतिगत खालीपन ही है।
अतः स्वत: स्पष्ट हो रहा है भाजपा के लिए चाल, चरित्र, हिन्दुत्व, संस्कृति, विवेकानन्द, आदि बस लोगों को लुभाने की बातें थीं। वह सब इस्तेमाल हो चुकने पर जब उन जुमलों में रस नहीं बचा, तो निचोड़े जा चुके ईख की भाँति विवेकाननद और शिवाजी को फेंक कर अम्बेडकर और फुले का पल्ला पकड़ लिया गया।
क्या किसी अन्य राजनीतिक दल ने ऐसा विश्वासघात किया है? संभवतः 1980 से ही, संघ-भाजपा में किसी भी तरह सत्ता लेने के सिवा कोई नीतिगत निष्ठा नहीं थी। इसीलिए गत दस-बारह वर्षों में मोदी ने चाहे जो रंग बदले, अनपेक्षित बयान दिए, काम किए, समर्थकों को असहज किया — उस पर किसी संघ या भाजपा नेता ने आपत्ति नहीं की।
ऐसा किसी अन्य दल में नहीं देखा गया कि अपने जगजाहिर मुद्दों पर उलटी बात कहने-करने वाले नेता को टोका, फटकारा न गया हो। इसलिए मानना पड़ता है कि संघ-परिवार सब से अधिक अनाड़ी या फिर सत्तालोलुप साबित हुआ है। सारी सत्ता हाथ में लेकर भी संघ-परिवार ने नीति और विमर्श को अपनी ‘विचारधारा’ पर लाने के बजाए, दूसरों के सेक्यूलर, वामपंथी, कांग्रेसी, लोहियावादी, फुलेवादी नीतियों का ही झंडा उठा लिया!
अतः संघ-भाजपा में कभी भी धर्म, शिक्षा, संस्कृति के प्रति समझ अथवा निष्ठा नहीं थी। इसीलिए चार दशकों से विविध सरकारों में भागीदारी और अकेले सरकारें चलाते हुए भी पहले से चल रही शिक्षा-संस्कृति नीति में रंच-मात्र परिवर्तन नहीं किया। न उस के नेताओं ने उस पर परवाह की। मानो हर पद और संस्था पर केवल चेहरे बदलना ही मुख्य बात हो।
यह तब और बड़ी मूढ़ता लगती है जब देखें कि छोटे-छोटे क्षेत्रीय दल भी सत्ता मिलते ही अपनी सैद्धांतिक निष्ठा के अनुरूप कुछ न कुछ ठोस नीतिगत बदलाव लाते रहे हैं। तब संघ-परिवार की सत्ताएं ही इस से क्यों उदासीन रहीं?
उन की सारी गंभीरता केवल कुर्सी, कार्यालय अपने हाथ लेने, रखने के प्रति दिखी है। इसीलिए, जब भी उस के शासक कोई ऊट-पटाँग बोलते, करते हैं, यदि उस से सत्ता बने रहने पर फर्क न पड़े, तो संघ-भाजपा नेताओं ने उस की अनदेखी की।
तभी, केवल संघ-भाजपा समर्थक ही ‘मास्टरस्ट्रोक’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं। आशय यह भी है कि अप्रत्याशित कर्मों-कुकर्मों को सामान्यतः सही ठहराना कठिन है। इसलिए, उसे ‘मास्टरस्ट्रोक’ का भड़कीला नाम देकर असलियत छिपायी जाती है।
सो, सत्ताधारी होकर भाजपा ने तमाम कांग्रेसी नीतियों को यथावत् रखा। बल्कि उन्हीं को और विस्तृत, अनुत्पादक, या विषैला बना दिया। जैसे, अधिकाधिक लोगों को राजकोष से मुफ्त बाँटते रहना; मुस्लिम ‘तृप्तिकरण’; आरक्षण बढ़ाना; तथा एससी-एसटी एक्ट को और अन्यायी तथा खतरनाक बना देना। यही सब ‘मास्टरस्ट्रोक’ है! अपने सिद्धांत छोड़ कर कुर्सी पकड़े रखने की नई तिकड़में।
आखिर, यह संघ के सर्वोच्च नेता का दो-टूक कथन था कि ‘आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए’। वे मानते थे कि दशकों बाद भी आरक्षण बढ़ाने से सामाजिक असंतोष और राष्ट्रीय हानि, दोनों बढ़ रही है। तब उसे भुला कर ‘हिसाब चुकता’ और ‘जब तक मैं जिन्दा हूँ…’ जैसी उलटी शब्दावली कैसे आ गई? यह संघ-भाजपा को कैसे स्वीकार्य हो गई?
अपने घोषित विचारों के प्रति अगंभीरता और कुर्सी-कार्यालय लालसा के सिवा इस का कोई विश्वसनीय उत्तर नहीं है। आरक्षण ही नहीं, सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक नीतियों में भी संघ-परिवार द्वारा रंग बदलने, और अपने संकीर्ण दलीय एवं निजी हित साधने के उदाहरण अधिक मिले हैं।
अतः आरक्षण पर संघ-परिवार का रंग बदलना कोई अपवाद भी नहीं। चुनावी लाभ के लिए राजकीय एजेंसियों का उपयोग भी उसी तरह की बात है। गिरे हुए लोगों को पार्टी में लेना, पद देना भी उसी क्रम में है।
इसलिए, जनधारणा बदल रही है। भाजपा समर्थक समूहों में भी समझ बनी है कि सारी चतुराई केवल कुर्सी पकड़े रहने में लगाई जा रही है। यह अंततः समर्थकों का मनोबल कमजोर करता है। इस प्रकार, धारणा बदलने और नैतिक बल घटने के बाद लोकतांत्रिक राजनीति में किसी भी नेता के सत्ता में टिके रहने की संभावना घटती है।
अतः संघ-भाजपा को हिसाब करना होगा कि नेता बचाएं या पार्टी? वरना 2004 में आडवाणी को आगे करके भाजपा फिर आ सकती थी। पर वाजपेई की तंगदिली से सत्ता तो गई ही, आडवाणी यूँ ही रह गये! वही हाल शाह का न हो, यह ध्यान रखना ही अधिक सुरक्षित है। यह देश बहुत बड़ा और विविध शक्तियों, दुर्बलताओं वाला है। किसी के लिए भी अपने मंसूबे से इसे हाँक सकना एक संदिग्ध गणित है।
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